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Full text of "Omnkar Ek Anuchintan"

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ऽेव्छार : खक्छ अलुचिन्तन 


लेखक 
मन्त्री पण्डित प्रवर श्रद्ध य श्न पुष्करमुनिजी म° 


सम्पादक 
देवेन्द्रमुनि शास्त्री, साहित्यरत्न 
पं० कतेभाचन्द्रेजी भारितल्ल 


प्रकाङक 


प्राप्ति स्थान 


श्रं सहयोगी 


प्रकाशन-तिधथि 
मद्रक 


मूल्य 


सावंभौम साहित्य संस्थान । 
१०/१७ शव्ितिनगर, 
देहली ६ 


भण्डारी सरदारचन्द जैन । 
जेन बुकसेलर चरिपोलिया, 
जोधपुर । 


ऋषभराजजी पारसमलजौ 
भूताजी, सिवाना ! 

२. हस्तीमलजी भूताजो, सिवाना । 
३. कानुगाधिगड़मलजी मुलतान- 
मलजी, सिवाना (राज०) 

४, नररसिहमलजी चातिलालजी 

भारण्डा (मारवाड) ` 


[0 1 
[1 


२३ फरवरी सन्‌ १६६४ 
आयं सहकारी प्रेस लिमिटेड, प्रजमेर । 


एक रुपया । 


पूर्वान 


सानव ने अपनी समस्याग्रो का समावानकरने के लिये 
ग्रनेक सस्थाश्नो, परम्पराप्रो ्रौर वि्ाश्रो को जन्म दिया, कितु 
वे स्वयं समश्याये बनकर, मानव को दवाने लगी। उद्धारके 
स्थान पर हनन का कारण वन गड । 


म्रात्मोन्नत्ि के लिए करई संस्था भ्रस्तित्वमे अ्राई्‌ उसका 
लक्ष्य था बाह्य तत्त्वो $ भ्र वरणमे चि हुए आंतरमानव का 
प्रकटीकरण, किन्तु उसका नाम लेकर नये-नये तत्त्व अस्तित्व 
मेञ्रा गयेश्रौरवे मानवता को दवनिलगे। धमं नेपेथ का 
र्पनल्ले लिया। अ्रहिसा भ्रौरप्रेमके स्थान पर वह्‌ परस्पर 
देष एवं घृणाका पोषण करने लगा) धमेकेनामसे होने 
वाले युद्धो का इतिहास राजनीतिक युद्धो से कम रक्तरजित 
नही है । 


परस्पर सहयोग हारा सवंतोमूखी विकास के लिए समाज 
सस्था श्रस्तित्व मे न्राई किन्तु उसी वण विद्रष जाति-विद्ष 
तथ्य लि द्धः वषम्य को जन्म दिया । एक मानव श्रपने श्रापको 


देवता मानने लगाभ्रौर दूसरे को पशुसेभी नीचे समभने 
लगा । 


बाह्य भ्राक्रमण को रोकने एवं चोर, उक्र श्रादि के उपद्रवो 
से सवे साधारणकी रक्षा के लिए राज्य संस्था भ्रस्तित्वमें 
मे आई किन्तु श्रधिकार प्राप्त करके राजा म्रपने श्रापको म्रति- 
मानव मानने लगा श्रौर प्रजाको अपनी भोग्य सामग्री । दूसरी 
भ्रोर राष्टीयता के नाम परस्वं साधारण को एेमी मदिरा 
पिलाई जाने लगी, जिससे एक मानव दूसरे मानव को अपना 


ख 


शद समभे । उसी ने श्रु तथा उदूजन सरीसे भयङ्कर श्रस्मों 
को जन्म दिा जिनको संहारक चक्तिसे सारा विशव 
कपि उठादहै। 


वस्तुभ्ं के विनिमय द्राया दिनोंदिन श्रावदयकताग्नों की 
पूति के लिए व्यापार या वाशिज्य विकास हुश्रा, किन्तु वहांभी 
एक वं दुसरे वगं का शोषण करने लगा । वाशिज्य-शास्नियों 
का उवेर मस्तिष्के एसे उपायों कीखोजमें लगा है जिससे 
बाजार पर एकाधिपत्यहो जाय श्नौर उपभोक्ता को विवश 
होकर अधिक म्रूल्य देना पड़ । मध्ययुग में व्यापार के नामपर 
मनुष्यों का क्रय-विक्रय भी चलता रहा । ¦ | 


भौतिक स्वार्थो की संकुचित परिधि से बाहर निकाल कर 
मानव ओर मानव मे भावनात्मक एकता स्थापित करने के लिष 
कला एवं साहित्य भ्रस्तित्व मेँ श्राये । उनका लक्ष्य था मानवे 
को हृदय की उस भूमिका पर पहंचाना जह वह्‌ एक संवेदन- 
सील प्राणी है। न वह हि है न मुसलमान, नभ्रंग्रेज न यहुदी, 
तस्त्रीन पुरुष, नब्राह्मण.न शुद्र। क्ितुते हृदय-शुद्धि-के 
स्थान पर विलाक्लीता को श्रोत्साहन देने लगे 1, मनुष्य भावुक 
फ स्थान पर कामुक वन गयादहै। 


दरस प्रकार हम देख रहै है कि समाधान स्वयं समस्यार्ये 
वनते चले गये ! उपनिषदो मे मकंडी का उदाहरण साया है, 
वहु उसकी भ्रुख की समस्या सुलफाने के लिए पेड से लार 
निकाल कर जाला बनती है, सोचतो है उसमे कीडं नकोड़े फस 
जायेगे श्रौर वह्‌ भ्रपना पेट मर लेगो; कितु स्वयं उसमे फंस जाती 
है श्नौर प्राण गवा देती है) वत्तमान मानवकीभी यही दशा 
है । वहु नये-नये उपाय खोज रहा है ग्रौरं प्रवयेक के लिये यही 


ग 


सोचता है कि वह्‌ उसे सुषवी वना देगा; किन्तु वही नयी-नयी 
उलभने पैदा करके उनका गला धौटने लगता है जिसे वह्‌ देवता 
भानता है, बह राक्षस वन जातारैः जिसे रक्षकके रूपमे 
अपनाता है वही भक्षक हो जाता है, जिसे वरदान समभा है 
वही अभिशाप वन जाता है । 


इस स्थिति का सख्य कारण है अहंकार की उपासना । 
प्रत्येक मनुष्य अपने जन्म कैसाथ ही दो घेरे वनालेता है। 
पहला चेरा शस्व" काह ओर दूसरा धपर' का। स्वके धेरेमे 
चह प्रेम एवं सहयोग से काम लेता है ओर परके धेरेमे हिसा 
एवंद्रेषसे। परकेषेरे मे आने पर प्रत्येकं समाधान समस्या 
वनजताटहै ओीरस्व केषेरेमे कठिनिसे कठिन समस्या का 
भी श्रपने श्राप समाधानहो जातादै। अहंकार को उपासना 
पर के घेरे को उत्तरोत्तर हुदयहीन बनाती जाती है 1 दो ग्रहुकार 
परस्पर टकराते ह ओर समस्त वातावरण को अगात बना 
देते है उसे हिसाएवं कररता से भरदेते है। मानवता के उद्धार 
का एक ही मागे है कि वह्‌ विषयता के स्थान पर समताकी 
उपासना करे; भौतिक स्वार्थो के स्थल पर श्राघ्यात्मिक उच्ति 
को महत्त्व देना सीखे। इसी को दूसरे शब्दो मे हम कह सकते 
हैकि वह्‌ ग्रहंकार के स्थान पर प्रोकार का पुजारी वने। 


भारतीय साधना मे उन्कार की उपासना को समी परंपराभश्रो 
ने अपनाया है। बहिरात्मा से ्रन्तरात्मा ्रथवा जीवात्मा से 
परमात्मा पर पर्हुचने का इसे अमोघ उपाय माना है 1 उपनिषदो 
ने दसे ब्रह्म का वाचक माना है । पतंजलि ने इसकी व्याख्या 
ईद्वरके रूपमे कीरहै। जैनदर्शन मे यदी पंचपरमेष्टी का 
वोधक है । पुराणों मे इसका श्रथ त्रिदेव अर्थात्‌ ब्रह्मा, विष्णु 
ओर महेश किया गया है । 


छ 
बुमाई, उसके निर्मल जल मेँ स्नान करके शान्ति ग्नौर शुद्धि प्रप्र 
की । वर्तमान मानवधर्म की ग्रोर उपेक्षा भरी हृष्टि से देख रहा 
है। उसे दोग तथा लडाई-फगडो का कारण मान रहा दहै) रेसे 
युग मे इस बात की बड़ी भ्रविर्थकेता है कि धम्मं के उस उदात्त 
रूप को उपस्थित किया जाय जो बाह्य भेदो से उपर उठा श्टुग्रा 
हो । मन्त्री मनिजी का यह्‌ प्रयास प्रशंसनीय! हम भ्राशा करते हैँ 
किवे इस ओर श्रगे वहे ओर भारतीय साधना के उज्ज्वलतम 
रूपं को उपस्थित करने में प्रयत्नशील होगे । 

भरस्तत पुस्तक सवेभौम साहित्य संस्थान के प्रथम पुष्पके 
रूप मे प्रकाशित दहो रहीहै। मानवको राष्ट, जाति तथा पय 
की परिधियों से निकालकर .महामानवताकौो ओरले जाना 
संस्थान का मुख्यः लक्ष्य है । भम्‌ सबसे बड़ा मङ्गल है । संस्थान 
को गनायासही मङ्खलके रूपमे इस पुस्तकके प्रकाशन का 
सौभाग्य 'प्राप्न हरा इसके लिये हम मन्ती मनिश्रीः के प्राभारी 
है, श्रौर साथही देवेन मूनिजीकाभी। आद्या करते है कि 
उनका आशीर्वाद तथा सहयोग हमें सदा प्राप्न होता रहैगा। 


डां० इन्द्रचन्द शस्त्री 
प्रघ्यन्ष 
सार्वं मौम साहित्य संस्थान 
१०/१७, शद्तिनिगर, देहली ६ 


प्रकाश्चकौय प्रकाञ्च. ' 
भरबुद्ध पाठकों ॐ पाणि-पदमं मे “ओकार : एक भ्ननुचितनः 
समर्पित करते हुए हम परम प्राह्वाद की भ्रनूभ्रूति कर रहे है । 
ॐ के सम्बन्ध मे जिज्ञासा रखने वले साधको को प्रस्तुत ग्रन्थ 
मे बहुत कुचं समने को, चितन करने को प्राप्त होगा । 


प्रकृत ग्रन्थ के लेखक पण्डित प्रवर श्रद्धेय श्री पृष्कर मुनिजी 
महाराज है ग्रौर सम्पादक है, तेजस्वी लेखक देवेन्द्र मुनि तथा जेन 
जगत्‌ के यशस्वी, कलम कलाघर पंडित शोभाचन्द्रजो भारिल्ल । 
तथा पुस्तक के प्रकाशन मे श्राथिक सहयोग दिया है धमे- 
परेम सुश्रावक मिश्रीमलजी, हस्तीमलजी भूताजी कानुगां 
धिगडमलजी स्िवाना व दानवीर सेठ नरसिहमलजी सालचा, 
भारण्डा निवासी ने। 


श्री सिश्रीलालजी - जिनका कुं समय पूर्वं देहान्न हो गया, 
वे गुरुभक्त तथा भद्र प्रकृति के श्रावक थे । उनके ऋषमराजजी, 
पारसमलजीये दौ पत्रहै। जो अ्रपनेपूज्यपिताकी तरह ही 
धमनिष्ठ है! श्रापने स्वर्गीयपिता श्री को पुण्य स्मृति मेँ 
५०० रुपये पुस्तक प्रकाशन के लिये प्रदान क्ये है । 


श्री हस्ती मलजी -ग्राप परम श्रद्धालु, गुरुभक्त, जैनागमों के 
प्रेमी च ्रनेक थोकड़ो के ज्ञाता श्रावक है । श्राप सिवाना वर्ष- 
मान स्थानकवासी जेन श्रावक सघ के ्रघ्यक्षहै। भ्रापने ३०० 
, रुपया ग्रन्थ कै प्रकाशन मे दयि है । 


कानुगा धिगडमलजी, प्रापभी चिवानाकेहै। प्राप भी 
गरुभवत है भ्रापने ३१ रुपये देकर भ्रभ्रिम ग्राहक बने है । 


श्री नरसिहमलंजी--भ्रापं वयोवृद्ध, उत्साही व उदारमना 
श्रावक हैँ । गुप्रदानी तथा गुरुभक्त हैँ । श्रापने पृस्तकमे ३०० 
रुपये की सहायता दी है । भविष्य में भी आप साहित्य प्रेमियों 
को सहायता प्राप्ठ होगी तो हम म्रधिक से भ्रधिक उक्ष 
साहित्य -प्रकारित कर सकेंगे, उसीभ्राशा प्रौर विश्वास के साथ। 


-सन्त्री 


अकार : रक अनुचिन्तन 


विषयानुक्रम 


(१) श्रोकार की महिमा 

(२) श्रो की महिमा का रहस्य 
(३) ओ्रोकार की स्व॑मान्यता 
(४) „+, +» निष्पत्ति 

(५) ,, का उद्गम 


(६) श्रोकारकराजाप 
(७) जप साधना 

(८) द्विविध साधना 

(६) साधना को समग्रता 
(१०) साधना सर्वस्व 


(१४) ध्यान-यौग 
(क) ध्यान का स्वरूपं 
(ख) ध्याता 
(ग) घ्येय 
(घ) चार भावनां 
(ड) ध्यान-चिधि 


ठ 
४६ 
५१ 
५५ 
५६ 


(१२) भक्ति साघना 
(१३) भोकारका विराट्‌ रूप 
(क) ऊध्वं भाग 
(१) अ्रहटसा सहात्रतं 
(२) सत्य सहान्रत 
(३) भ्रस्तेय महाव्रत 
(४) ब्रह्मचयं महान्त 
* (५) भ्रपरिग्रह्‌ महान्रत 
(६) देवलोक 
(७) बौद्ध पंचञ्ञील 
(८) वैदिक पंचमय 
(सख) मध्य भाग 


(१) नवपद 
-- ददन 
-- लान 
--तप 
--चारित्र 
--साघु 
उपाध्याय 
--श्राचायं 
--भ्ररिहत 
सिद्ध 


41 
६४ 
६६ 
६७ 
९४ 
६६ 
६६ 
७१ 
७२ 
७३ 
७४ 
७४ 


७५ 
७७ 


७६ 
णर्‌ 
1 
८५ 
८७ 
८६ 


(२) भारतीय संस्कृति मे मुक्ति 
(३) राजनीतिक पृंचरील 


(ग) भ्रषोलौक 


(१) मिथ्यातत्व 
(२) श्रविरति 
(२) प्रमाद 
(४) कषाय 
(५) योग 


१०३ 
१०७ 


[ १] । 


श्रोकार को महिमा 


आयं जाति के साहित्य में ॐ एक भ्रसाधारण मंन है । ग्रनादिकाल 
से अ्रसंख्य-श्रसंख्य साधक, मनि श्रौर योगी इस परम पावन म॑तरका 
ध्यान करते श्रा रहै ह । इस मंत्रराज मे अनन्त गरिमा सन्निहित है 
शरीर की स्थिति भ्रौर पुष्टि के लिए जसे आहार की श्रनिनवायं 
अरावद्यकता द्येतौ है, उसी प्रकार श्रात्मा मे निहित शक्तियो के 
श्राविर्माव श्रौर विकास के लिए ॐ का ध्यान अनिवायं माना गया है । 
यह्‌ स्॑नराज ॐ समस्त श्राष्यामिक्त विद्या का स्त्रोत श्रौर योग-विद्या 
का पुनीतकेन््रदहै। न जाने कितने साधको ने ॐ के गम्भीरतर 
रहस्य को श्रधिगत केरके कृत-कृत्यता प्राम कौ है । 

ॐ इस लघुतम पद मे विद्व संस्कृति फी मौलिक एकता की छाप 
है रौर वह स्पष्ट रूप से इगित करता है कि संस्कृति का मूल स्रोत 
एक ही है, भले ही विभिन्न देलो भ्रौर कालो मे उसने कित्तने ही ग्रनोखे 
अनोखे रूप धारण किए हो} 

हम श्रागे चलकर देखेगे कि इस लघूकाय पदमे किस प्रकार 
समग्र विद्व श्रौर समस्त मतो एवं पयो के महनीय देवों का समावेश 
होता है 1 अ" को प्रणाम करते हुए कहा गया है- 

भ्रोमित्येकाक्षरं ब्रह्य, वाचकं परमेष्ठितः । 
सिदचक्रस्य सद्वीजं, स्वंदा प्रणमाम्यहय्‌ । 

ॐ एक प्रक्षरवाला ब्रह्म है या एक मात्र ्रक्षर-प्रविनर्वर ब्रह्य है । 
वह परमेष्ठी का वाचक ओ्रौर सिद्धचक्र का वीज है) मै उसे सर्वदा 
प्रणाम करता हुं । 

ग्रार्यावत्तं के प्रत्येकं भ्रात्मसाधक ने म॑त्रराज के प्रति श्रपनी गहरी 
श्रद्धा शअरपितिकौ है! वास्तव मे भ्रात्मिक शक्तियो को उद्बुद्ध करे के 
लिए ॐ का ध्यान, चिन्तन श्रौर मनन श्रतीव उपयोगी ह । 


२1 . [ म्रोकार : एकं श्रनुचिन्तनं 


साधक जव समाहित चित्तसे ॐ का ध्यान करता है श्रौर 
तन्मयता की एकनिष्ठ श्रनुभूति मे लीन वनं जाता है, तब उसमे उसकी 
समग्न विराटता प्रतिविभ्बितत श्रौर समाहित हो उस्ती है। उसका 
भ्रात्मिक सामथ्यं रदस्य, उसकी क्षमता ग्रप्रतिहत श्रौर उसका वीर्योल्लास 
श्रपुवं हो जता है । 

जसे कट्पदृक्ष, चित्तामणि-रल भ्रौर कामनेनु अदि दिव्य-मौतिक 
पदार्थो से मनोवांछित भोग्य वस्त्रो फी प्रातिहोतीहैवैसे ही इम 
क्षीरसागरवत्‌ निमंल शब्दराज “ॐ पद से श्रात्मा मे निर्मल तथा 
सात्विक गुणों का श्राविर्भाव होता है । 


जव उ के जप ओर ध्यान सेश्रात्सा सात्विकं गणो से परिपूणं 
बन जातौहैतो यहु स्वाभाविक ही है कि उसका भविष्यं मंगलमय वने) 
इस दृष्टिसे गीता का यहु कथन समीचीन हीदहै कि-~जो साधक 
-एकाक्षर ब्रह्य-स्वरूप ॐ का उच्चारण करता हम्रा देहोत्सगं करता है, 
वह परमा गति प्राप्त करता है। # 

वेदान्तदशँन के समथं विद्वात्‌ भ्राचायं गौडपाद ने श्रोकारके संबंध 
मे जो कुं कहा है, वह भी यहां उल्लेखनीय है । बे कहते है-- 


“साधक को चादिए कि वह्‌ श्रोकारमें श्रपते चित्त को समाहित 
करे, क्योकि श्रोकार ही निर्भय ब्रह्य है । जिसका चित्त नित्य भ्रोकारमे 
समाहित रहता है, भय उसके निकट भी नदी फटकता " 

श्रोकार ह परब्रह्म है ओर प्रोकार ही परब्रह्म है। उसका कोई 
कारण नही, श्रतः वहं श्रपरवं है । जगत्‌ मे कोई वस्तु एेसी नही जो 





अ श्रोमित्येकाक्षरं ब्रहम, व्याहरन्मामनुस्मरत्‌ । 
यः प्रयाति त्यजद्‌हं, ख यातति परमां गतिम्‌ ॥ 
--सरगवद्गीता, ` ८-५ 


ग्रोकार : एक अनुचिन्तन | [ ३ 


उससे भिन्न जातीय हो या ब्राह्य हो । वह्‌ श्रकायं श्रौर श्रव्यय है} 


समभना चाहिए किं भ्रोकार सवके हदय मे स्थित ईश्वर है । जो 
ईरवरस्वरूप स्व॑व्यापी श्रोकार को जान लेता है, वह्‌ ज्ञानी पुरूष 
शोक से मूक्तिपालेताहै ।' 


भरन्त मे कहते है -जिसने श्रोकार को जानाहै वहीमूनिह। जो. 
श्रोकार के विराट्‌-विष्वनव्यापी स्वरूप को नही जानता, उसके ममं तक- 
अन्तस्तच्व तके नही पहुंचा, वह मुनि-पदं का श्रधिकारी नही ।' 


* युजत प्रणवे चेतः प्रवो ब्रह्म निर्भयम्‌ । 
प्ररावे नित्ययुक्तस्य, न भयं विद्यते कवचित ॥ 
प्रणवो ह्यपरं ब्रह, प्रणवश्च परः स्मृतः । 
ग्रपूर्वोऽनन्तरोऽवाह्योऽनपरः प्रणवोऽव्ययः ॥ 
प्रणवं ईद्वरं विद्यात्सवंस्य हदि संस्थितम्‌ । 
सवंन्यापिनमोड.कार, मत्वा धीरो न शोचति ॥ 

--माण्डूक्योपनिषद, 

श्रोकारो विदितो येन स मुनिर्नेतरो जनः । 

-- वही (एवोक्त, 


५ “ˆ {२1 ------ :~ ; 
ॐ की महिमा का रहस्य 


ॐ की महिमा कं संवधमें जो कहा गया है, उसे पट्‌ कर जिज्ञासु 
जन कं मानस मं स्वभावतः यह्‌ प्रडन उदुभ्रुत हो सकताहै कि भ्रासिर 
उसके श्रद्मुत एवं श्रचि्तय प्रभाव एव.माहात्म्य का रहस्य क्या है ? 

वास्तव मे इस प्रदन का विरादे उत्तर वही साधकं दे सकता हु, जिसने 
दीर्घकाल षय॑न्त अनन्य निष्ठापुर्वक ॐ का ध्यान ओर उसके विषय मेँ 
चिन्तन किया हो । तथापि गंभीर विचार करके हम भी उसके महु्व 
के रहस्य का प्रभास प्रव्रश्य पा सक्ते है| 


श्रणोरणीयान्‌ महतो महीयान्‌" यह्‌ उक्ति भ्रोकार के विषयमे पूं 
रूपेण चरिताथं होती है । 


प्रत्येक अन्य पदार्थं के समान श्रोकारकेभीदोरूप ह-बाह्यभ्रौर 
श्रास्तरिक्र । उसका बाह्य रूप श्रक्षरात्मक है जो भाषा-जात्ीयः पुद्गल- 
स्कंधौ से निर्मित ह ओर भ्रन्यान्य मनो की श्रवेक्षा श्रत्यन्त सूक्ष्म, वल्क 
सूक्ष्मतम है 1' किन्तुं उसका आन्तरिक रूप्‌ महान्‌ से , महात्‌ है, भ्रति- 
विशाल है, विराट्‌ है। उसेकिसी "सीमा में भ्रावद्ध तंही किया सकता । 
उसका विस्तृतं विवेचन भ्रगले प्रकरणो में किया जाएगा । 

विभिन्न इकादयो मे समाहित शक्ति यदि किसी एक इकाई में 
केन्द्रित कर ली जाती है तो उसमे श्रनेकगुखित वृद्धि हौ जातीरहै। इस 
तथ्य को समभने कं लिए हम श्रगिनिक्रणो-कोे ले । बिखर हुए प्रग्निकणो 
मे भी दाहुकसामथ्यं है किन्तु उन्हें यदि केन्द्रित कर दिया जाय तो उनका 
दाहकसामथ्ये कई गुणा वड जाता है । यद बृद्धि तो उस्र समय हई जव 
श्रम्निकणो को सिकं एकत्र किया गया हँ भौर उनकी पृथक्‌ इकादयां 
बनो हुई है 1 श्रगर हम किसी प्रयोग द्वारा उन समस्त पृथक्‌-पृथक्‌ प्रग्नि- 


प्रोकार : एकं अनुचिन्तन | [ ४ 


कणो के सामथ्यं को किरी एक कणमे संक्रांति कर सकें तव तो वह्‌ 
सामथ्यं इतना अधिक वद जाएगा, कि उसकी कल्पना करना ही 
कठिन होगा । ~ = ^ 


शकरा के प्रत्येक कण मे माधुयं विद्यमान है 1 यदि उन कणो को 
केवल एकव कर लिया जाय श्रौर उनका पृथक्‌-पृथक श्रस्तित्व ` कायम 
रहने दिया जाय तव भी उनके माधुयं मे वृद्धि हो जाती ह! किन्तु जव 
शकंराकणो की पृथक्‌ सत्ता विलीन करके उन्हे भेक्रीन' के रूपमे 
परिणत कर दिया जातारहै तो माधुयं में विस्मयजनक बृद्धि हो जाती 
ह 1 शकंराकणो को अपेक्षा सेक्तीन का बाह्य रूप-परिमास वहत रृष्ष्म 
होत्ता है, तथापि उसका माधुयं भ्रत्यधिक होता है । 


जो लोग साधारण वमो को श्रपेक्षा सूक्ष्म परमाणु वम की, भ्रौर 
परमाणु वमो कौ उपेक्षा भी रूक्ष्मतर उदजनवम की शक्ति की प्रधिकता 
को वैलानिक पद्धति से समभ सकते ह" उन्हे भ्रन्यान्य' मतो की भ्रपेक्षा 
सुक्ष्म ॐ संतर कौ शक्ति की प्रचण्डता को समना फटठिने नही ' होना 
चाहिए 1 | । 

िक्रोन' का माधुयं मले ही श्रपूवं-सा प्रतीत हो तथापि वहु शकरा- 
कणोमेसे ही आरतत ह, क्योकि.सेक्रीन्‌' वस्तुतः शकंराकणो काही 
सार-सत्व ह । इसी प्रकार ॐ मे परिव्याप्तं विराट्‌ रक्ति भी श्रन्यं मंत्र 
सेही आईहश्रौर वह्‌ मत्र है पंचनमस्कार्मत्र। ` ५, 

जंसा कि प्रागे कहा जायगा, पंचनमस्कार मंत्र ध्पुवं' नामक विलाल 
श्रूतोकासार हु) श्रौर श्रोकार उसकाभी सार ह 1 इसः प्रकार"म्सार 
कासार हौनेके कारण दी समवतः श्रोकार मे अ्रदुभूत, श्रसाघारण 
ओर भ्रतक्यं सामथ्यं प्रदुभ्रूतदहो गयां ॥ 

नि | ६ ४ ८ + 


3 ६५, 
~---4+---~ 


६ ॐ ४ र ॥, क [1 र न 7. 


[३1 
श्रोकार की सर्व॑माच्यता 


वि्व-साहित्य में ॐ का समकक्ष कोई दसरा पद॒ उपलब्ध नही 
ह जिसे इतनी श्रद्धा श्रौर प्रतिष्ठा प्राप्त हो । उसमे जो गढ श्रौर निराट 
तत्त्व समाहित ह, वहं किसी भी एक पद भँ दृष्टिगोचर नही होता ¦ यही 
कारण ह कि भारतवषं की विभिन्न धम॑-परम्पराश्रो ने एक स्वर से 
इस मंत्रराज के महिमागनमें श्रपनी श्रुद्धा कै स्वर संजोए है। 
जेन, बौद्ध श्रनौर विभिन्न वैदिक परम्परां श्रोकार के श्रसाधारण महत्व 
की स्वीकृति में एकमत हो जाती. है । इतना हौ नही, भारतीयेतर ईसाई, 
मुस्लिम, पारसी भ्रादि मतो के साहित्य में भौ उसते सम्मानपुशं स्थान, 
प्रास्त किया है । नीचे दिये जाने वाले कत्िपग्र उदूधरणों से यह्‌ तथ्य 
स्पष्ट हो जाएगा 1 


श्रम्‌ खम्बरहय । 
। --यजुवेंद श्र, ४०, मंत्र १७1 
` श्रोइभ्‌ इति एेतदन्तर उदृगीतमुपासीत । 
। -- छान्दोग्य उपनिषद्‌ । 
भ्रो३म्‌ इति देतत्‌ श्रसरं इदं १६ सर्वं त्रस्योपायास्यानम्‌ । 
~ माण्डूवयोपनिषद्‌ १ 
भ्रोमित्मेतत्‌ + 
। , - कठोपनिषद्‌, १-२-१५ 
भ्नोभित्यात्मानं युञ्ञीत । 
--मैत्युपनिषद्‌, ६-३ 
श्रोभिति ब्रह्य 1 
--त॑त्तिरीय उपनिषद्‌, .१-८-१ 


परोकार : एक अनुचिन्तन ] {७ 


भोकर एवेद स्वम्‌ । # 
-- छान्दोग्य उपनिषद्‌, २-२३ 
प्रणवत्प्रभवो ब्रह्य, प्रणवातप्रम वो हरिः। 
प्रणवातस्रभवो शद्रः, प्रणवो हि परो भवेत्‌ ॥ | 
--उपनिषद्‌ 

प्रणव से ब्रह्मा प्रणवसे हरि रहै, प्रणवसे रुदर ह श्रौर प्राव 
हौ पर तत्तव है । 

वौदो का प्रघान मंत्र ह-“्रोरम्‌ मणिपद्म हुम्‌ +" 

सिक्ख भाई "एक ओकार सद्गुरु प्रसाद कह कर भरौकार के 
महत्त्वे को शिरोधायं करते ह । 

भाषातत्त्व विदो के नुसार फारसी भाषा में श्रलिम्‌' का सूप 
धारण करके ॐ ने स्थान प्रात क्रियाहैतो भ्रप्रजी भाषा मे रधषोप 
केरूपमें वह्‌ श्रासीन ह। 

जंनपरम्परा के साहित्य मे तो उसे उचत्तर स्थान प्रपि हही) एक 
जैनाचाये श्रोकार को नमस्कार केरते हृए श्रौर उसे "कमप्रद' तथा 
'्पोक्षप्रद' वतलाते हुएं कहते ह - 

श्रोकारं बिन्दुसंयुक्तं, नित्यं ध्यायन्ति योधिनः 1 
कामदं मौक्षदं चैव, श्रोकाराय नमो नमः॥ 

श्रोकार कै इसं स्तव मे वंदिक एवं जैन परम्परा का स्वर एकहो 

गया है 1 यह लोक दोनो परम्पराश्रौ मे प्रतिदिन पठा जाता है। 


श्रोमित्येकाक्नरं ब्रह्य वाचकं परमेष्ठिनः इत्यादि जन परम्परा- 


% इत सव उपनिषदो के उद्धरणौ का करीव-करीव्र एक ही तत्मयं हँ 
कि ॐ ब्रह्य है, श्रात्मा है श्रौर वह्‌ सव कुं है । 
{ -कत्याण' गोरखपुर के साधनाः त्नद्कु से उद्धृत्र .\, । 


= ] [ ओंकार : एक. अनुचिन्तन 


प्रसिद्ध इलोक पहले उद्धृत करिया जा चका है) इस श्लोकः मे ओंकार 
को सिद्धचक्र का बीज प्रतिपादित किया गया है । 


कलिकाल सवज श्राचायं हेमचन्द्र श्रोकार को समस्त मंत्रं मे श्राय 
( प्रथम श्रौर उत्तम ) बतलाते-हृए कहते है- .. 
श्रोकारमिव मन्त्राणा- 
मादय' सगीत कमंणाम्‌ । , ५ । 
सुस्वरं पूरयामासु- 
वेणुः वंणविकोत्तमाः । 
` --न्रिषण्ठि शलाका पुरुषचरित, १-९-७०७ 


श्री रत्नमन्दिर गणी ने मओोकारका महिमागान इस प्रकार किया है- 


श्रोकारः कल्पकारस्करतिकरतिरस्कारिदातातिरेकः, 
दाब्द ब्रह्य करत्नाकरहिमकिरणः कारणं मंगलानाम्‌ । 
` देयाः शुढधब्रदधि निरवधिमहिमाम्योनिषिः सावंसिद्धा-- 

चार्योपाध्याय साध्रूनभिदधदधिकं धीमदाराघनीयः 1 

-- भोजप्रवन्ध-मंगलस्मरण 

श्र्थात्‌ श्रोकार कल्पतरु से भी प्रधि ग्रभीष्ट प्रदान करने वाला 
है, शब्द ब्रह्य रूपी अ्रह्वितीय रत्नाकर का विकास करने के लिए चन्द्रमा 
के समान है, मंगलो का कारण है, ्रसीम महिमा का महाणंव है, सभी 
परमेष्ठि का वाचक है श्रौर बुद्धिमानोके लिये श्रराघनीय दहै, एेसा 
भ्नोकार तुम सभी को शुध वृद्धि प्रदान कुरे । 

शपंचवस्तुक' मे भी इसी प्रकार का श्राय प्रदरित्त किया गया है-- 
श्रोमिति परमेण्ठिपंचकमाहः कथमिति चेदुच्यते--श्र' इति अहत. 
भ्रादाक्षरम्‌, श्रः इत्यदयरीरस्य सिद्ध वाचकेस्याद्या्रम्‌, श्रा इत्या- 
चार्यस्याद्याक्षरम्‌, “उ' इत्युपाघ्यायस्यायाक्षरम्‌, म्‌” इति मूनीत्यस्या- 
दाक्षरम्‌-- शध -[-श्र--श्रा-उ-~-म्‌ इति, ततः सन्धिवशात्‌ गोमिति 
पदैकदेदो पदसमुदायोपचारात्‌ “ एवमुक्तः ।..**..^..* श्रोमिति सचंविया- 


ग्ोकार : एकं अनुचिन्तन ] [६ 


नामाच चोज सकलागमोपनिषद्भूतं सर्वविश्रवियातनि्मयित-दप्टा- 
हष्टफलसंकटपकल्पद्र मोपमम्‌, इत्यस्य प्रणिघानस्यादावुपन्यस्तं ¶रम- 
मद्धलम्‌, न चतद्न्यतिरिक्तमन्यत्तवमस्ति इत्यादि । 


यहं वतलया गया है कि श्रो पद पाचों परमेष्ठियो फा वाचक 
है; क्योकि वह्‌ परमेप्ठिवाचके श्ररिहन्ते, भ्रगरीर (सिद्ध), श्राचार्यं 
उपाध्याय श्रौर मूनि शब्दो के श्राय श्रक्षरोसेवनाहै। पदमे एक 
देश मे पदसमुदाय का आरोपदहोताहै, स न्यायके श्रनुसारभ्रोंकी 
यह्‌ निप्पन्ति उचित हौ है 1... श्रो" सर्व विदयाग्रों काभ्राय वीजं 
हे. सकल श्रागम-उपनिषद्‌ रूप है, समस्त विर्न का विघात्तक श्रौर 
मनोरथो की पूति करनेवाला करपपादप के समान है । 

्राचायं शुभचन्द्र ने वड़ प्रभावशाली नच्दोमे अके स्मरण को 
पवित्र प्रेरणा कौ हैः-- 

स्मर दु.खानलज्वाला-प्रशान्तेनवनोरदम्‌ 1 

प्रणवं वाड. मयज्ञानप्रदोपं पुण्यशासनम्‌ ॥। 

यस्माच्छन्दास्यकं ज्योतिः प्रसृतमतिनिर्मलम्‌ । 

वाच्यवाचकसम्वन्वस्तेनव परमेष्ठितः ॥ 


--नानाणेव, २८, ३१-३२ 


यह प्रणव (रोकारः) दुःखागिनि की ज्वालाश्रौ की उपशान्ति कै लिए 
नूतन मेघ है श्र्थातु समस्त दुःखो का विनाशक है श्रागम ज्ञान के दिए 
प्रदोप के समान है मौर पृण्यासन है 1 


श्रोकार से ही प्रत्यन्त निरमंल शब्दाटमक ज्योति प्रकट हुई है श्रौर 
उसी के हारा परमेष्ठी का वाच्य-वाचकभाव है, श्र्थ॑त्‌ पाच परमेष्ठी 
वाच्य है श्रौर ग्रोकार उनका वाचक है! 


जैनदशन मे वाच्य श्रौर्‌ वाचक का कथंचित्‌ -मेदाभेद संबंघ स्वीकार 
किया गया है । कहा है- 


१० | [ ओकार : एक अनुचिन्तन 
भ्रभिहाणं श्रभिहेयाउ होड भिण्णं श्रभिण्णं च । # 


इस सिद्धान्त के अनुसार ओकार की प्राराधना पंचपरमेष्ठी कौ 
भराराधना हे । 


इस प्रकार उल्लिखित कतिपय श्रवतरणोँ से मली्भाति विदित हो 
जाताहै कि महामंत्र प्राव किसी एक सम्प्रदाय या पंथ की पूजो नही 
है। कह सम्पूणं भारतीय दश॑नोकी ही नही; ्रन्य मतो की भी 
भ्रमूल्य निधि है । 

यह श्रनुमान करना निराधार नही कि प्रणव की उपासना श्रौर 
भाराधना उस भ्रति पुरातन क्रालसेश्रायं जतिम होतीश्रा रही दहै 
जव विभिन्न दर्ंनों एवं पंथ का जन्मही नही हुग्राथा। समय पर 
दरेनो श्रौर पथो कौ स्थापना हई किन्तु परम्परागत प्रणवोपासना का 
परित्याग उन्होने नहीं किया । श्रायं जाति जहां २ गर्ह, श्रपनेसाथही 
महामहिम प्रणव को भी लेती गई । कालान्तर में जब श्रनेक देवोकी 
कल्पना का जन्म हुश्रा श्रौर ब्रह्मा, -विष्णु, महेश श्रादि देवताश्रो को 
सिंहासन फर श्रासीन क्रियागया तो ॐॐ पद के साथ उनका भी 
सामंजस्य विठलाया गया । एक नया शब्दकोष हमारे सामने भ्राया- 

बरह्याऽकारोऽत्र विज्ञेयः, उकारो विष्णुरुच्यते । 

महेरवरी मकारस्तु, चयमेकन्न- तत्त्वत्तः । 

श्र" ब्रह्मा, “ॐ' विष्णु श्रौर भम्‌" महेदवर ह । तीनो देव भिल- 
कर श्रो रूप धारणा करते दहै 

दूस विषय का विशेष विचार श्रगले श्रोकार की निष्पत्ति" प्रकरण 
मे करियागयादहै। यहा कैवलःयही `दिखलाना श्रभीष्टहैकि श्रोँकी 
| महिमा स्व॑मान्य है । 





गै बुहत्कत्पभाष्य 


प्रौकार : एक अनुचिन्तन | [ ११ 


उत्तराच्ययनसूत्र (प्रघ्ययन २५ गाथा ३१) मे एक उल्तेख है-- 
म्‌ श्रोकारेण बभणो 
प्र्थाति--श्रोकार के जाप या उच्चारण से कोई ब्राह्मण नहीं 
हो जातत) 


इस उत्लेख के श्राघारसे कुद महानुभावो कौरेसी धारणाद 
कि जैन परम्परामे श्नोफारको स्थान नही 8, किन्तु ऊपर दिय 
प्रमाणो से तथा जैन मंच्रघास्वो मे प्रदर्शित संकड़ो संत्रो के भ्रवसोकनं 
से यह धारणा निमूल प्रमारित हो जाती है । प्रायः प्रत्येके जैन मंत 
के प्रारम्ममे श्रो पदकाप्रयोग हुप्नाहै जोइस वात को सिद्ध 
करताहैकिमंत्रमेजो सामथ्यं है, वह्‌ श्रो के विना प्रकट नही होता। 


जसा कि अन्यत्र प्रकटे किया गया है, श्रोकारं नमस्कारस का 
सार-सर्वेस्वहि। एसी स्थिति मे यदि नमस्कारमंत्र का जंन-परम्परामे 
श्रादरणीय स्थान स्वीकार किया जातादैतो कोई कारणः नहीं कि 
श्रोकार कामीकव्हीस्थाननेदो) 


तो फिर उत्तराध्ययन के उल्लेख का अभिप्राय स्याहै? इस प्रश्न 
परथोडा विचार कर लले! यदि इस उल्लेख को पृष्ठमृमि पर 
गम्भीरता श्रौर वारीकीसे विचार किया जायत्तो प्रतीततहोगा कि 
चहां वाह्य भ्राचार या वेष का एकान्ततः महत्त्व स्वीकार करने वाले 
हष्टिकोण का निरसन करके श्रान्तरिक श्राचार की प्रधानता प्रतिपादित 
की गई है! उत्तराव्ययन की पूरौ गाथाएं इस प्रकार हैः- 


नवि मुडिएण समणो, न श्रोकारेण वंभणो । 
न मुणी रग्एवसिरं, कूसचीरेण न ताचसो । 
समयाए समणो होई, वंभवेरेण वभो । 
नखेणय सुरी होड, तवेण होई तावसो ॥ 
~ उत्तरा २५, >३१-२२ 


१२1 [ ओकार : एक अरनुचिन्तन 


मुडित होने- मासे कोई. श्रमण नही होता, श्रोकार का रटनं 
करने मार से कोई ब्राह्मण नही हो जाता, श्ररण्य मे निवासं करते 
मात्र से मुनिपन प्राप्त नही होता ग्रौर कुश-चीर का परिधान कर लेने से 
ही तापस का पदं प्राप्त नही किया जा सकता। 

समता से श्रमण, ब्रह्मचयं से ब्राह्मण, ज्ञान से मूनि श्रौर तप 
से तापस होता है। 

ध्यानपुवंकं देखने से यह्‌ वात श्रसंदिग्ध हौ जाएगी कि यहां ' वाह्य 
क्रिया मत्र कोही श्रमणत्व, मुनित्वं रौर तापसत्व कौ कसौटी मानने 
कं प्रतिरिक्त दृष्टिकोण का निषेध है, मगर इन क्रियाश्नों का निषेध 
नही है । इस उल्लेख से जोश्रोकार के जयया घ्यानं का निषेध 
समभते है, उन्हे मुडित होने का 'तथा भ्ररण्यवास का भी निषेध 
मानना पड़गा। मगर एेसा मानना जैनाचार की श्रनभिक्ञता का 
सूचक होगा । 

ास्तराकार का श्राय स्पष्ट किसिरमूडालेने पर भी जव 
तक समताभाव जागृत नही होता तव तक श्रमणत्व नही आता! 
भ्रोकार-भ्रोकार रटने पर भी ब्रह्मचयं के विना कोई ब्राह्मण नही 
कहला सकता । वनवास करने पर भी जव तक ॒सम्यगज्ञान प्रास्त नही 
होता ` तव तक मूनित्व की प्राति नही हो सकती ्रौर कुदावस्तर 
धार्ण कर लेने पर भौ विना तपदचरण क्रिये कोई तापस 
मही हो सकता । | 

बाह्य श्रौर श्रान्तर-प्राचार का यहाँ सुन्दर समन्वय किया गया 
है । एकान्त बाह्याचार को प्रश्रय देने वाले जैसे सन्मागं वेत्ता नही 
कहे जा सकते, उसी प्रकार वाह्याचार का निषेद करके एकान्त 
श्रान्तरिक-प्राचार का समर्थनं करनेवाले भी गलत राह पर चलते हँ । 
इस प्रकार श्रनेकान्त दृष्टि को सामने रखकर विचार करने से 
स्पण्टहो जाता है कि प्रस्तुत गाथा में श्रोकार-जाप का विधान है, 
निषेध नही । -निषेध सििफं उसके एकन्त का है । 


[र] 
श्रोकार की तिष्पत्ति 


श्रोकार की महिमा, सर्वमान्यता ओर व्यापकता का दिग्दर्शनं 
कराया जा चूका है । भ्रगर ग्रोकार सम्ब्रन्धी साहित्य का समग्र 
संकलन किया जाय तो निकश््वयही एक विशाल ग्रन्थ रततेयार हौ 
सकता है 1 


इस प्रकरण मे देखना है किं ॐ शब्द किक प्रकार निष्पन्न 
ह्भ्रारै? इस छोटो-सी गागरमे कौन-सा सागर भरा है? किस 
कारण मनीपौ महपि उसके महिमागन के लिए प्रेरित हृए है? 
भ्रसंख्य मनो मे ॐ को मूर्घन्य स्थान प्रदान करनेवाला तत्तव क्या है ? 


जसा कि पहले प्रतिपादन क्रिणाजा चुका है, भकार विभिन्न 
साघना-पंयो मे लगभग सवेमान्य है । इसौ कारण उसको निष्पत्ति भी 
प्रनेक प्रकारसे की गर्‌ है प्रच्येक निष्पत्ति. उप्त-उस परम्परा के 
टष्टिकोण कौ द्योतक है । 


सवंभ्रथम हम जन मान्यता को तेतेरै। जैन परम्परा मे परमेष्टो- 
परमपद मे स्थितदेवो रौर गुरुप्रो के पांच विभाग व्यि गये है, 
जो इस प्रकार हैः- 

(१) भ्रिहन्त 

(२) ग्रशरीर (सिद्ध) । 

(३) ्राचायं 

(४) उपाच्याय 

(५) मुनि (साबु) , 

इन पचो पमेष्ियो कँ प्राय श्र्र इश प्रकार ६ै--अ-प-प्रा-उ 
-उ-म्‌ । व्याकरण-लास्त्र के अ्रनुसारं इन श्रक्षरो की सन्धि करने 


१४ | [ श्रोकारः एक अनुचिन्तन 


पर श्रो शब्द निष्पन्न होता है ।> इसप्रकार इस ॐ पद मे पांचो 
परमेष्ठ्यों का श्रन्तभवि होता है । 

वैदिक परम्परा ने ब्रह्या, विष्णु श्रौरं महेश, यह तीन प्रधान 
देवः स्वीकारक्यिर्हँः जो क्रमशः सृष्टि के जनकं पालक शरैर प्रलय 
कर्ताहै। अ्रतएव वे श्रौकारमे इन्ही तोनो का समवेश करते ह, 
जो इस प्रकार है, -ग्रा), शब्द ब्रह्मा काश्र 2 विष्णु का श्रौर उ" महादेव ` 
का वाचकदहै। व्याकरण के अनुसार .श्राञश्र>उ मिलकर श्रो" 
रूप वनता है । उसको नान्यतर जाति का सूचक श्रू" प्रत्यय लाने से 
श्रो" पद निष्पन्न होता है। 

किन्दी-किन्ही ने वासुदेव (विष्णु) वाचके श्र" भहैश्वरवाचक उ” 
जौर प्रजापति ब्रह्मा) के वाचक 'म' के संयोगसे ॐ शव्द की 
निष्पत्ति बतलाई दै+। 

, इन दोनो टी कल्पनाभ्रों का अभिप्राय समान है। दोनो के श्रनुसार 


ॐ क्र (१) महानिशीथ-पत्र (२) आगमोदय समिति 
ख ॒श्ररिहता असरीरा ्रायरिया तह उवज्या म्‌रिणो । 
पटमर्वेखररिष्फण्णो, ओओकारी पंचेपरमेष्ठी ॥ 
रत्नाकर ग्रन्थ 
वृहदद्रव्यसग्रह टीकां प्रृ° १८२ 


१--२ श्रः" श्रीकण्ठेऽव्ययं तुल्यामावयोः अः! पितामहे ) 
-- विश्वलोचनकोदा 
३--*उः' शिवे नान्ययं तु स्यात्सम्ुदधौ रोषभाषरे । 
५--श्रकारो वासुदेवः स्यात्‌, उकारस्तु भटेदवरः । 
मकारः प्रजापतिः स्यात्‌, त्रिदेवो ॐ प्रयुज्यते ॥ 


भ्रोकार : एकं अरनुचिन्तन || { १५ 
वैदिक-सम्प्रदायः क तीनो मूर्धन्य देव ॐ मे समाविष्ट हो जाते है । 


कु विद्वानों ने "सो श्ट पद से “ॐ को निष्पत्ति की कल्पना कौ 
है 1 "सो ऽहं", भारतीय शब्द साहित्य में तो महच्वपुणं स्थान रखता ही है, 
जन-जीवन मे भी धुल-मिल-सा गया है 1 वैदिक-परम्परा में इस शब्द का 
बहुलता से प्रयोग होता है । जेनपरम्परामे भी इसका प्रयोग देखा जाता 
है । जन आस्तर अचरांग सूत्रके प्रयम प्रघ्ययन के प्रथम उर्‌शक भें 
“सो ऽदं प्रयुक्त हृश्रा है गनौर भ्रन्यत्र भी । ईसी सो ऽह शरन्द से उ 
शब्द की निष्पत्ति इस प्रकार की जाती है-- 

सक्रारंजच हकारञ्च लोपयित्वा प्रयुञ्जते । 

तात्पयं यह्‌ हैकि शसो श्ट शन्दमेसे स्‌" का श्रौर ष्का 
लोप करके प्रयोग किया जाता है ग्रौर जव यह्‌ दोनो ग्येजन लुक्त हौ जति 
हैतोग्रो' ही शेष रहता है । 

स्वामी रामतोथं ने ॐ की निष्पत्ति के सम्बन्ध मे एक कमनीय 
कल्पना इस प्रकार की है - 


वच्चा जन्म ग्रहण करता है, उस समय उसकी प्रथम ध्वनि, 
श््रा-्रा~प्राः निकलती है! वह्‌ जव कुदं वडा होता है तो “उ-उ-ॐ 
को घ्वनि निकलने लगती है । श्रौर जव वह्‌ कुं श्रौर वद्धिगत्त होता 
हे श्रौर उसको वृद्धि संकेत को समभने के योग्य विकास प्राप्त 


# पुरत्थिसाग्नो वा दिसाग्रो भ्रागग्रो अहमंसि, 
जा व श्रण्एयरीग्रो दिसाग्रो अ्रणुदिसाश्रो वा ्रागओ ग्रहमंसि 
एवमेगेसि जं णायं भवडइ्‌ अत्थि मे ब्राया उववादइए 
जो इमाभ्रो, दिसाग्रो ्रुदिसाग्रो वा ब्रणुसंचरडइ सोह, 
सव्वाग्नो दिसाभ्रो-प्रणुदिसाभ्रो वा जो श्रागमो अणुसंचरद सोहं । 


,. आचाराग १-३ 


१६ | [ म्रोकार : एक श्रनुचिन्तन 


करलेतीहै तो श्रपनी माता के लिये 'म-म-म' उच्चारण करने लगता 
है। इस प्रकार श्र+-उ~म्‌' के संयोग से श्रोकार' पद निष 
पन्न होता है । | 

. इस कल्पना मे किसी उपास्य देव को स्थान नही है । इसका श्रभि- 
भराय यही प्रतीत होताहै कि रकार मानव-अत्मा की सहज स्फुरणा 
है, निसगं-जात प्रेरणा है या अन्तर मे विद्यमान शक्ति का स्वाभाविक 
आविष्करण है । । 

ॐ के सम्बन्ध मे ध्यान आकर्षित करने वाली एक कल्पना श्रौर 
है। इस कल्पना मे उसके विराट्‌ स्वरूप का आभास मिलता है। 
वह इस प्रकार है-- 

श्र--श्रधोलोक 

ऊ--ऊष्वंलोक 

म्‌--मध्यलोक 

इस प्रकार तीनो लोको के वाचक शब्दो के प्रथमाक्षरो से निष्पन्न 
विराट्स्वरूप श्रोकार का श्रभिप्राय यह ह करि इसके चिन्तन, मनन श्रौर 
जापसे तीनों लोक हस्तामलकवतु हो जाते ह, चिन्तनकर््ता त्रिलोकी 
का श्रधिपति बन जाताहै श्रौर वह तीनो लोको के शीषंभाग--मूक्तालय 
--को प्राप्त कर लेता) । 

लोक यदपि क्षेत्र-स्वरूप है, मगर क्षेत्रग्रौर क्षेत्री केश्रमेद की 
विवक्ष से अखिल विद्व का उसमे समवेश हो जाता है। इसका 
फलितार्थ यह हुभ्रा कि “ॐ इस छोटे-से शब्द मे सभी कुदं सच्निदित 
है। इस कल्पना का विस्तृत विवेचन भ्रागे करिया जाएगा । 

स्वामी भरूमानन्द कहते ह--उपनिषद्‌ के कथनानुसार प्रकार का 
उच्चारण नही ' हये सकता, सयोकि वह॒ स्वर या व्यंजन नही है प्रौर 
यह्‌ कंठ, होढ, नासिका, जीभ, दांत, तालु ्रौर मूर्धा श्रादि के योगसे 
या उनके घात-प्रत्तिधात के कारण उच्चारित नही होता । 


प्रोकार : एक भरनुचिन्तन | [ १७ 


नासिका के श्रन्दर सेजो श्राकपंण क्रिया शन्दायमान होकर 
धीरे-धीरे उपर की शरोर उर्तीरहै, उस शव्दकीश्रोर जरा मन लगने 
पर श्रच्छी तरह समभ्मेश्रा सक्तादैकि वह्‌क्षन्द अस्पष्ट स्प से 
श्रोकार जंसारहै। यह्‌ शब्द कण्ठ, तालु श्रादि के घात-प्रतिघात कौ 
प्रपक्षा नरी करता यहां तक कि नासिकागत जो वायु उस 
ग्राकर्षणात्मक रिया का श्रनुसर्ण करता है, उसकी भी श्रपेक्षा नही 
करता । 

श्रोकार का विदलेषण करने पर जानाजतादहै किं यह्‌ उ'श्रीर 
“म' इन दोनो वर्णोकी समष्टिमात्रहै। यह्‌ श्रोकार उपर उठने के 
समयक्तमसेउ' का परित्याग करके म' कारमे पर्यवसित या लीन 
होता दहै) यह अस्वर मः ही साघनदहै। इसी से उपनिषद्‌ मे कहा 
है--“्रस्वरेण सकारेण यदं गच्छन्त्यनामयम्‌" । दस श्रस्वर “मः कार 
कारदोष भ्रंश ही प्रणव या श्रोकार है ग्रौर उसका निःशब्दमे लय होना 
ही ब्रह्यानुभूति, श्रात्मानुभूति, या स्वरूप प्राति है | 


[५] 


„ ॐ का उद्गम 
{ पचनमस्कार मंत्र] 
अपवित्रः पवित्रो वा, सुस्थित दुःस्थितोऽपि वा । 
ध्यायेत्यञ्चनमस्कार, सव॑यापैः प्रभुच्यते ॥ 
--एमोकारमंत्रमाहातम्य 
जो मन्त्र संसार के समस्त मन्त्रोंमे मुकुट-मणि है, जो समस्त 
कामनाग्रनो को कल्पतरु के समान फलीभूत करनेवाला है, लोक मे श्रनुपम 
ह, जिसके जाप ओर ध्यान से मलिनसे मलिन श्रात्मा भी निर्मल, 
निविकार, निरामय श्रौर निरंजन वकर अनिवेचंनीय एवं श्रलौकिक 
रदवं का भागी बन्न जाता है, त्रिलोकाधिपतित््व प्राप्त कर लेता ह, 
जिसे समग्र भ्रू त-सागह का श्रमूल्य भुक्ता माना गयां श्रौर जिसकी 
साघनासे कुंभी भ्रप्राप्य नही रहता, वह महामहिम मन्तरराज, 
नमस्कार मंत्र इस प्रकार ह 
रमो श्ररिहुताणं 
णमो सिद्धाणं 
रमो श्रायसियाणं 
णमो उवज्छायाणं 
णमो लोए सन्वसाहुणं । 
रथात्‌ श्ररेहन्तो को नमस्कार हो, सिद्धो को नमस्कार हो, श्राचा्या 
को नमस्कार हो, उपाध्यायोको नमस्कार हौ, लोक मे विमान 


सवं साधुप्रो को नमस्कार हो। 
दूस महामंत्र मे पाच पदो को नमस्कार किया गया हे श्रतएव यहे 


“पंचनमस्कारमेन' कहलाता है । 


ओंकार : एक भ्रनुचिन्तन | [ १६ 


कोई मनुष्य पवित्र हो या प्रपवित्र, सुस्थितिहौ यो दुस्थितं हो 
प्र्थात्‌ श्रात्मनिष्ठ टो या अ्नात्मनिष्ठ दहो ्रथना सोताचैठा हो यो 
चलता-फिरता हो, यदि वह्‌ पर॑चनमस्कार मंत्रकाध्यान करता तो 
सब पापो से सर्वंथा मक्त हो जाता है \ 


सामान्य मनुष्य कौ तो वातत ही क्या, भो निह, व्याघ्र श्रादिं 
तिर्य॑च जन्मतः मासमक्षी है श्रौर जो सपं श्रादि जन्तु स्वमावसे प्रर 
श्रौर जिन्होते सेकंड प्राणियो का हेनन किया है, सहस्वो पापो का 
श्राचरण कियादै,वेभौ प्नन्तिम समय ईस मंचको भ्राराधना करके 
देवगत्ति को प्राक्त करने मे समथं हए 1 


नमस्कारमंत्र श्राघ्यात्मिक, भ्राधिमौतिक श्रौर श्राधिदैचिक-सभी 
विंध्न-वाचे्भ्रों को दरूर करने वाला है। ग्रन्तःकरणा मे उत्पन्न होनेवाले 
रगे, देप, चितो, शोक श्रादि, जड पदार्थो के निमित्त से उत्पन्न होने- 
वाले कष्टो तथा भूत, प्रेत, राक्षस, पिशाच, डाकिनो शाकिनी, चडलं 
मादि के द्वारा उत्पन्न होनेवाली वाघाग्रोको शीघ्र श्रौर समूल निवारण 
करने मे इम मंत्र के समान अमोघ साधन श्रन्य नही दहै। लौकिक श्रौर 
लोकोत्तर--दोनो प्रकार के मनोवाचित सुख इस मंत्रराजके लाप मे 
निवास करते हँ । श्राप यदि बुद्धि प्राप्त करना चाहते दै, लक्ष्मी को दासी 
वनाना चाहते है, क्ति-कामिनी का वरण करना चाहते है, सिद्धि-वघु 
से सम्बन्ध स्थापित करने के प्रभिलापी ह, तो श्रोौपको इस मंत्रराजकी 
शरणे ग्रहेण करनी चाहिए । एेसी कोई लौकिकं श्रौर लोकोत्तर कामना 
नही, जिसको पत्ति मे यह समथं न हो । 


त्रैलोक्य मे एसी कोई महान्‌ श्रौर स्पृहुणोय वस्तु नरी है, जो इस 





# त्वा पापसहस्राणि, हत्वा जन्तु शतानि चं । 
भ्रमु मन्त्र समाराध्य, तियंञ्चोऽपि दियं त्ताः ॥ 
--्निारंव 


५ [ श्नोकार : एक श्रनुचितन 


महामंत्र के हारा प्रप्यन हो अज्ञान, मोह एवं विभ्रमक्रा जो श्रंधकार 
सहस्त्रो सूर्यं नष्ट नही कर सकते, वह भी इस महामन के प्रवल प्रभाव से 
विनष्ट हो जाता है। 


यह पच-नमस्कार जन्म-जन्मान्तर मे किए गए समस्त पापो को 
विनष्ट करनेवाला है रौर जगत्‌ के सवे मद्धलोमे प्रथम मद्धलहै। 
इसकी महिमा प्रकट करते हुए कहा गया है- 

जिरसासणस्य सारो, 
` चउदस पृव्वाण जो समुद्धारो । 
जस्स मरे नवकारो, 

' संसासो तस्स कि कुरद ?॥ 

जो जिनशासन कासार है श्रौर चतुर्दश पूर्वो से जिसका इद्रार 
किया गया है, एसा नमस्कारमव जिसके मन मे स्फुरित रहता है, संसार 
उसका क्या विगाड़ सकता है । 
एसो मद्धलनिलभरो, 

भवविलगश्रो सयलसंघसुदजखब्रो 1 
नवकारपरममंतो, 
चितिश्रमिच्चं सुहं देइ । 

यह मत्र मद्धल का आवास है, भवश्चमण का श्रन्त करने वाला है। 
परम मंत्र है श्रीर इसके चिन्तन मात्र से सुख की प्राति होती ह। 

श्रघुग्वो कल्पत, -चितामरि-कामकरु भ-कामगवी, 

जो धायई सकलकालं, सो पावई सिवमुदं विउलं 1 - 

नमस्कारमंत्र श्रपूवं कल्पतर, चिन्तामणि, कामकरुभ॒ श्रौर कामचेनु 
के समान है। जो भद्र मनुष्य सदा इसका ध्यान करता है, वहु विपृल 
सिद्धिमूख को प्राप्त करता है । ॥ । 

नवकार इछ भ्रव्खर, पावं फेडेद सत्त अयराद्‌। ^; ` '. 
~~ पच्चासं च पएणं, सायर पण-सय समगेणं । 


ग्रोकार : एकं अनुचिन्तन ] [- २१ 


, नमस्कारमंन के एकं श्रक्षरका ध्यान करनेसे भौ सात सागरोपम 

कालमे कयि गएपापनष्टदहो जाते रै । सम्पूणं महामे का ध्याने करने 

से पाच सौ सागरोपमो मे संचित पापो का विनाश होता ह) 
जो गुण लक्लभेगं, पूएड विहीए जिखणभुक्कारं 1 
तितत्ययरनामगोभ्र, तो पावरई सासयं ठा । 


॥ 


जो पचनमस्कार मत्र का विधिपू्वंक एक लाख वार जापकरतारै, 
श्रौर उसका पूजन करता है, चद्‌ तीर्थकर नाम क्म॑को उपाजन करता 
है ओर तत्पश्चात्‌ शाइवत धाम को प्राप्त करता है । 

ग्रहं व श्रदुसया, श्रदुसहस्सं च श्रटुकोटी्नो 1 

जो गुणइ नमुक्कारं, सो तश्यभवे लहई मोक्खं । 

जो भक्त भ्राठ करोड, ्राठ हजार, श्राठ सौ ब्राठ वार, नमस्कारमंत्र 
काजाप करता ह, उसे तीसरे भव्रमे मोक प्रात होताहै। 

हरई दुं ृणई सुहं, जद जसं सोसएु भवसमूद्‌ ! 

इह, लोए पर लोए, .सुहार मूलं नमोक्कारो । 

नमस्कारमंत्र दु-ख को हरण करनेवाला ग्रौर सुख उत्पन्न करनेवाला 
है। वह्‌ भवसागर को शोपण करनेवाला ग्रौर इहलोक मे तथा 
परलोक मे समस्त सुखो का भूल है 1 ,, 

भोयणस्मए सयणे, विवोहणे पवेसणे भए व्रणे । , .. 

पचणमुक्तारं खलु, समरिज्जा सव्वकालंपि। ¡] ,,. - ' 

भोजन करते समय, सोते समय, जागते समय, कही प्रवेद करते 
समय या वरते समय, किसी भी प्रकारका भय श्रवा संकट उपस्थित 
होने पर सदाकाल पेचनमस्कार मंत्र का स्मरण करना चाहिए 

जन शास्त मे, प्रद्र मात्रा मे 'ठेसी "कथाएं विद्यमान है जिनमे 
नमस्कारमंत्र के श्रद्भुत प्रभाव श्रौर सा्मथं को प्रकादित किया गया 
है । शलौ को सिहासनङे रूपमे परिणत करके सुदशंन श्रेष्ठी के 
सुय का विस्तार करना इसी - महान्‌ मंत्र काप्रभावथा। नाग जैसे 


२९। [ ओंकारः एक श्रनुचिन्तन 


क्र.र जन्तु को धरणे को. पदवी पर पहुंचा देते बाला यही मंत्र था। 
कंच्चे घागों वेधो छलनी से, कुएं से पानी निकालना इसी का चमत्कार 
था। वास्तव मे इस मंतके प्रभाव से स्फंभी सुमनमाला वन जाता 
है । विष, पीयरुषके रूप मे परिणत हो सकता है श्रौर भंयकर प्रारहारी 
रात्रु भी मित्र बन जत्तिहै। 


नमस्कार-मंच्र ्रनादि कालीन मूलमन्त्र माना गया है । भूतकाल र्मे श्र॑नत 
तीयेकर हुए है, भविष्यत्‌ मे श्रनेक तीथंकर होगे, परन्तु इस महामंत्र की 
श्रादि कोर््‌ नही जानते # क्योकि वहहै ही नहीं । जिसकी सत्ताही 
नही उसे कंसे जाना जा सकता है ? 


जैन घमं मे साधना का केन्द्र विदु कोर व्यक्ति विशेष नहीं! वह्‌ 
गुणपुजक घमं है । उसकी यह विरि्टता प्रकृत म॑मे भी पूरणस्पेण 
परस्फुटित हर्द है । यहा किसी भी देव विदेष को या व्यक्ति विदेप को 
नही किन्तु श्रात्मिक गुणो को विकसित करने वले--श्राध्यात्मिक 
विभर्ति को भ्राविभरुत कर लेने चतिजोभी महनीय पुरुप है, उनको 
नमस्कारः किया गयाः है 1 प्रत्तएवे यह्‌ मन्व मानवे-मात्र कौ श्रनमोल 
निधि है, किसी पन्थ, सम्प्रदाय या परस्परामे ही उसकी परिधि परि 
समाप्त नही दती । इसी महामंत्र मे प्रतिपादित पांच वन्दनीय पदो के 
श्राय श्रक्षरो से “ॐ की निष्पत्ति हई है, जंसा किं निष्पत्ति. प्रकरण 
मे बतलाया जा चुकाःहै। 


# स्रामे चौनीसी इई भ्रनन्ती, 
होशे वार अनन्त 1 
नवकारतणी कोई यादन जाखे, 
एम भये श्ररिहन्त ॥ 


[६] 
श्रोकार का जाप 


है 1% किन्तु भ्रनादि-कालीन कमं -भ्रावरणोके करणया योकहिपु कि 
वासनाग्रो के संसगं से उसको शक्तिया विकृत, मलोन, या श्रविकसित 
श्रवस्यामेहै। यही प्रात्माभ्नौर परमात्माके भेदका कार्यं है। 
उचित उपायो दारा जव श्रावणो का पुणंर्पसे उन्मूलन हौ जातादै, 
वासनाग्रो का श्रात्यन्तिक क्षय हो जाता है तो सघन घनघटा क विपरिते 
हो जनि पर जेसे सुधाकर श्रपने निर्मल-स्वच्छं स्वस्पमे प्रकट हौ जाता 
है, उसी प्रकार भ्रात्मा भी प्रपने शुद्ध चिन्मय स्वरूप फा साभ 
कर तेता है 1 


प्रत्येक संसारी श्राल्मा अ्रपने मूल स्वरूपमे निद्धदै, वृद है, धुय 


ग्रात्मिक शक्तियो को मौलिक एवं स्वाभाविक स्वरूप मे प्रकट करन 
मे श्रोकार मंत्र श्रत्यन्त उपयोगो होता है! योगियो का श्रनूभवटै भि 
श्रोकार मे श्रात्मशोघन कौ ब्रदुभुत क्षमतादै। यहीकारणटै कि क्स 


महामन्त्र के प्रति इतनी व्यापक श्रद्धा-भाचना भ्रत्तात काल से साधकवगं 
मेचलीभ्रारहीदहै। 


इस मन्त कौ रचना मे अक्षरो का कु एेसा विन्यास हुश्रा है, इस 
प्रकार का साम॑जस्य है करि इसका विधिवत्‌, लालवद्ता कै साय, जाप 
करने से फफडो मे उवास वायुका श्रावागमन इस रूप मे होता है 
जिससे शरीर के श्रान्तरिक श्रद्धोपागो को जोवनी शक्ति मे वृद्धि होती 


#% जारिसो सिद्ध सहावो, तारिसो सहावो सव्व जीवाणां 


-सिद्ध प्राभृत 


२४ ] [ ओंकार : एक ग्रनुचिम्तन 


है । स्वास्थ्य स्थिर होता ह, बल्कि गया हुशरा स्वास्य भी पुनः 
प्राप्त हो जाताहै। 


प्रनेक मन्त्र केवल लौकिक सिद्धिं प्रदान करते है तो कृ रेसे भी 
है जो. लोकोत्तर सिद्धिके कारण होते है, परन्तु शओरोकार मे. दोनो 
प्रकार कौ, सिद्धियां प्रदान करने की क्षमता है। श्राचा्थं हैमचन्द्र ने 
वतलाया है कि- स्तम्भन कायं मे पीत वणं के, वीकरण से लाल वरं 
के, शोभ कायं मे मूगे के वणं वाते, विद्रपण-कायंमे कले वरणं के 
-्रौर कर्मो का प्रक्षय करते के लिए चन्द्रमा के समान उज्जवल दवेत वरं 
श्रोकार का ध्यान करना चाहिए । इस विधानसेस्पष्टहै कि श्रोकार 
का ध्यान न केवल कर्मक्षय के लिए ही उपयुक्त ह वरन्‌ विस्मय जनक 
लौकिक उहद्यो की भी पूत्ति करता ह ।४ 


यो तो पुरुषार्थं चार माने गये ई-धमं, श्रयं, काम श्रौर मोक्ष, 
कितु इनमे साध्यभरूत दो हीर्ह--काम श्रौर मोक्ष । धमं, मोक्षकाश्रौर 
श्रथं काम कासाधनदह। कामका श्रभिप्राय लौकिक सिद्धि श्रौर मोक्ष 
का मतलव लोकोत्तर श्राध्यात्मिक सिद्धि समभना चाहिए । ्नोकार को 
` विद्वज्जन (कामद्म्‌' भी मानते दह रौर मोक्षदम्‌" भी। इसका भी 
ग्रभिप्राय यही निकलता ह कि श्रोकारके ध्यान से लौकिक भ्रीर लोको- 
तर-दोनो प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती ह। 


1 


श्रोकार के ध्यान की विधि पर प्रकार डालते हुए यही मुनि कहते 
है-हदय-कमल के मध्य में स्थित, शब्द ्रह्य-वचन विलास कौ उत्पत्ति 
के श्रद्धितीय कारण, स्वर तथा व्यंजन से युवत, प॑चपरमेष्ठी के वाचक 





# पीतं स्तम्भेऽरुणं वश्ये, क्षोभे विद्रमप्रभम्‌ } 


कुष्ण विद्र परे च्यायेत्‌, कर्मघाते रादिप्रभम्‌॥। 
--योगघास्य, ५८-२१ 


ओंकार : एक अनुचिन्तन ] 


एवं मूर्धा मे स्थित चन्द्रकला से भरने वाले श्रमृत के रस से 
महामन्त्र प्रणव शओ्ओकार का कुम्भक प्राणायाम करके ध्य 
चाहिये ।| 


{ तथा हूत्पद्ममधघ्यस्थं, शब्द ब्रह्य क कारणम्‌ । 
स्वर ॒व्यञ्चनसंवीतं, वाचक परमेप्ठिनिः। 
मूघंसस्थित शीताडु-कलामृतरस प्लुतं । 
कुम्भकेन महामन्त्रं, प्रणवं परिचिन्तयेत्‌ ॥ 
-- योग शास्र, ८-२६-३० 


[७ | 
जय साधना 


भ्रपने श्रभीष्ट मन्त्र श्रथवा इष्टदेव के नाम का पुनःपुनः रटन करना 
जाप कहलाता है । ध्यान मे मानसिक एकाग्रतापूर्वक मनन-क्रिया की 
प्रधानता होती है, जवकि जप मे शब्दोच्चार रटन की मुख्यता है । 
किन्तु शब्दोच्वार की प्रधानता का श्राय यह नही समना चाहिये कि 
उसमे मानसिक-स्रवधान की भ्रावश्यकेता नही श्रथवा एकाग्रता के लिए 
कोई स्थान नही । मानसिक श्रवधानहीन शब्दोच्चार मात्र फलप्रद 
नही होता। अतएवध्यान कौ भांत जपमे भौमनकौ स्थिरता 
श्रपेक्षित है जप श्रौर ध्यान मे जो भिन्नता है, वहु मन की 
स्थिरता कै तारतम्यकोलेकरहीटहै। श्रतएव जिस साधक कामन 
जितना अधिक एकाग्र होगा, उसका जप उत्तना ही अधिक 
फलप्रद होगा 1 

तो क्या मानसिक एकाग्रता की सिद्धि के विना जप करना 
ही नही चाहिये ? 

एसी वात नही है । जप वस्तुतः मानसिक एकाग्रता कै अनभ्यास 
का साघनदटहै। जिस साधक का मन पर श्रकुश स्थापितो चकारह 
श्रीर जोरसे किसी भी एक वस्तु पर टिका सक्तादहै, उसके लिये 
ध्यान की साधना भ्रधिक उपयोगी है। किन्तु जिनकौ भूमिका शअ्रभी 
निम्नश्रणीकीहै,श्रौरजो साधना पथ परन्येहीनये श्रवतीणं हए 
है, जो मन को निगृहीत करनेमे श्रपने को प्रसमथं पति है, उने जप 
साधना रूरना हितावह्‌ है 1 पवित्र शब्दो के सहारे मन कौ स्थिर 
करते करते श्रन्ततः ध्यानयोग की सिद्धि प्रात की जा सकती है। 

कुद लोग कटते हँ किं शव्द कितने हौ पवित्र क्यौनहो, वारंवार 


ग्रोकार : एक अनुचिन्तन | ] २७ 


उनकी पुनरादृृत्ति करनेसे क्यालाभरै? मगर णेता कटनेवाले जप 
के रथं को सही तौर पर समङेनरीदहै) जंसाकिश्रभीक्टाजा चुका 
है, जाप मे केवल शब्दोच्चार नही होता, उसमे मानसिक विचारो का 
भी योग होता दह! जपके शव्द जिह्वा ही उगलती जातौ हो, ठेसी बात 
नही ह । श्रादशं जप वही ह, जिसमे रसना भौर भ्रन्तःकरण दानो एका- 
कार हौ जाते ह1 प्रतएव जिह्वा हार पुनः २ उच्चारित शाब्द श्रीर 
परन्त.करण हारा ग्रहण किया हुभ्रा उनका प्रतिविम्ब अ्रन्तरतर मे एक 
ग्रद्भुत संस्कार उन्न करदेता हं) वह संस्कार वार-वारके श्रभ्यास 
से पुष्ट, वलिष्ठ, भ्रौर गम्भीर होता जाता ह| 
करत-करत श्रभ्यास के, जडमति होत सुजान । 
रसरी श्रावत जात ते, सिल पर परत निशान ॥ 
विद्यार्थी एक ही वार किसो पाठ को पटकर पाण्डित्य प्राप्त, नही 

कर सकता \ पाषाण-शिला पर एक वार रस्सी रग्डदेने माच से 

निगान नही वनता । इसी प्रकार एके वार किसी शब्द का उन्वारण 
करलेनेसे हीन चित्त समाहित दौ सकता श्रौर म निमित्त संस्कार 
वद्धमूल हो सकता है! श्रतएव पावन विचारो की श्रजस्र धारा प्रवाहित 
करते के लिए, उन विचारो को संस्कार का स्वरूप प्रदान करने के लिये 
श्रौर उन संस्कारो से भ्रनुप्राणित होकर जीवन मे दिव्यता, भव्यता श्रौर. 
विशुद्धता लाने के लिये प्रभु कानाम वारम्बार उच्चारण करना श्रनिवायं. 
है । सामान्य साधक के लिये इससे श्रधिक्र उत्तम जन्य कोई साधन नही 
है। जप साघनामेश्रग्रसर होता हुश्रा साधक व्यानयोग मे श्नः शनैः 
पराकाष्ठा प्रात कर लेता है श्रौर जन्ममृत्यु के श्रनादिकालीन्‌ विषम 
चक्र से मुक्ति प्राप्त केरलेताहै। 


ज~-पः शव्दमे नजो दो भ्रक्षर है-^ज' श्रौर प" विद्धान्‌ 'ज' को 
जन्मका विनाशकश्रौर पको पाप्र विनाशक. मानते ,है1# जन्म 


# जकारो जन्मविनच्छेदः, पकारः पापनाशकः 1 
तस्माज्जप इति प्रोक्तः, जन्म पाप विनाशकः | -भ्रागनेय पुराण 


२८] [ ओकार : एके भ्रनुचिन्तन 


मरण श्रौर पापका म्नन्त तव ही सम्भव है जव उल्लिखित प्रकार भे 
जप की साधना की जाए । 


जैवे रसायन के सेवन से शारीरिक शक्तिमे वद्धिदहोती है, उसी 
प्रकार जप साधना से सत्संस्कारो का निर्माण श्रौर संवर्धन होता है] 

जपै, विषहरण जडी से सपंका विष निरशेप हौ जाताहै, उसी 
प्रकार जप-साधना से मिथ्या दृष्टि श्रौर पापवृत्ति करा विप उतर 


जाता टै । 

जसे १०५ डिग्री तापसे तप्त व्यक्ति के मस्तक पर वफंकी पटी 
बांघने से ताप मन्द हो जाता है, उसी प्रकार जप साधना से ग्रन्तःकरणा 
का संताप मिट जाता है श्रौर श्रात्मा मे म्रपूवं उपंशमभाव का 
प्रादुर्भाव होता हं । 

जन धमं मे तपस्वरण के वारह्‌ प्रकार वतलाए गए है; जिनमे 
श्रनदानादि ६ बाह्य तप है श्रौर विनय श्रादि ६ श्रन्तरग रै, जप 
वस्तुतः तप के भ्रन्तगंत है श्रौर उसमे भी स्वाध्याय तथा ध्यान नामक 
ग्रन्तरंश तपोमे। जप का शाच्दिकं रूप स्वाघ्याय के श्रन्तर्गत है तो 
मानसिक एकाग्रता-रूप श्रंशध्यानकी कोटिमें समाविष्ट किया जा 
सकता है। दस प्रकारजपदो प्रकारके जपोंका सम्मिश्रराह। तप 
का प्रभाव श्रौर महात्म्य श्रचिन्त्यहै। उससे पूर्वं संचित कर्मजाल 
छिघ्-भिन्न हो जता है ओ्रौर नवीन कर्मो का भ्रागमन रुक जाता है] 
जैन साहित्य के पारिभाषिक शब्दोमे यही निजराश्रौर संवर है जौ 
मुक्ति का साक्षात्‌ कारण हं। स्पष्ट ह कि जप ममक्षु जनो के 
लिए श्रतीव श्रयस्कर ह। 

गीता मे श्यन्नानां जपयन्नोऽस्मि' कट्कर जप की श्रप्ठता का प्रति- 


पादन किया गया ह टीकाकार्‌ मधुसुदन सरस्वती कहते है कि 
हिसादि दोपौ से शून्य होने के कारण जपयन्न प्रत्यन्त विशोघक हं । 


ओंकार : एक भ्रनुचिन्तन | [ २६ 


श्रीपादलिप्त सूरि ने जप पो तोन प्रकार बयाम्‌ ?-- (६) णः 
८२) उपा बौर (३) मानस % 1 पराल्तिलेकचन्दर अन्यम भो य 
तीन प्रकार प्रतिपादित किए गए ईह, मनर उन्दुनि "भाष्या उप ~ 
व्वाचक) कन्द का प्रयोग किया 1 घल्दभेदर दने परमो यदना 
एकं ही है 1 भाष्य श्रयवा वाचक उपमे पच्योच्छारमा नने पन 


५ 
क 


होती ह 1 जिस जपके शब्दो को समोपवत्ता दरम्‌ मोन नुन मई, च 
भाष्य जप ह! जिस जपमे स्पष्ट पब्दोच्चारन दोर निए, पनन 
होता है, जिसे दूसरा सुन नदी सक्ता, उपयु जाप प्रचो ६1 ठा 
जाप वहि्जल्प श्रौर भ्रन्तर्जल्प दोनाते रदति दता ६.५ 
चिन्तन का स्पष्ट रूप प्रकट होने लगता ₹, वह्‌ मानम जप प्य 


पटा) 

जप के इन तीन प्रकारौ पर विचार करनेने सषट्टजायाद्रनि 

यह भेद वास्तव भे जपको तीन प्रणियाहीरहै, जो नाधनो मोम्यना 
के श्राघार पर विति की गर्‌ ह! शरस्मिफः प्रपन्यामे माप एव 
जप वाचिक होता है, उसमे मानस-प्रवधने की गह्य नहो प्रा पात्‌ । 
मगर लगातार के श्रम्यास से वह्‌ कुद ्राने वद्ना है-नरे योगान 
प्ररूढ होता है ! तव शव्दोमे श्रौर मानिकः धवधान मे समे मामं 


म॑न्ये 


स्थापित हो जाता है । इसके ग्रनन्तर साधक तीसरे सोपान ५ अभ 
होकर मानस जय करने मे सक्षम चन जाता ई । 


ष्म 


जपके ये प्रकार उत्तसोत्तर प्रकृष्ट श्रौर श्रषिफाधिकः पलदायपर 
हेति दै। भाष्यते उपगु प्नौर उपाय को भ्पे्ला मानस याव प्रधः 


रतगुणिते श्रौर सहस्रगुणित फलप्रद होते ह । बन्तुत्तः मानस तप 


स, 
# प्रतिष्ठा कट्पपद्धति 
॥1 
4 चसा चा मनसा वा, कार्यो जाप्यः समाहित स्वान्ते 
सतगुएमाय पुण्ये, सटस्व्रसंख्यं द्वितीये तु ॥ 


109 


२० | | ओंकार : एके अ्नुचिन्तन 


सही ध्यान की साधनाका प्रारम्भ होतादहै। 


जप क्रा सरल एवं प्राथमिक साधन मालाहै। माला मे पंचपरमेष्टी 
के १०८ गुणो के योग रूप १०८ मरियां होती ह एक वार यभीष्ट 
मन्ते का उच्चारण करके एक वार मिया सरका दिया जाताहै श्रौर 
इस विधि सै जप की संख्या निदिचत हो जातो है | जिस साधक के चित्त 
मे विक्षेप की बहुलता होती है या जिसकी स्मरण राक्ति कमजोर होती 
है, उसके लिये मालाके सहारे जपकरनाही श्रधिक उपयोगी ह। 
परन्तु चित्त की एकाग्रता की दृष्टि से श्रपनी श्रगुलियो के पर्वों पर जप 
करना श्रधिके ग्रच्छा है। 

किस भ्रगुली के क्सिपवंसे जापश्रारम्भ किया जायश्रौर किस 
भ्रनुक्रमसेश्रागे बढ़ा जाय ? इस संवेध मे. कोई एक निरिचित नियम 
नही है। विभिन्न प्रयोजनो की सिद्धि के लिए विभिन्न श्रगुलियोंसे जप 
श्रारस्भ करने का विधान मिलता है। मारणा-उच्चाटन श्रादि निकृष्ट 
प्रयोजन वले ्रंगृष्ठ से ग्रौर शचरू-संहार की दृष्ट भावनावाले तर्जनी से 
जपश्रारभ करते दहै। कितु मुमुक्षु साघक को इस प्रकार को मलीमस 
भावना को हृदयम स्थान नही देना चाहिए । उसका जप तो पार- 
मात्मिकं गुणो की श्रभिव्यवित के एकमात्र विदद उदक्य सेही होना 
चाहिये 1 इस उटंश्य के लिए श्रनामिका श्रंगुली से जाप प्रारम्भ करना 
प्रगस्त मना गया ह। 

्रमुली के पर्वों से जप करना श्रावृत्त जप कहलाता है । साधारण- 
तया श्रावृत्त पाच प्रकारके ह- 

१ प्रवृत्त 

२ शंखावृत्त 

३ नन्दावत्त 

४ श्रोवृत्त 

५ हौवरत्त 


भ्रोकार : एक भ्रनुचिन्तन | [ ३१ 


श्रावृत्तः-श्रपने दाहिने हाथ कौ कनिष्ठिका श्रेगुलो के नीचे के 
पर्व से अ्रारम्भ करके तीनो पर्वं गिन, फिर अ्रनामिका, मध्यमा ओ्रौर 
तर्जनी के ऊपरी तीन पर्वो की गणना करे तत्पश्चत्ि तजनी का मध्य 
रौर, नीचे का पर्वं, सध्यमा का नीचे का पव, ्ननामिका का मध्य 
पर्व ग्रौर फिर मध्यमा का मध्यमभिने) नौ वार इसप्रकार जप करने 
से १२८६१०० संख्या होता दै) यह श्रावृत्त शीघ्री शान्ति 
तुष्टि भ्रौर पुष्टि करनेवाला माना जाता दं। 


शंखावृत्तः- मध्यमा अ्रंगुली के मध्यम पवसे प्रारम्भ करे, फिर 
अनुक्रम से अ्रनामिका का मध्य पव, अनामिकाका नीचे का पव, 
कनिष्ठिका का मूल, मध्यम श्रौर उपरी पवं फिर श्रनामिका का उपरी 
प्व, मध्यमा का ऊपरी पर्वे, तजनो का ऊपरो, मव्यम श्रौर निचला 
पवं गिने । इस प्रकार गणना करने से शंखावृत्त होता हँ । 


इस श्रावृत्त से जाप करनेवाला दैवी उपद्रवो से पीडित नही होता । 
उसकी मनोकामना पणं होती ह 1 . सुख, शांति श्रौर धेयं प्रात करने के 
लिए यह्‌ श्रावृत्च उपयोगी माना जाता ह । 


नन्दावृृत्तः--इसकी गणना का उपक्रम इस प्रकार हैः--तजैनी के 
उपर का, मध्यकागश्रौर नीचे का पवं, मध्यमा के नीचे का, श्रनाभिका 
के नोचे का, मघ्यका, भौर उपरका, श्रौर फिर मच्यमाके ऊपरका 
तथा मच्यमा के मघ्यका पर्वं । 


इस श्रावृत्त मे कनिष्ठिका भ्रंगूली त्याज्य है, अतएव बारह वार 
उक्त क्रम से श्रावृृत्ति करने पर एक माला पणं होती है । 


यह्‌ श्रावृत्त विक्ेपरूपसे मागलिक मानागया हं । इसके जपस् 
सत्ति, तुष्टि, पृष्ठि ओौर श्रारोग्थ को प्राति होती हु । 


ॐ श्रावुत्तः- इसका जाप मच्यमा भ्रगूली के मध्यम पर्वं से प्रारंभ 


२२ | [ ओंकार : एक अनुचिन्तन 


होता है । तदन्तर श्रनामिक्रा का मध्यम पर्व, अनामिका का ऊपरी पव॑, 
मघ्यमा का ऊपरी, तर्जनी का उपरी, मधच्यम श्रौरं नीचे का परव, 

मध्यमाके नीचे का, अ्रनामिकाके नीचेका, कनिष्ठा के नीते का, 
मघ्यकराश्रौर ऊपर का पर्वं गिनना चाहिए । 


इस ्रावृत्त का दूसरा ज्रनुक्रम भीर, जो इस प्रकार हः- 
श्रनामिका के मध्यम पवते प्रारम्भ करके, मध्यमा का मच्यम पर्व, 
मध्यमाका नीचे का पवं, अनामिका का नीचे का पवं, कनिष्ठा के 
नीचे का, मघ्यका, श्रौर उपर का पवं, श्रनामिका का ऊपरी, मव्यमा 
का उपरी, तर्जनी का ऊपरी, तर्जनी कामव्यका, प्रर नीचे का 
पवं गिनना चाहिए । 

ॐ श्रावृत्त का तीसरा गणना प्रकारभीो ह) वह्‌ द्वादश अदभु 
के वदले नव श्रद्धोमे भी गिना जाता ह । लेकिन उसका महव श्रधिक 
नही माना जाता । वह इस प्रकार ह-मच्यमा का मध्यम पर्व, श्रना- 
भिका का मव्य पर्व, श्रनामिका के नीवे का, मध्यमा कं नीचे का, तजनी 
के नीचे का- मघ्यकराश्रौर उपर का, मध्यमा के ऊपर का, श्रनामिका 
के ऊपर का श्रौर कनिष्ठा कं उपरका, मघ्यकाश्रौर नौचेका। 


जव यही श्रावृत्त नव श्रद्धोमे गिनाजाता ह तो श्रनुक्रम इस 
प्रकार होता हैः--मव्यमा का मध्यम, मध्यमाका उपरी, तर्जनी के 
मघ्य का, मध्यमा के नीचे का, श्रनामिका के मधघ्यका, तर्जनी कं 
ऊपर का, तर्जनी के नीचे का, श्रनामिका के नीचे का प्ररं भनामिका 
कें ऊपर का। 

हीं भ्रावृक्तः--सवं प्रथम तजनी का ऊपरी पव॑, फिर मध्यमा का 
ऊपरी, अनामिका का उपरी, कनिष्ठिका का उपरी, कनिष्ठिका फा 
मध्यम, श्ननाभिका का मध्यम, मध्यमा का मध्यम, तर्जनी कामघ्यम, 
तर्जनी का निचला, मव्यमा का निचला, श्रनामिका का निचला श्रीर 
कनिष्ठिका को निचला पवं गिनना चाहिए 1 


परौकार : एक अनुचिन्तन | | ३३ 


उथ्कार महामन्त्र का जाप करने कं लिए ॐ प्रावृत्त सवक 
है। माला के दास या ॐ ब्रावृत्त के हरा ही इसका जाप 
करना चादिए 1 

माला श्नौर श्रावृत्त के श्रतिरिषत तीसरौ जप विधिभीर्ह जो कमल 
विधि कहलाती है 1 इसमे हदय प्रदेश मे एक स्वेत वं कमल का चितन 
किया जाता हं । कमल मे श्राठ पादु डियो श्रौर प्रत्येक पारडी पर वारह्‌- 
वारह्‌ पीत-वं विन्दुञ्रो को कल्पना करफे उनका चिन्तन किया जाता 
है । किन्तु यह विधि पहुचे हए साधको के लिये ही उपयुक्त है, साधारण 
श्रोखी के साधको के लिए नही । श्रतएव इसका उल्लेख मात्र ही यहा 
कर दिया गया है । 


[क 


| ८ | 


दिविध साधना 

सक्षम दृष्टि से देखने पर श्रखिल विव्व एक साधना-सदन-सा प्रतीत 
होतादहै। कौनसा प्राणीहैजो कामनामयन हो? दछधोगहो या 
वड़ा, सरक्त हो या अशक्त, विकसित हो या प्रविकसित, महाप्राण हो 
या ्रत्पप्राणा, यहांतककि योगीदहोया भोगो, सभीमे किसीन 
किसी प्रकार कौ कामना विद्यमान है । प्रत्येक जीव कौ प्रत्येक प्रवृत्ति 
करिसीन किसी कामनासेप्रेरित हीहोतीदै श्रौर कामना कौ पत्ति के 
लिये किया जानेवाला उपाय य पुरुषां ही सावना है। जहां 
कामना है वहां साधना है। जव तक कामना है तव तक साधना है। 
कामनासे मुक्ति मिले विना साधना की समाति नही होती । श्रतएव 
जगत के समस्त प्राणी साधना में निरत है। 

किन्तु पूर्वकाल मे श्रजित, संचित एवं सिचित संस्कारो की श्रौर 
वतंमनकालीन वातावरण तथा तञ्जनित विचारों को विभिन्नता भ्रादि 
के कारण सवक्ो कामनाएँं एक-सौ नहीं होती । जव काम्य ित्न 
प्रकार के होते टै, तो उनको उपलव्धिके उपायो एवं साधनोमे भी 
भिन्नता होना स्वाभाविक है। 

मूल रूप मे कामनाएं दो प्रकार की है-लीकिक शौर लोकोत्तर । 
संसार के श्रधिकादा प्राणी लौकिक कामनाग्रोमे भ्रस्त है! कोरर धन 
सम्पत्ति के लिये समय-प्रसमय का विचारन करके दिन-रात पच रहा 
हैतो कोर सत्ताप्रीर प्रभुता की प्राति के लिए जमीन-प्रास्तमान एक कर 
रहा है 1 कोई गगन-दुम्वौ प्रासाद का स्वप्न देवता दै तो कों पल्नी- 
पव्र-परिवार श्रादि की प्राति के लिये प्रयलगीलदै। तात्पयं यदै 
लोग भौतिक पदार्थो को जुटानेमे ही संलग्न दृष्टिगोचर होते ६ । पेत 
लोगो क्रा काम्य लौकिक-भीतिक होनेसे उ्फे लिए किया याने 
वाचा पुरुपा्थं भी लौकिक साधना के व्रन्तर्गत दै। 


ग्रोकार : एकं अनुचिन्तन ] [ ३५ 


मगर इस प्रकारको साधनां वास्तविक साधनानही कटी जा 
सकती । प्रथम तो प्रचण्ड से प्रचण्ड पुरुषार्थं करने बालोमेसेभी वहतो 
को श्रमीष्ट सिद्धि-सफलता प्राप्त ही नही होती, कदाचित्‌ प्रप्त हो जाय 
तो उनका श्रभीष्ट बदल कर दूसराही स्प धारण करलेतारहै। मानव 
कौ कामना मे स्थिरता नही होती । एक कामना की पूर्ति होते न होते 
दूसरी अनेक कामनाएं उत्पच्च होती जाती है । जैसे ्रपनी प्रतिच्छायाको 
पकड सेना रौर क्षितिज को द्र लेना सम्भव नही, उसी पकार अ्रनि- 
यतित कामनाग्रों कौ पूति होना प्रसंभवरहै। इस प्रकार एक कामना 
की पूति होने पर सुख-सन्तोप के वदले नवीन उत्पन्न भ्रनेक श्रपणं 
कामनाएे, चिन्ताए, उद्विरनत्ताएं ही ष॑दा करती ई । 


मान सीज्यि--किसीकीकामना ते एक सीमाकानिर्माण कर लिया 
श्रौर वह पणं भी हो गई रै। वह भ्रव सुखी है, सन्तुष्ट है । परन्तु स्या 
उसका सुख श्रौर सन्तोप शाश्वत है ? जिन भौतिक पदार्थो के संयोग पर 
उसके सुख-सन्तोष का भव्य-भवन खडा हुभ्रा है, उनके विनष्ट होते 
कितने क्षणा लगते है ? परिस्थिति का एक ही कफाचात क्या उसे क्षण 
भरम विलग नही कर देता ? तव मनुप्य का वह्‌ सथुर-स्वप्न पल-मर्‌ 
मे समाप्तो जाता रौर वह्‌ एक करुण दारुण वेदना से श्रभिभूत 
होकर कराहता रह जाता है । 

चलिए, यह भी मानले कि उसकी सुख-सामग्री स्थायौदहै प्रौर 
पुण्य के हद वन्धन से श्रावद्ध होने के कारणा उसमे चिलग नही होती, 
परन्तु उसका जीवन तो घ्रूव नही दहै) एक दिनश्रत्ताहै कि वहु स्वयं 
उसे छोडकर किसी श्रन्नात रहस्यमय पथ का पथिक वन जाता है भौर 
जहा जाता है वहां नये सिरे से श्रपनी सृष्टि स्वता है । पहले का किया- 
केराया सव भूल मे मिल जाता है । 


श्रव लोकोत्तर साधना कं सम्बन्धमे विचार करर । आध्यार्मिक 
उत्कषं को उपकलिव्ध के लिए किये जाने वाले उपाय एवं प्रयास लोकोत्तर 


३६ 1 [ कतार : एक श्रनुचिन्तन 


साधना है । प्राघ्यात्मिक उत्कषं प्राप्त करने का श्रभिप्राय किसी वाद्य- 
पर-पदायं या उसके भ्राघार पर वैशिष्ट्य प्राप्तकरना नहीं है । क्योकि 
वे भ्राघ्यात्मिक उत्कपं की प्राति मे बन्धक हो सकते ह, साधक नही । 

श्राध्यात्मिक उत्कषं का श्रयं श्रात्मा कौ सहज स्वाभाविक शनितियो 
का भ्राविभवि करना ह । वस्तुतः श्रात्मा ग्रीर परमात्मा कं स्वप में 
कोई मौलिक श्रन्तर नही ह । जो श्रात्मा प्रकृष्ट साधना फे वल से कर्मा 
वरणो को छिन्न-भिन्न करके श्रपने ्रसली स्वरूप की प्राति कर लेता 
ह--परिपुणं वीतरागततत्व प्रात केरके श्रनन्त ज्ञान, दर्शन, सुख ओर 
वीयं का लाम कर तेता रहै, वही परमात्पद का भागी हो जाता ह। 

लोकोत्तर साधना की सिद्धि के लिए भौतिक पदार्थो के भ्राकर्पंरा से 
मुक्त होना मरौर भ्रन्तंमूख वनना श्रावद्यकं है। साधक मलोभाति 
जानता ह॑ कि पर-पदार्थोके संयोग मे सुख समभने की श्रनादिकालोन 
भ्रान्तिही दुःखों का वीज हँ । उनके प्रति जितना भ्रधिक भ्राकपंण या 
श्रनुराग होगा, उतनी ही श्राक्रुलता श्रौर इतना ही भ्रधिके क्षोभ उत्पन्न 
होगा 1 रपरः कं भ्रवलम्बन मे ईन्यहै, दुःख ह श्रानन्दतो भ्रात्मा 
काही स्वभाव दह श्रौर इनकी प्राति रात्मोन्मुखहोनेमेंदही हं) 

इस परम सत्य को ृदयद्धम करलेने के कारणं साधक वाद्य सुस- 
साधनों से विरत शरीर श्रातम-मरण मे निरत हो जाता ह । वहु जव श्रषने 
श्रन्तरतर की गहराई में वको लगाता है तो उसे श्रपनेही भ्रन्दर प्रनत 
्नानन्द का लहराता हमरा सायर दिखाई देता ह । इस प्रकार भौतिक 
वस्त्रो के प्रति उसका श्रनुलग एवं श्राकपंर क्षीण होता जता रोर 
सहज स्वरूप के प्रति भ्राकपंण बढता चला जाता हं । दानैः २ उपे पूणं 
श्रात्मनिष्ठा प्रापि होतीहं1 वह सिद्ध, वृद्ध, मुक्त श्रोर परमज्योपि- 
स्वरूप वन जाता ह । यही निद्धि द, यदी मुत्ति द। 

यह्‌ सिद्धि परम श्रौर चरम है, क्योकि परपदा्थं कौ प्रपा न 
होने से वह्‌ दार्वत है, प्रनन्त हं श्नौर उनमे किचिद्‌ भी श्रपृता 


नही होती । 


प्रोकार ; एक अनुचिन्तन ] [३७ 


तात्पयं यह्‌ ह कि लौकिक सिद्धि क्षणिक होतो ६, लोकोत्तर सित्नि 
सारवत 1 लौकिक सिद्धि अनेक अआकूलताघ्ो कौ जननो ह, लोक)त्तर 
सिद्धि अ्रनन्त निराकुलता कौ उत्पन्न करती ई 1 लौकिक सिद्धिसे भ्रात्मा 
का भव-भ्रमण वडता ह, लोकोत्तर सिद्धि जन्म-मरण के चक्रन्यू्‌ से 
वाहर निकाल देती है । एक वार उसे प्राप्त कर तेने फे परचात्‌ कु नी 
प्राप्य नही रह्‌ जाता । ध्रव कृतकृत्यता भौर निष्काम प्रदान 
करती हं । 


इसी कारणं विष्व के मनोषौ लोकोत्तर साघनामे ही परम 
तिधयसू मानते रै 1 


{€ | 


साधना की समग्रता 


साधनाः शव्द से यहां लोकोत्तर साधना ही श्रभिप्रेत है, क्योकि 
वही साधक को कृतार्थता प्रदान करती है । 

प्रन यह ह कि जिस स्ाघनासे श्रात्मा को पारमातिमिक गुणो की 
पर्ति होती है, आत्मा के समस्त दुःखो कौ श्राव्यन्तिक निवृत्ति हो जाती 
है रौर वह ग्रपनी श्रसीम समृद्धि के भ्रक्षय कोप का श्रधिकारी वन जाता 
है, उसका स्वरूप क्यार ? 


इस प्रदन पर चिचारकरतेट तो ग्रनेक रृ्टिकोण हमारे समक्ष 
उपस्थित होते है । उनमे से एकं वहुप्रचलित दृष्टिकोण साधना के तीन 
रूप स्वीकार करता ह- नान, कमं गीर भक्ति! सास्यौका भ्रव, 
मनन, निदिध्यासन, ध्यान, समाधि श्रादि का श्रवलम्बन ज्ञानमार्ग 1 
निष्काम भाव से भ्रपने-जपने वणं ्रौर श्राश्चम के श्रनुरूप प्रनुप्ठने 
करता कमंमागं है । इसमे दान, यज्ञ-याग, जप, तप, व्रत, नियम श्रादि 
कर्तव्यो का समावेश होता है। चित्तवृत्ति का निरन्तर भ्रविच्छिप्न स्प 
से भगवान्‌ मे लया रहना श्रथवा भगवान्‌ मे ्रनुराग या श्रनन्य प्रेम होना 
भक्तिहै) प्रभु फा स्तवन, संकीर्तन, गुरगान आदि भक्ति मे टी 
प्रन्तगंत है 1 

वौद्धधमं भावना-प्रचय को मुक्ति फा साधनं मानता टै। अतिन 
विदच क्षण विनदवर टै, दुःखमय दै, श्रदुचि ई, पुनःपुनः दन प्रकार का 
चिन्तन करने से भावनाप्रचय होतादहै। इसमे चित्त कौस्मलता फा 





 योमास्तयो मया प्रोक्ता, नृणा भ्रंयोविचिन्सया 1 
ज्ञानं कर्म च भक्तिदच, नोपायोऽन्यौ<रिति कुमचित्‌ ॥ 
--भामयत्‌, {१-२०-६ 


प्रोक्षार : एक भ्रनुचिन्तन | ॥ ३६ 


विनाशा श्रौर निमचता का विफान होता द श्रौर निर्यात फ़ 
प्रप्ति होती है) 

साख्य न॑यायिक्रत अदि कतिपय दमन तत्वन्ानसेटो मृक्ति-लनि 
फा प्रत्तिपादन कसते र1 


इस प्रकार साधना के सम्बन्ध मे अनेकः मत भरचतित दे । किनु उक्त 
सतीन मार्गोमेहौ क्सीन किसी ल्पमे सवका समवे हो जता र। 
मगर देखना यह्‌ है कि स्या उक्त तीन मार्गं परस्पर निरे होकर 
साधक को उसके लघ्य तकत पहुंचा सक्ते है? क्या ज्ञान, कमं प्रौर 
भवित तीन मागं है श्रवा तीनोका समन्वित्त रूप एकं साधनामा्यं 
है ? कतिपव सोगोफौ घारणा है कि उपयुक्त त्तीन साधनोमेत्ते किरी 
भी एक साधने केदारा मुक्ति प्राप्तकीजा सक्तो है! मगर यह्‌ 
घारणानतोत्तकंसेश्रौरन प्रनुभवसे ही समीचीन प्रतीत हत्ती रै। 
कमं यदि सुविहित-सुआषस्यात हो ततो भो वह्‌ ज्षान-निरपे् होफर कफारयं- 
कारी नही हो सक्ता! दसी प्रकार क्रियाशून्य ज्ञान भौ सिद्धिप्रद 
नही हो सक्ता 1 


यह्‌ सत्य है कि सभो मुमूक्षु साघक्तो को रचि, यौग्यत्ता या पात्रता 
एक-सी नही होती ! एक ही साधक का स्तरभी सर्दव समान नही 
रहता भौर शास्त्रकारो ने समी को साघन सुलभ करने फा प्रयत किया 
है1 तथापि इससे स्राधनाके स्तरमे ही भेदो सकतादहै, मागंमे 
नही । प्रत्येक कायं कौ निष्पत्ति किसी एक कारणस कदापि नही 
होती, उक्षके लिये कारणो की समग्रता भनिवायं है) दस नियम के 
भ्रनुसार मुक्ति प्राप्त करने के लिये जिन कारणो की भ्रनिवायं प्रावद्यकता 
दै, उनकी समग्रता ही साधना का राजमागं हो सकता है) 


जेन धमं प्रचेक कोत्र मे श्रनेकान्तवाद को प्रश्रय देता है, क्या तत्व 
दशेन के कोत्र मे श्रौर क्या साघना-केत्र मे, उसका रष्क सदा-सर्वंदा 
प्रनेकान्तात्मक ही रहता है1 इस दृष्टिकोण के भ्रनुरूप उसने समभ्यम्लन 


४० |] [ ओंकार : एक भ्रनुचिन्तन 


मरौर सम्यक्‌-क्रिया को सम्मिलित को साधना का स्वल्प स्वीकार किया 
है 1% वस्तु-स्वरूप को जान लेने मात्र से भ्रथवा श्रनजाने क्य करने 
मात्र से सामान्य सौक्रिकं सिद्धियां भी प्राप्तनहीकौजा सकती तो 
भ्रनादिकालीन विकार-संस्कारो कौ गहरी जडो का उम्पूलन कैसे किया 
जा सकता है ? आत्मके विकास कौ उच्वत्तम भूमिफा किस प्रकार 
प्राप्त कीजा सकतोदहै? 

जो रोगी निरोग होना चाहता, उमे रोगके स्वरूप फो समभना 
पड़गा, रोगफे कारणों को जानना पटगा श्रीर उसके निवारणं फे 
लिए उपयुक्त श्रौपध को भी समभना होगा क्रतु यह सव जान तेनै 
से ही नीरोगता प्राप्त नही को जा सकती । उसके लिएश्रौपधका सेवन 
भी करना पडता है । 

स्पष्टहैकिनतोज्रीपधके न्नान माच्रभे श्रारोग्य लाभेफिथा जा 
सकता है श्रौर न श्रनजाने किसी भी श्रौपघके सेवन भेही। ध्रारोग्य 
लाभ के लिए श्रौपघ का ज्ञान श्रौर सेवन दोनो जँसेश्रनिवायंषहै, उसी 
प्रकारं श्रात्म ुद्धिके लिये ज्ञान श्रौर क्रिया की श्रावदयकता होतो ह । 

भ्राचायं शय्यं भवे ने दगवैकालिक सूत्र मे साधना का घ्रनुङ्रम प्रद्ित 
करते हुए कहा हं -] 

साधक के लिए भावश्यकदटै कि वहु प्रथम सभ्यग्नान प्राप्त करर 
फिर तदनुकरूल श्रुप्ठान को श्रषनाए क्योकि ग्रन्नानो प्राणी अपने धं यस 
श्रश्रयस कफो नही समभ सकता । 

जो साघक जड-चेतन के भेद फो नही जानता वह्‌ संयम फो भी नही 
जान सकता ! संयम फे वास्तविकं स्वल्प फो सममनेके तिये जदृश्रौर 
चेतन के स्वरूप का मानः होना प्रनिवायं दै । 





# नारकरिरियाहि मोक्सो । 


¡} देखिये दय्च॑कालिक मूतर श्रघ्ययन ४ गावा १०-२५। 


प्नोकार : एक अनुचिन्तन | [ ४१ 


जड-चेतन का स्वरूप परज्ञान हौ जाने परहीजीवोकी नाना 
गत्तियो एवं योनियो का परिज्ञान होता है नौर तव पुण्य श्रीरपापकी 
कसौटी हाथ लगती है । 

जव पुण्य-पाप श्रौर वन्ध-मोक्ष की कसौटी हाथ प्राती है तौ साधक 
के चित्त को दैवी श्नौर मानवी भोगो के प्रति विरक्ति उत्पन्न हौ जाती है । 

जव भोगके प्रति विरक्ति उस्पन्नहो जाती है तव साधक वाह्य 
संयोग-घन-घाल्य, पुत्र कलवर भ्रादि ग्रौर भ्रास्यान्तर संयोग--क्रोघ, मान, 
माया, लोभ श्रादि-का व्याग करदेताहै। 

वाह्यास्यन्तर संयोग का त्याग कर देने परं प्रव्रज्या श्नद्धीकार करता 
है, तदन्तर उक्ृष्ट संवर एवं श्रनृत्तर धमं कौ श्राराघना करके क्म॑-रजं 
को हेटा देता है गओरौर सर्वजञ-सवदर्शी होकर परमात्मपद प्रास करता है । 

परमात्मपद प्राप्त होने पर भ्रात्मा जीवनू-मुक्त दा का भ्रनुभव 
करने लगता है श्रौर फिर भ्रनुक्रम से विदेह सूक्ति प्रास्त करता ह| 

इस प्रकार ज्ञाचाजंनसे प्रारम्भ हुई साधना क्रियात्मक वनकर 
विदेह-मुक्ति मे पयंवसित होती ह । 

श्रनेकान्तवाद का यह्‌ समन्वयवादी स्वर जन परम्परा की परिघिमें 
ही नही धिरा रह सका । बाहर भी उसकी गज सुनाई देती ह । महषि 
हारीतने भी उसी स्वर को दोहराते हुए का है--जैसे पंछी श्राकाश्च मे 
दोनो पखो कै सहारे ही गति कर सकता ह, एक पंख से नही, उसी 
प्रकार सादत ब्रह्म की उपलब्धि ज्ञान श्रौर क्रिया के समुचित समन्वय 
से ही सम्भव हं 1४ 

कुछ लोग समभतते है कि भक्लेज्ञानसे याक्मसे या श्रकेली 
भक्ति से साधना सफल दौ सकती हवे भ्रममेदहै। 


£ उभाभ्यामेव पक्षाम्यां यथा चे पक्षिणा गतिः । 
तथव ज्ञानकरमैभ्यां, प्राप्यते ब्रह्य शास्वतम्‌ ॥ 


--हारीतसंहिता 


= ओक्तार 
४२ ] [ ओंकारः एक अनुचधिन्तनं 


वह्‌ वटोही कंसे ग्रपनी मंजिल तक पहुचेमा जिते यही मानूम नरी 
कि मंजिल क्वा हँ, कहाँ है ? मंजिल तक पहुंचने की राहु कौन ३१ 
जो नेत्र वन्द करके चलाजारहाहैश्नौरचलताहीजा रहार, षट्‌ 
जीवन पर्यन्त चलने के पश्चात्‌ भो भ्रन्त मे श्रमफलता का ही 
भागी होता ह! 

इसी प्रकार जो साघ्यके स्वरूप को समता, साधनो से भली- 
भांति श्रभिज्न ह ओर पय से परिचित है, ्रपने प्रसर पाण्डित्य रे सावना 
क सम्बन्ध मे प्रभावशाली प्रवचन करके दूमरो का पय-प्रदर्णेन कर सफवा 
ह, वहु यदि साधनाके पथ परएकडगमभी नही सर्पता तो कति 
प्रकार सम्भव ह कि यह्‌ अ्रपनी मंजिल तक पहुंच सकेगा ? 

जनागमोमे कही २ नान श्रीर्‌ क्रिया (चारिन) के साध सम्यम्‌ 
दशन कोभी साधनाका श्रद्ध स्वीकार किया गवा ह| भ्रौर कदी 
सम्थक्तप को सम्मिलित करकं साधना का चतुमु सी स्वर्प मानागया 
है! कितु इसमे विरोध जसी कोद वस्तु नहीं ह । यह्‌ विभिन्न योग्यता 
कं पत्रोको समभनेकी लीद । सम्यग्दरदानका ज्ञानमेप्मौर्‌ तपका 
क्रिया मे समाव होता ्ह। कटी संहोपमे ओरौर कही विस्तारमे प्रति- 
पादन करना सहृदय शास्व्कारो की पदति रही हं । 

उत्लिखित ज्ञानमार्गं, कर्ममागं श्रीर भक्तिमागं भी स्म्यगूतान, 
सम्य्दर्दान, सम्यक्‌ चारित्र श्रौर सम्यक्तपमे समाविष्टो जति ु। 
ज्ञानमागं सम्य्तान मे, कर्ममागं सम्यकुचारिि मे रौर भक्तिमामं 
सम्यक्‌ तप मे समाविष्ट द। 





_~-----+--------~ 


¡ सम्पग्द्नक्ञानचारिव्ाणि मोक्षम । 
त्वाप मू 


1 नारं च दंणं चेव चरित च तवो तहा) 
एयमग्गमगुप्पत्ता जीवा गच्छंति सगर ॥ 


म्रोकार : एकं अनुचिन्तन | [ ४३ 


हा, यह नही भूल जाना चाहिए कि जेनधमे का अपना एक विशिष्ट 
मौलिक शओ्रौर उदार दृष्टिकोण दहै अपने दृष्टिकोण के वैशिष्ट्यं के 
कारण उसकी कमं श्रादि को व्याख्यां भौ विशिष्ट है । 


जैनधमं श्राश्रम व्यवस्था को स्वीकार नही करता भ्रौर वशां व्यवस्था 
को सिफं सामाजिक व्यवस्था मानता है । वह मनव-मानव के वीच कोई 
जन्मजात उच्चता-नीचता स्वीकार नही करता । सवको समान श्रवसर 
श्रौर श्रधिकार के सिद्धान्त को हिमायत्त करतार) ग्रतएवं लोकोत्तर 
धर्म-साधनामे आश्रम यावके भेद सेकमं (चारित्र) कामेद वह्‌ 
ग्रनूचित मानता है । यह सम्भवे नही किब्राह्मणहोनेके कारण एक 
व्यक्ति आस्त का पठन-पाठन करके मोक्ष प्रात करे ग्रौर दूसरा शूद्रहोन 
के कारण सेवा हारा वही मोक्ष प्रात्तकरले; वास्तव मे साधक मात्रके 
लिये, चाहे वह किसीभी वणं या प्राक्नममे हो, कमं या सम्यक्चारित्र 
काएकहीरूपरहै) 

ग्रलवत्ता परिस्थिति श्रौर योग्यता सवकी समान नही होती, श्रत्तएव 
उनके चिका एवं विकास केवेगमे ग्रन्तर हौ सकतादहै, कितु चरम 
विकास करने का अधिकार सवको समान है। उनके विकास का मागं 
भीएकदही दह) 

भक्तिमागे के विषय मे अ्रलग परिच्छेद मे विचार करेगे । 


(1 


[१०] 


साधना का स्स्व : सनोविजयं 


परात्मा के ब्रस्तित्व कौ ग्रभिव्यक्ति का प्रवान साधन, श्रात्म-लापारो 
का सर्वाधिकं प्रभावली ग्रौर समर्यं वाहन तया इष विराट्‌ जगन्‌ कै 
साय श्रात्मा का भ्रनुसन्वान करने वाला मनहीहै। मनश्रात्मा का 
वह्‌ अद्भुत हार है जिससे चिन्तन-मनन सामने श्राते ह! मन चेतन-देप 
का महामात्य है, जिसके विना उसका घडी भर भी काम नहौ चलता । 
सचमुच मन में प्रसावारण क्षमत्तादै, वेगै) हुमजौ नी सोचते, 
समभते, चिन्तन करते रौर तकंणाक्रेहै, स्व मनकी शक्ति क 
हासदही करते ह। 


मन स्वयं आत्मा की मूत्यवान्‌ शक्ति है । परन्तु रक्तिका उपयोग 
सर्दव दोहरा होतारहै। दूसरे शब्दोंमेकेहाजा सकता कि श्निः 
दुधारी तलवार है । राक्ति के सदुपयोग से जहां शक्तिमान्‌ को वत श्रीर्‌ 
सफलता मिलती है, वही दुपयोग से उसका विधत्त, द्वास 
प्नौर पतनं होता है) मनक विषय मे भी यह्‌ सत्य पूरो तरद्‌ 
लग्र होताहै। 

हमारे भावी भयसु-प्रभ्रोयत्‌ का मनर साय कितना नन्ति 
यह्‌ तथ्य श्रनुभवियो कौ इसौ उक्ति से प्रकट ैः- 

मन एव मनुष्याणां कारणं वन्यमोभयोः । 

श्रारमा का वनस्परन ग्रौर मोन्न मनोज्यापायो परनिर्भरदहै। मन उम 
प्रगादु वन्वनों मे श्रावद्धं करके नरक श्रौरनिगोदकौ दिवतिम नीत्त 
जा सकता ह श्रौर मूक्तिधाममे भी षटुंचा घना है 1 

मन के स्री महु फे कारणा उनकी सावना का वि्ेण मृत्य 1 

मनकी साधनाकं विषयमे ब्रात्मवे्ता मट्ध्िने वटू सोचा श्रीद 


भकार : एफ ्रनुचिन्तन ] [ ४५ 


चिखा है । यहा तक कि शास्त्र की एक पृथक्‌ शाखा का निर्माण किया 
है ओर उसके निग्रह की विधि प्रद्शित्तकीदहै। 


मन भ्रत्यन्त चैचल दै, साहसिक है श्रौर हठेला है । जैसेगेद को 
नीवे पटका जायतो वह्‌ श्रौर श्रधिक्र उपर उदछलती दहै, उसी प्रकार 
ज्यो-ज्यो मन को स्थिर करमे का प्रयल किया जाता है, व्यो-त्यो वह्‌ 
अधिक गतिञील होने लगता है! एसी स्थित्तिमे उस पर नि्यत्रण 
स्थापित फरना भासान्‌ नही, तथापि भ्रसम्मन मी नही है} सन कितना 
ही जवर्द॑स्त क्योनहो, प्राखिरतो प्रात्माकाही एक उपकरण रै । 
श्रात्मा उसको श्रपेक्षा श्रधिक शक्तिसम्पन्न है) अ्रतएव उसका निग्रह्‌ 
सम्भव है । गीता मे कहा गया है-निसन्देह मन चपलहै श्नौर उसे 
नियंत्रित करला कठिन है, तथापि लगातार श्रभ्यास करतेसे श्रौर 
वंराग्य का श्राश्चय लेने से वह्‌ वशीभूत हौ सकता है ।# योग-सूत्रणनेभी 
गीता का समर्थेन क्ियाहै पं 


महाप्राण केशी श्रमण ने गौतम स्वामी के समक्ष रहस्यपृणं शब्दो 
मे एकं समस्या रक्ली- गौतम ! यह दुष्ट ग्र्व वडा साहसी- सहसा 
भ्रवृत्ति फरतेवाला श्रौर भयानक है । तुम इस पर ्रारूढ हौ कितु यह्‌ 
तुम्हारा ग्रपहरण नही कर पराता । इसफा क्या कारण है ? 

गौतम, केशी के इंगित को तत्काल समभ गए । बोले--जव यह्‌ 
हटीला घोड़ा भागने लगतादहैतो्यद्रसे श्रूतः कौ लगाम लगाकर थाम 





# श्रसंशयं महाबाहोः मनो दुरवग्रह चलम्‌ । 
प्रभ्यासेन तु कौन्तेय, वैराग्येण च गृहयते ॥। 
-- गीता भ्र° ६९० इलोक ३५ 


ग श्रभ्यास् वैराग्याभ्यां तन्निसयेधः 1 
योगसूत्र 


४६ | [ ओंकार : एक अनुचित 


लेता हूं । लगाम से धाम तेने के वाद यह उन्मार्गमे जानेमे मक जानां 
है ग्रौर समीचीन मागं पर ही चलता है। 

भ्रदन श्रीर्‌ उत्तर हो गया किन्तु गांठ श्रनुलौ रह गई । तय केली 
स्वामी ने पूद्धा--गौतम ! आखिर यह श्ररव है कौन ? 

गौतम ने कहा- महाराज } यह मनही दृष्ट श्ररवरै, चिति 
“धमंरिक्षा' से वशीभूत करता हूं 


गीता म्रीर योग सूत्र के शब्दो मे श्रम्यास श्रौर वैराग्य फह्‌ लौजिए, 
चाहे उत्तराघ्ययन सूत्रे ग्दोमे शधर्मचिक्षा' कहिए, कोई यास्तविन्त 
भ्रन्तर नही है। इन सव उत्तेवोसे पहर किमनका निग्रह्‌ 
क्रियाजा सक्तार। वह दुर्जय भले हो, भ्रजेय नीद} उप्त पर 
पूरी तरह नियन्त्रा स्थापित करनेके तिये धर्मं शिन्लाग्रो पर श्रमल 
करना श्रावत्यके है । 

श्राचायं हेमचन्द्र ने मनोविजय के सम्बन्ध मे यहूत सुन्दर फटा ६^- 
निर्कूग मन राधस है जो निःगंक होकर दौदृघूप करता रहता र श्रौर 
तौनो जगत्‌ के जीवो को संसार रूपी गहे मे गिरता है 1 





- 


श्रयं साहसिमो भीमो, दद्ुस्सो परिधायदर्‌ 1 
जंसि गोयमःश्रास्टो, कटं तेण नहीरसि॥। 
पधावन्तं निगिण्टामि, सूयरस्सी समाहियं। 
न मे गच्छई उम्मागगं, मग्गं च पटिवन्जदु । 
श्रासेयदृह्‌ केवूत्ते ? केसी गोयममव्ववौ । 
केसीमेवं बुवंतं तु, गोयमो दएमव्ववी । 
मणो साहसिश्नो भीमो, दुदस्सो परिधावद । 


नरं सम्म तु निगिष्टामि, धम्मसिक्यार कंयगं 1 
--उतराध्ययन, २२-५५-५८ 


श्योगयास्त्र, चतुर्थं प्रकास 1 


सरोकार : एक अ्रनुचिन्तन | { २७ 


ग्राधी की तरह चंचल मन मृक्ति प्राप्त करने के इच्छुक श्रौर तीव्र 
तपर्चर्यां करने चाले मनुष्य को भी कही का कही ते जाकर 
पटक देता &ै ! अतः मनका निरोधकियि विना जो योगी होने का 
निश्चय करतार, वह्‌ उसी प्रकार हंसी कापात्र वनता जैसे कोई 
पंगु पुरुष एक गावसे दूसरे याव जाने कौ इच्छा करके हास्यास्पद 
वनता है । 


मन का विरोध होने परक्मंभो पूरी तरहसे सुक जाते रहै क्योकि 
कमं का श्रास्त्रव मनके प्रधीनरहै। जो पुरुष मनका विरोध नही कर 
पाता, उसके कार्यो की प्रभिवृद्धि होती रहती है ! अतएव जौ कर्मो 
से मुक्ति चाहते है, उन्हे समग्र विश्वमे भेटकने वाले लेपट मन को 
रोकने का प्रयत्न करना चाहिए ! 


यदि मनकीडुद्धिरो गर्दै तो समक लौज्यि किं भ्रचियमान 
स्मा ्रादि गख भी विद्यमान ही है, क्योकि मनः शुद्धि वाले उन गुणो 
काफल सहज ही प्राप्त हो जाता है) यदि मनः शुद्धि नही हूर्दहै तो 
क्षमा मादि गरणोकाहोना भीनहोने के समान दै। 

जो मन को शुद्ध कयि चिना मुक्ति के लिए तपस्या करते है, वे नौका 
को त्याग कर मुजाश्रोसे महासागर को पार करना चाहते है । 


जसे श्रैवे के लिये दपर व्यर्थं है; उसी प्रकार मन की शुद्धि क्रिये 
चिना तपस्वी का ध्यान करना निर्दथक हं । मनकी युद्धि के प्रभावमे 
तपर्च रणा, शर्‌ ताभ्यासत एव महाव्रतो का पालन करके काया को ववेश 
पर्हुचाने से क्या लाभ । 


मन को दुद्धिकरके ही रागनद्धेप पर विजय प्राप्त कौ जाती है, 
जिसके प्रभाव से म्रात्मा सलीनता को त्याग कर शपते शुद्ध स्वरू्पमे 
स्थित हेता है । 





[११] 


ध्यान-योग 
ध्यान क! स्दस्प 

जसा कि वत्तलायाजा डका है. भनुप्यका मन प्रचण्ड एवन 
्आाघात से क्षुब्ध सरोवर के समान दहै । वह्‌ कभी दूस यन्तुकातो कभो 
उस वस्तु का चिन्तन करता रहताहै। उत्तमे स्थिरता नही होती वहु 
निरंतर चंचल दना रहता है इस चेचतता को रोक फर उमे एक निष्ठ 
वनाना ही ध्यान हि 1४ 

श्राचायं तेमिचच् ने परम व्यानका स्वरूप एस प्रकार चत्ततामी 
है- शरीर से कोई वेष्टा मत करो, वाचनिके व्यापारफो पर॑द रदो 
श्रीर मन से चिन्तन मत करो । इसप्रकार करने मै मन्‌ यन्तन श्रीर 
कामके व्यापार का निरोधो जाएगा । यह्‌ श्रातमनिर्भरता गा तल्लीनता 
ही परम ध्यान दहै) 

उल्लिखित दोनो लक्षणों मे किचित्‌ पा्यंद्य दृष्टिगोचर तार) 
प्रथम लक्षण मे मनोव्यापार को किमोभी एक ध्येय वस्तु भँ स्थापिति 
करना ध्यान वतलाया गया है जवकि दूसरे सक्षणा मे मनोव्यापार फा 
निरोध करके श्रात्मा काश्रात्ममेलोन होना ध्यान कहागयाट ।पिन्तु य 
पा्थक्य ध्याता को भूमिका के भेद फे कारणा । पसमे तारिक भेद 
नही । ध्यान फी प्रारंभिक स्थिति मे रागदप प्रादि फा निवारगा करन 
के लिए सविकत्प ध्यान ही मभवहै। उसमे परद्रव्य षा खिन्तन होता 
ह। किन्तु जव श्चम्यात्त परिपक्यहो जताहै तो शद्वु स्वमावना्‌ 


= उत्तमसंह्ननस्य॑काग्र चिन्ता विरोधो ध्यानम्‌ । अ, ६.२८ -मस्वार्धमूप्र, 
मुहत्तान्तर्मनः स्थैर्यं ध्यानं दछ्पन्धयोगिनेम्‌ ) 
॥ --प्रायायं दमन 


ग्रोकार : एक अनुचिन्तन | [ ४९ 


निजात्मा ही ध्येय रह्‌ जाता है । उस समय पंवपरमेष्ठो भ्रादि पर द्रव्य 
नही रहते । उस स्थित्तिमे ध्यान, ध्याताश्रौर ध्येय का विकल्प हट 
जाताहै। आत्मा ही ध्यान वन जत्ताहै। यह उच्चकोटि का ध्यान 
नि्धिकेल्प या प्रम ध्यान कहलाता है । 


ध्यान करने से श्रात्ज्ञान की प्राप्ति होत्ती है, श्रात्मज्ञान से कर्मं 
का क्षय होता श्रौर कमंक्षयसे मोक्ष प्राप्त होता है। ग्रतएवं ध्यान 
भ्रात्मा के कल्याण का कारण है ।४ 


ध्रा के माध्यमसे ही मुनिजनो को निह्वय श्रौर व्यवहार मौक्ष 
मागको प्राति होती है, अतएव चित्त की एकाग्रता साध कर ध्यानका 
ग्रम्यास करना चाहिये ।‡ 
ध्याता 

मगर ध्यान की सिद्धि के लिये अनिवायं योग्यता पहले प्राप्त कर 
लेना भ्रावदयक है । कपाय विजय के चिना श्रार्मनज्ञान प्राप्त नही होता । 
कषाय विजय के लिए इद्िय विजय श्रपेक्षित है, इच्रिय विजय के लिए 
मनः शुद्धि आवद्यक दहै, मनः शुद्धि के लिए रागदष को जीतना 
श्रावद्यक रहै, रागन्धेष को जीतने के लिए समभाव का श्रभ्यास् 
चाहिये ओर उसके लिए निर्ममत्वं भाव ्रनिवायं है, इस प्रकार 
कायं कारणभाव को प्रक्रिया पूणं होने पर ध्यान की योग्यता 
प्रकट होती है! इतनी योग्यता प्रकट होने पर ध्यान करने मे 





मोक्ष: कमंक्षयादेव स चात्म्ञाननो भवेत्‌ । 
घ्यानसाध्यं मतं तच्च तद्‌ ध्यानं हितमात्मनः । 
--योगलाख, ४, ११३. 
¶ इवहि पि मुक्हैडं फाणे पादि जं मुणी सियमा । 
तम्हा पयत्तचित्ता द्यं भणं समन्भसह । 
-- वृहद््रन्य संग्रह, ४७ 





५० | [ ओंकारः एकर गनृचिन्तनं 


सफलता प्राप्त होती ह । श्राचायं नेमिचन्ध ने वतलायाहै किमो द्धन 
श्रपने चित्त को स्थिर करना चाहता है अर्थान्‌ व्यानतसाधना ने रुदत 
होना चाहता है, उसे इष्ट श्रौर श्रनिष्ट पदार्थो में रागनदप जीर महन्ते 
वृत्तियोसेद्रूरहो जाया चाहिये इफ प्रतिरिक्त जो साधक तप, 
भरत म्नौरव्रतकाधारकहोतारै, वहीध्यानरस्पी रथ कौ धुराकौ 
धारण कर सकता है, श्रतएव ध्यान की प्राप्ति के लिए तप, श्रूत प्रौर 
तरतो की प्नारावना करना श्रनिवायं है 

ग्राचायं हमचन्द्र ने ध्यान करने वाले स्ताधकमे निभ्ने लिगिन मुगप् 
की संख्या प्रतिपादित कौ है-- 

(१) संयम के प्रति इतनी गहरी निष्ठाहो किमप्रारा-सद्रुटमे प्राते 

पर भी उसका परित्यागनं फर) 

(२) समस्त प्रारियो को श्रात्मवत्‌ समभे । 

(३) ध्येय-लक्ष्य से च्यूतनहो। 

(४) सर्दी, गमी यावायुत्तेचिन्ननटो। 

(५) योग रूपी श्रमृत-रस्ायन करा पान करनेकाण्च्छुनदहो। 

(६) रागन्धेपसेग्राक्रान नहो) 

(७) क्रोधादि कपायो का विजेता हो । 

(८) मन को ्रत्माराममे रमणा करानवालाह्‌ 

(६) सय कर्मोमे श्रतित ररे) 

(१०) काममोगोमे विरक्त ह 





त॑ मा मुग्भह्‌ मा र्ट्‌ मा दूद्‌ द्टुनिद्र प्रटरय 1 
यिरमिच्छहि जद नित्त विवित्त श्पप्य दहुए्‌ | 


भूर्म रय कन्त) 
ह) < ५ 


तवनुदवदवं चदा म्दएर्द्‌ 
तमहा तत्तिवनिगया त्ल्लदीए्‌ मया ष 


नक र = 
दाःय न ढे ॥ ५ ^ 


प्रकार : एक श्रनुचिस्तत | { ५१ 


(१९) चरीराशक्ति प्षेपरे हो 
(१२) संवेग के सरोवर मे निमग्न रहता हौ । 
(१३) शत्र-मित्र, स्वणं-पापाण, निदा-स्तुत्ति, मान-अपमान मे सम- 
माव रखने बाला हो । 
(१४) सवके कल्याण का भ्रभिलाषो हो । 
(१५) करुखवन्‌ हो 1 
(१९) सासारिक सुखो से विमुखनचदहो) 
(१७) परीपह-उपरस्गं अ्रने पर भी सुमेर कौ तरह भ्रचल रहै । 
(१८) चन्द्रमा के समान सौम्य ग्रौर वायु के समाननिम्संगहो। 
(१६) प्रशस्त बुद्धि बालम हो । 
ध्येय 


ध्यान के स्वरूप श्रौर ध्यात्ता की योग्यता को सम लेनेके साय 
ही ध्येयः को जान लेना भी आवश्यक दहै। व्यान-ग्रवस्या मे मन 
जिस वस्तु पर केन्द्रित किया जाता हैया जिसका चिन्तन किया जात्ता 
है, वह ध्येय कहुलात्ता है । 

ध्येय चार प्रकार के होते ह-() पिण्डस्य (२) पदस्थ (३) रूपस्थ 
प्रौर (४) सूपातीत । इनका संक्षि परिचय इस प्रकार है-- 

(१) पिण्डस्थः--पिण्ड श्र्थात्‌ शरीर मे स्थित श्रात्मा । उसका 
चिन्तन जिस ध्यान मे करिया जात्ताहै वह पिण्डस्थ कहलाताहै। 
शरीरस्थ ्रात्मा का ध्यान करनेकै लिये पाच प्रकारकी धारणाभ्रोका 
प्रवलम्बन करना पडता है- (१) पाथिवी (ॐ) श्रा्तेयी (३) मास्ती 
(८) वारुणी अौर (५) तत्तवभर 1 

(१) जिस पृथ्वी प्रर हमारा निवास है, उसका नाम मध्यलोक है । 
इस मध्यलोक के वरावर चिल्ाल क्षीर- सागर का चिन्तन करना 
चाहिए । क्षीरसागर मे जम्बूदीप के बरावर एक लाख योजन विस्तार 
वले, स्वणं कै समान भ्राभा वाले श्रौर हजार पड्ड्यो वाले कमल का 


५ [ श्रोकार : एक प्रुचिन्तनं 


चिन्तन करना चाहिए । उक्त कमलके मध्यमे केसरं भ्रीरषा- 
वणं को प्रभासे युक्त ओरमेर पर्वत के वरात्रर एकु लाय योजन ऊ 
करणिकादहै) उत्त कणिका के ऊपर एक प्रनोव उज्ज्वल दून ३. 
जित परं श्रासीनहूं श्नौर कर्मोका क्षयकरनेमे उचते । ता 
चिन्तन करना पाथिवी धारणा है। । 

(र) अ्राग्नेयी धारणा में नामि के भीतर सौतह पादुडिपौ ॐ 
कमल का चिन्तन करना चाहिए । उप्त कमलकौ कणिका पर भर 
स्थापित करना चाहिए श्रौर प्रत्येक प्ते परश्रनुप्रम सेस, मा, ६, ् 
उ,ऊॐ, क्ट. क्र.ल्‌, लृ,ए,ेःओरो, ग्री, रं, भ्रः, यह्‌ सोह स्वर्‌ 
स्थापित करना चाहिए । 


तत्पम्चात्‌ हृदय मे आठ पंपुदि्यो के कमल का निन्तन करना 
चाहिए । उसकी प॑लुडी पर श्ननुक्म से नानावर्ण श्रादि आठ फमं 
स्थापित करना चादिए्‌। यह कमल श्रधोमुग हो । तलयर्नात्र न्फ, 
कला कौर विन्दु से युक्त, द इस ब्रक्षरके रेफ मे से धीमी-धौमी 
निकलने वाली धूमिखा का चिन्तन करना चाहिए । किर उमम 
श्रम्नि कौ चिनगासियो कै निकलने का, पिर ज्वाताश्रो का चितन कना 
चाहिए । इन ज्वालाप्नो से हदय स्थित पूर्वोक्तं ्राठ दलों बति कमन 
को दग्ध करना चाहिए ग्रौर सोचना चादिए्‌ निः महामंत्र कै याने 
से उत्पन्न हुई प्रवल रग्नि रवस्य ही कर्मयुक्त एमलको भ्म कर 
देती रहै) 

तत्पद्वात रीर से बाहर च्रिकोण रान्तिकि मे मृत्तः पौर 
श्रग्नि-वीज प्देफ' से युक्त जलते ट्‌ बह्मीदुर के निनयन करना 
चाहिये 1 तदन्तर धरोर के श्रन्दर महामप्र के ध्यान म उप्र ट 
शसम की ज्वाला से बाष्टर की बद्धिपुर फो स्वाना द्रम प्रर कमः 
कौ तत्काल मस्म करैः अन्ति यान्त हग है, एन चिन्न कर्मा 
चाहिए) यह्‌ ्ान्नेयी धारक द । 


म्नोकार : एक भअरनुचिन्तन | { ५३ 


(३) भाग्नेयौ धारणा के पश्चात्‌ प्रचण्ड पवन का चिन्तन करना 
चाहिय भौर सोचना चाहिए कि दैह्‌श्रीरश्राठ कर्मके जलने से जो 
राख वनौ थी; बह उड रही है! एसा ट्ट चिन्तन करके पवतेको 
शान्त कर देना चाहिये १ यह्‌ वायवी धारणा ह) 


(४) वारुणी धारणाम श्रमृत सौ वर्था करने वाते प्रर मेध 
सालाग्रो से ग्प्रस्त श्राकाश का चिन्तन किया जाता ह । तत्पश्चात्‌ श्रध 
चन््ाकार कला विन्दु से युक्त वरुण॒ वौज वे" का चिन्तन करना चाहिये । 
फिर यहु चिन्तन करना चाहिये कि धवे" से उत्पन्न श्रभृत के समान जल 
से श्राकाशतल भरगयादहै श्रीर पटले उड हरं भस्म इस जत से धुत्त 
करसाफहो रहीदै। 

(५) पूर्वोक्त चार घारणाये करने के पश्चात्‌ रस रक्तं श्रादि साति 
धातुभ्रो से रहित, पूणं चन्द्र के समान निमंल एवं उज्ज्वल क्रान्ति वाते 
तथा स्वन कै समन शुद्ध श्रात्मस्वरूप का चिन्तन करना चाहिए 1 


तत्पश्चात्‌ सिहासन पर ्रारूद्‌, सवं श्रतिशयो से सुशोभित, समस्त 
कर्मो का विध्वंस करने वाले, उत्तम महिमा से सम्पन्न भ्रपने शरीरमें 
स्थित निराकार ्रात्मा का चिन्तन करना चाहिए । 


इस प्रकार का चिन्तन पिण्डस्य ध्यान कहलाता है । इस ध्यान के 
प्रभाव से मोक्ष-मुख कौ प्राति होती है । इसका निरन्तर प्रभ्यास करने 
से मारण उच्चाटन ्रादि विद्या, तथा सिह सपं ्रादि हिसक प्राणी दूर 
रहते है) वे इस योगी के तेज को सहन नही कर सकते ।% 


(२) पदस्थ पवित्र मंत्ाक्षर रूप पदों का श्रालम्बन करके जो 
व्यान किया जाता है, वहु पदस्थव्येय के कारण पदस्थ ध्यान कहलाता 
है) इस ध्यान मे चिन्तनीय पद ग्रनेक प्रकारके ह! साधक अपनी रुचि 





# देखिये योग शास्च का सत्तम प्रकरा । 


५४ | [ ओंकार : एवः प्नृकिलिनं 


या इच्छाके्रनुसार उननेनेक्सीका नी व्यान क्स्ठाद्रै। पर 
श्रक्षर वाले नमत्कार म॑वरका श्रिहंत-सिद्र-प्रायरिय उवस्भमय साट" ध्य्‌ 
पोञ्गाक्षरी विद्या का, रिहूतस्तिद' टन षडक्षरो मंत्र का, ्य-ल्ति-पा- 
उ-साः इस पंचाक्षरीका ग्रह्‌" काश्रयवा एकाभरी संर छ का 
त्यान क्रियां जाता) 

(३) ङपस्थ समवसररामे स्थित श्ररिदन्त परमातमा सपस्य भ्ये 
ह 1 उनका चिन्तन करना रूपस्य ध्यानै) उत्त घ्यानमे स्यामि 
मे ध्याता को एसा चिन्तन करना चाहिए-समन्त फर्मो फो विष्वस्म करं 
देने वाते, देदाना कै समय देव रचित तीन प्रतिविम्दो के कारणा चतुर्मु 
दिखाई देने वाले, तौ न उज्ज्वल छतो ते सु्ोनित, सूयप्रभा फा भीत्िर्म- 
कार करने वाला या मंडल जिनके पी जगमगारहा रै, दिव्य दुदूभि 
कता निरोप जिनको आच्यात्मिक सम्पदाकागान कर रहा दै, मृजा 
करते हुए श्रमरो कौ भकार से गब्दायमान श्रदयोक वृक्ष सै सुरोभित 
सिह्‌सन पर श्रास्तीन, चामर जिन परटोरे जारहै टु, मृरेन्र-पनुरेन्रो 
दाया जो वन्दित है, जिनके प्रभावसे जन्मजात वैर वने निहु-टूरिसि 
ग्रादि प्राणी निर्वेरदहौ गए, जो केवल ञान फे सोकोत्तर प्राशसे 
जगमगा रहे है, एसे श्ररिहन्त भगवन्‌ समवसररण में विराजमानं टे । 

ट्स ध्यान में तन्मयता प्राति दो जाने पर साधक स्रपने सपो रप 
रूप स्वलकेरूप मे देने तगतारहै। जव तकः उसका मन वीनदाग- 
भावमे रमया करताटहै, तव तक वहु वीततगागमाव कौ हो ध्वन 
करता है 1 

(४) र्पातीत निरंजन, निराकार, नेतन्यस्यस्प निय कर्मान्मा 
पातीत ध्येय दहै । यिस ध्यान मे उनका चिन्तन र्वि नानार, नः 
म्नयातीत ध्यान कहलाता द्‌ । 

जो साधवः ब्रमयः; पिष्डस्थ, पदस्य प्रर स्मर्य व्याने म परितितनना 


प्रात कर नेता, बही नपानीन व्यान कौ मोम्दता प्रम सर्‌ गक्मार९। 


ओकार : एक अनुचिन्तन |] [ ५५ 


ङस ध्यान कँ प्रमाव से ष्येय प्नौर ध्याता का विकल्प समाप्त हो जाता 
है श्रौर व्यान, ध्याता, च्येय तीनो एकाकार हो जति) घ्याता की 
ध्येय के साथ एक रूपता हो जाती है । 

मेद-प्रभेद- प्राणी कौ चिन्तन धारएेयोतो प्रसंख्य प्रकारक 
है, किन्तु उन्हे चार भागोंमे विभक्त क्रियारै। वही ध्यान के चार 
माग कहलाते है । यथा -- (१) बआार्त्यान (२) रौद्रघ्यान (३) धमे- 
ध्यान श्रौर (४) रुक्लघ्यान । 


इष्टवियोग श्रनिष्टसंयोग, रोग ओ्रौर भोग कामना से प्रेरित चितन 
घारा आ्र्तध्यान कहलाती है । हिसा, श्रसत्य ख्रादि पापो का श्राचरण 
करने कै उद्य से होनेवाले चिचार रौद्रध्यान मे सम्मिलित है । जिना्ञा 
आदि का विचार ध्म॑घ्यानटहै श्रौर उच्चश्रणी का श्रतिञ्चय उज्ज्वल 
ध्यान शुक्लध्यान है । यहं चारों घ्यान भी चार-चार प्रकारके है। 

चारघ्यानो मेभ्रादि के दो--ग्रार्तं ओर रीद्रध्यान अप्रशस्त रहै। 
उन्हे प्रपध्यान या पापघ्यान कहा जा सकता है । शुक्लध्यान इस देश- 
कालमे संभवनहीदहै) इस काल मे साधक के लिए ध्म॑ध्यान ही एक- 
सात्र भ्रालम्बन है! प्रतएव भ्रन्यान्य घ्यानोके विस्तारमेन जाकर 
यहां घमेघ्यान का ही परिचय दिया गया है । धमेध्यान के भ्रत्य प्रकार 
से भी चार भेदो का वंन किया गया है-(१) आक्ञाविचय (२) म्रपाय- 
विचय (३) विपाकविचय रौर (४) संस्थानविचय । स्वे्न भगवान्‌ की 
श्राज्ञा कोटृष्टिमे रखकर तात्त्विक श्रथं चिन्तन करना प्राज्ञाविचय, 
रागनदष प्रमाद ग्रादि विकारो से उत्प्च होनेवगले कष्टो का चिन्तन 
करना भ्रपायविचय, कमं के विपाक का चिन्तन करना विपाकविचय 
श्रौर पुरुषाकार लोक का चिन्तन संस्थानविचय धर्मव्यान कहलाता है | 
चार भावनाषएं 


मैत्री, प्रमोद, कारुण्य ्रौर माघ्यस्थ्य । यह चार भावनाएं धर्म॑ 
ध्यान का उपस्कार करने के किए रसायनके समान) प्रतएवसा 


९ 
५६ [ [ बरोकारः एक अनुजिन्तन 


स {~ ज्य [ श्रन्तर म्‌ { ९ 
को चािए कि वह ध्रपने अरन्तरभे श्रनिकत्ते अधिक एन भावना क 
जात श्रौर श्रदीत कर इनका श्रनिभ्राय यह्‌ ह- 

१ मत्री-भावना--जगत्‌ का कोऽमीप्राणौ पापम करे, कौ 
भी प्राणी दुमका भाजनन वने, समस्त प्रारौ दुप्कप्ने मुले 
जाए, इस प्रकार का चिन्तन पूनः-पुनः करना मैत्रोभावना द 1 

२ प्रमोद-भावना--जिनके समस्त दोपदरूर होगएरं भ्ौर्‌जो 
यथाथ वस्तुस्वरूप कं दृष्टा है, उन गुरा गरिष्ठ महापुरुषे गुणो ॐ 
प्रति आदर होना, उनकी प्रासा करना, उनकी मेवा कमना शौर उम 
देखकर प्रसन्न होना प्रमोद भावना दह । 

२ कर्ा-भवना-जो प्राणी दीन, दम्पी रै, भवमीत्त दै ग्रौर 
प्राणो की भिक्षा चाहिते, उनके दुष्प फो दुर करमेफी भावना 
होना कर्णा भावना रै । 

४ माध्यस्थ्य-सावना-सो कुषयगामी है, गन्मामं सै भ्रष्ट, 
ग्रभक्ष्य-मक्षणा, श्रपेय-पान श्रौर श्रगम्य-गमनसे परटेञ नदी पारे, दर 
कर्म करके प्र्तन्रहोते ई, जौ दूसरोफी निन्दा श्रौर्‌ ग्रपनी प्रेमा सिया 
करते द श्रीर जिन्हे सन्मां पर लाना दाक्वेनदीरै, यो उप्देसद 
भी पात्रनही ह, उनके प्रतिभ घृणा यादपकोमायनरदि दषु 
दपेक्षामाय धारा करना माध्यस्व्य-मावना ६1 

एक वार प्रारम्भ कियारा प्यान एक मृटु्तमे प्रपि म नन 
स्थिर नदीं रहता; गन्तु यो माधफः एतना म्रावनोप्रोमे भाविनि 
होता ै, वहमद्न ट्ए स्यान बी परस्य को पूनः जद सनं 
मे समयं होतारं) 
घ्यान-विधि 

विधिपू्वक कीगर दियारी नप्मलनोरे, पन्वा साम 


2१ = र £ 
112 र 1114४ 


व्यान करमा नाता, उने त्यान्‌ सौ विमि पय मस्ध्न स 
श्रीर्‌ निम्नलिरित यानो कत स्थान सना कदिष~- 


ओकार : एक ्ननुचिन्तन | [ ५७ 


१ ष्यान के लिए भ्रासन का कोई एेकान्तिक नियम तहीरहै। जिस 
ग्रासन का उपयोग करनेमे सुविधाहो रौर जिससे मनकी श्रधिकसे 
श्रधिक स्थिरता स्ह सक्तो हा, उसी श्रासन का प्रयोग करना 
उचित है । 


२ ध्याने करते समय दोनो होठ मिले रहना चाहिए । 


३ नेत्र खलेन रहे, न पूरौ तरह वन्द रहै) उन्हे नासिका कै 
गरग्रमाग पर स्थापित्त कर लेना चाद्ये । 


४ दात इस प्रकार रहैकि उपर रदति के साथ नीचे के दातोका 
स्पशंनदहो। 


५ सुख प्रसन्न रहना चाहिये । 


६ पूवं श्नौर उत्तर दिज्ञा समस्त प्रकस्तकार्योके लिए योग्य मानी 


ईह) भ्रतएव इन्टीमेसेकिसीकीओोर मुख करके ध्यान करना 
चाहिये । 


७ ध्यान के समय मेरूदंड सीघा श्रौर सुव्यवस्थित रहना चाहिए । 
८ प्रमादको दूर रखना चाये, 
8 ध्यानकीसिद्धीके लिए किसी पवित्र रीर एकान्त शन्त स्थान 
को चुनना चाहिए, जहां कोलाहल न हो श्रौर चित्तक्षोभ का कारणनदहे। 
१० ध्यान का ग्रभ्यास करने वाले कोश्राहारकी सात्विकता श्रीर्‌ 
शुद्धता का स्याल रखना रखना चाहिये । परिमित भोजन करना चाहिये । 
११ ब्राह्यमृहर्त ध्यान के लिए सवसे श्रनूकरूल समय है 1 


[ १२] 
भक्ति साधना 


भारतवपं को विभिन्न घमं परस्पराग्नोमे भषति को एः विरि 
स्यान प्रात है । ईताई मुस्तिम तया बन्यान्य सम्प्रदायो मे भी भित 
कौ सुन्दर श्रौर मधुर व्याख्या की गई ह । 

भक्ति के श्रनेके साधन है, श्रनेक स्तर ग्रौर यनेक प्रद्र पै भः 


क 


ह) जैव, शाक्त श्रौर वैष्णव सम्प्रदाय तो भक्तिमागं फो दी उन्छष्ट मध 
मान कर चलते है । 

इसमे सन्देह नही कि भक्तिका साधन श्रन्य सापनो सौ श्रा 
सरल है। श्रतएव प्राथमिक भरूभिकाके साधको लिये यर्‌ य्येद्िष्ट 
साघनदहै। यहीफारणाहै कि प्रन्यान्य साधनोकौ द्या भकिः मायन्‌ 
ग्रपनाने वालोकी ही सस्या विपुल! उनी फाप्रनार्‌ मन्य दम 
गोचर होता ह । 

वैदिक परम्परामे भक्तिकी विवेचना रौर मौमासामे प्रु यन्त 
कानिमणिहृप्रादह। उने ग्रस्योमे मक्तिकं दते मधिक्‌ सवषाम 


प्रद्ित कयि यएु ई कि उनका वहां तामान्य उत्मेण करना भो गमत 
नहीदहै। सगण भक्तिप्रौर निमृण मक्तिनो प्रन्त्दि दत द, विममे वम 
मात्माके साकरश्रौर निराकार स्वर्ण ॐी उतवागना का ताया चयन 
सति क निर्ममा द्म 


[न 


न्न्य 


ठे भी नाना मेद-प्रभेद्र ट) भगवन प नपधो 


प्रकार मिलता दु । 
श्रवगां कोर्तनं विष्यः रम्य ददमतनमू 


॥ 


म्मे, सन्पमास्मति सदनम्‌ । 


मर्यनं वन्धनं दम्प, 
(६) भगवानु ठे यलोक चच के प्र य्या (सिना 
† (2) न्म्य पर्ता (दो मन्दा क्रमतो शा म 


[५ 


महान सन्ना 


सरोकार: एक अनुचिन्तन | ` {५६ 


करना (५) वाह्य सामग्री या मन दारा कस्पित सामग्री से भगवत्युजन 
करना (६) वन्दन-प्रफमन करना (७) अपने फो दासि मानकर सेवा 
करना (८) मित्र भावसे सेवा करता (६) अ्रहुकार को स्या केर 
पने स्वस्व को तथा अपने आ्आपको भगवान्‌ के समर्पण केर देना । 


वहा पचि रसो के आधार प्र पचि प्रकार कौ भक्ति का वणन 
मी मिलता है) पचि रस इस प्रकार है--शान्त रस, प्रीतिरस, प्रेयोरस 
(सस्यग्स),वात्सल्यरस शौर मधुररस (ष्गार रस) । एक विदान्‌ कते दै 
‹(भक्ति) रस कौ सर्वोच्च परिणति मधुर रस मे होती है । यह ग्रलकार- 
यास्व के श्यृद्धाररस का भ्रतीन्दरिय दिव्य स्वसरूपटै) यह सभौ के, 
अनुभव कौ वातत है कि लौकिक इन्द्रिय सुखं कौ प्रगाठ्ता श्रौर॒विस्तार 
की परमाविधि दास्पत्य प्रेममेहौ हृश्रा करती ह। इसी प्रकार 
श्ृद्धार ग्रथवा मधुर रस विकास्की चरमावस्थाहै। चरमावस्था इसे 
इसलिए कहा जतादहै कि इसमे सव प्रकार की मर्यादा ग्रौर सद्धोच 
दूर हो जति है श्रौर निरन्तर भगवान्‌ की सेवा गवाधरूपसे होतीहै 
ग्रौर इस प्रकार इस सुख का समास्वादन भ्रत्यन्त प्रगाढ होता है । * 


इसका प्राशय यह्‌ है किं परमात्मा को पत्ति मानकर शरौर्‌ श्रपने 
श्रापको पत्नी समभ कर भक्त जो भक्ति करता है, वही सर्व्छृष्ट भक्ति 
है। इक प्रकारको कृष्णभक्तिः राधानेकी थीग्नौर जो सर्वोत्तम 


भक्ति करना चाहता है उसे श्रयते की राघा-भेगवान्‌ की पली-मानकर 
ही भक्ति करना चाहर । 


कह्ने की आवन्यकतता नही कि इस प्रकार फी तिवेचनाएं वास्तव 
मे भक्तिकौ विकृतिर्या है ग्रौर भूतकाल मे इन कत्पनाश्रो की वदौलत्त 
घोरसे घोर अनर्थ, दुराचार श्रौर व्यभिचार तकहुएदै। धमं भीरौ 





£ देखिये कल्या का साधना-अरद्धु ५१७-२२ 


[ १२] 
भक्ति साधना 


भारतवषे कौ विभिन्न घमं परम्पराभ्रोमे भक्ति को एक विशिष्ट 
स्थान प्रास्त है । ईसाई; मुस्लिम तथा मन्यान्य सम्प्रदायो मे भौ भविति 
कौ सुन्दर श्रौर मधुर व्याख्या की गई है । 

. भक्ति के श्रनेक साधन दहै, श्रनेक.स्तरह श्रौर ग्रनेक प्रकार के भेद 
है । शंव, शाक्त श्रौर वैष्णव सम्प्रदाय तो भक्तिमार्गं को ही उक्कृष्ट मार्ग 
मान कर चलते है । 

इसमे सन्देह नही कि भक्ति का साधन श्रन्य साधनों कौ श्रपेक्षा 
सरल है । श्रतएव प्राथमिके भूमिका के साधको के लिये यहु स्वेक्छष्ट 
साधन है। यही कारण है कि श्रन्थान्य साधनो की श्रपेक्षा भक्ति साधन 
श्रपनाने वालो की ही संख्या विपृल है । उसीं का प्रचार स्व॑र टेष्टि- 
गोचर होता ह । 

वैदिक परम्परा मे भक्ति की विवेचना श्रीर मीमांसामें प्रचर ग्रन्था 
कानिर्माणि हुश्रा ह! उन ग्रन्थो मे भक्ति के इतने भ्रधिक रूप-प्रकार- 
प्रद्वित किये गए है कि उनका यहां सामान्य उत्तेख करना भौ संभव 
नही है। सगुण भक्ति श्रौर निगृण भक्तितो प्रसिद्धही रहै, जिसमें पर 
मात्मा के साकार श्रौर निराकार स्वरूप की उपासना की जतौ है, उन 
के भी नाना मेद-प्रमेददहै) भागवतमे नवधा भक्तिका निर्परा दस 


प्रकार भिलता है । 
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्‌ 1 
श्रच॑नं वन्दनं दास्यं, ्द्यमत्मिनि वेदनम्‌ । 
(१) भगवान्‌ के श्रलौकिक चरित्र को श्चवा करना (२) नाम 


कीर्तन करना (३) स्मरण करना (४) चर्ण कमलो का सेवन 


म्नोकार: एक अनुचिन्तन | (+£ 


करना (५) वाह्य सामग्री या मन वारा कल्पित सामग्री से भगवत्मूजन 
करना (६) वन्दन-प्रसमन करना (७) ग्रपने क्रो दासि मानकर सेवा 
करना (८) मित्र भावसेसेवा करना (६) ब्रहुकार को त्याग कर 
श्मपने सर्वस्व को तथा अपने प्रापको भगवान्‌ के समपंणा कर देना) 


वहा पाचि रसोके आधार पर र्पाचि प्रकार कौ भिति का वनं 
भी निलता दहै) पाच रस इस प्रकार है--शान्त रस, प्रीत्तिरस, प्रेयोरस 
(सख्यरस), वात्सल्यरस श्रौर मधुररस (ग्र गार रस) । एके विद्वान्‌ कहते है 
(भक्ति) रस की सर्वोच्च परियाति मधुर रसमे होती है । यह्‌ ्र॑लकार- 
शस्व के श्य्धाररस का श्रतीन्दरिय दिव्य स्वरूपहै\ यह्‌ सभी के, 
अनुभव कौ वात है कि लौकिक इन्द्रिय सुख की प्रगारता श्रौर विस्तार 
की परमाविधि दाम्पत्य प्रेममेही ह्या करती दहै। इसी प्रकार 
शयज्ञार ग्रथवा मधुर रसु विकासकी चरमावस्थाहै। चरमावस्था इसे 
इसक्लिए कहा जाता है कि इसमे सव प्रकार की मर्यादा प्रौर सद्धोच 
दूर हो जाते है ओौर निरल्तर भगवान्‌ कीसेवा भवाधरूपसे हौतीरहै 
ग्रौर इस प्रकार इस सुख का समास्वादन श्रत्यन्त प्रगाद्‌ टोत्ता है । # 


इसका प्राशय यहु है कि परमतस्मा को पत्ति मानकर श्रौर अपने 
श्रापको पसनी समभ कर भक्त जो भक्ति करता है, वही सर्वोच्छृष्ट॒ भक्ति 
है! इक प्रकारको कृष्ण भक्तिः रधाने की थीम्रीरजो सर्वोत्तम 


भक्ति करना अहता है उसे अ्नपते की राधा-मगवान्‌ की पत्नी-मानकर 
ही भक्ति करना वाहिप । 


कुन की आवश्यकता नही कि इस प्रकार कौ विवेचनाएं वास्तव 
मे भक्तिकौ विकृतिर्या ह गनौर भूतकालमे इन कत्पनाभश्नो की वदौलत्त 
घोरसे घोर प्रनथे, दुराचार रौर व्यभिचार तक हृएदहै। धर्मं भीहो 





% देखिये कल्या का साघना-अ्रद्ध ५१७-२२ 


९ [ श्रोकार: एक भ्रनुचिन्तन 


प्रौर हृदय की उच्छुखल वासनाका पोषण भीहोजाय तो कौन 
एेसान करना चाहेगा ? 


परमात्मा को भक्तिका उद्य कामक्रोध प्रादि दुर्वासनाग्नो का 
उन्मूलन करके वीतरागभाव प्रप करना है, मगर दाम्पत्य भावसेकौ 
जानेवालौ भक्ति इस उदेश्य को परं नही कर सकती । यही नही, वह्‌ 
प्रकारान्तर से कामुकता की वृद्धि मे सहायता करती है । 

भक्ति विषयक यह्‌ कल्पनाएं साहित्यिक सूप मे कितनी ही सात्विक 
क्योन दहो, व्यवहार मे साविकं नही रह सकती इतिहास सक्षीरं 
किवे सात्त्विक रहीभी नहीदहै), इस प्रकारकौ चिक्रृत भक्ति ने 
सहस्रौ जनों को धर्म-विरोधो वनाथा है) 

जैन परम्परामेभी भक्तिमागं को समुचित स्थान उपलब्य दहं) 
ग्रौर इस विषय पर प्रचुर साहित्यका निर्माण भीहुश्रा है। मगर 
जनधमं का मूल श्रौर मुख्य उदक्य परिपुणं वीतरागभाव कौ प्राति ई, 
ग्रतएव उसके श्रनुरूप ही वहा भक्ति का विधान किया गयाहै। 

जिन्होने रागद्वेष, काम क्रोध, श्रादि समस्त आत्मिक विकारो 
पर विजय प्राप्त करलीहै, जो सर्वज्ञता श्र सवंदशिता प्राप्त करके 
प्रव्यावाध म्रनन्त सुक भागो वन च्केहै, देष ्ररिहन्त भगवान्‌ कैः 
के प्रति, चतुचिधि तीयं के नायक एवं प्राचार का पालन करने-कराने 
चाले धर्माचार्यो के प्रति, वहूधरूतो ग्रागम के विगिष्ट वक्त्र के प्रति 


प्रीर तीर्थकरो द्वारा उपदिष्ट प्र ` ` विषुः ५ श्रनुराग 
होना भक्ति है 1 | ६ 

विशद भावपूरं श्नुराग `, "गवा 
के प्रति हृदय मे देसी गहरी, २ ` १ # 


~~~ ध 


शति, श्रूतेपु प्रवच 


~ 
= ५ ~ 
५ ६-२८ 
॥ 


९१ | [ ओंकार : एक प्रनुचिन्तन 


चाहिए किं वह्‌ श्रनन्यनिष्ठा वन जाए-जगत्‌ के पदार्थो रौर सूखो पर 
ब्ननुराग न रह जाए। कहावत प्रसिद्धै एक म्यान मे दौ तलवार 
नही रह सकती । मानव का मन स्यान श्रौर उसमे परमात्मप्रीति 
जव प्रमाद रूपमे जागृत होती दहै तो अनन्य पदार्थोके अनुराग को कोई 
द्रवकाश सही रहता ! भक्त उस स्थिति मे श्रपने श्रापको भेगवत्समपित 
ग्रनुभव करने लगता है श्रौर शनैः शनैः उसकी श्रनुभूति तन्मयता का 
रूप धारण कर लेती है । उसमे भागवत्‌ गुण प्रकट होने लगते दह श्रौर 
ग्रन्ततः भक्त ही भगवान्‌ वन जाता है । 


जन परम्परा मे भ्रनादिसिद्ध एक ईश्वर की सत्ता स्वीकार नही की 
जाती । ईश्वरतत्वे पर एक व्यवित का शाश्वत एकाधिपत्य (1१07००४) 
नही है । प्रत्येक साधक ओ्रौपाधिक भावो से मुक्ति प्रास्त कर भ्रौर शुद्ध 
प्रासा स्वषूप को प्रकट करके ईश्वरत्वं की विभूति का अधिकार वन 
सक्ता दै । श्रतएव भक्ति का उद्देश्य भ्रन्ततः स्वयं ईश्वर वनना है । 
ईश्वर का दास या सखा वन के रहने मे भक्ति की चरम कृतार्थता नही 
है! इस प्रकार भवित ईश्वरत्व प्राति का साधन है, साध्य तदी । भविति 
को साध्य श्रौर साधन उभय रूप मानना श्रान्ति है । 


भविति के विषय मे एकं प्रश्न पर विचार करके हम इस प्रकरणं 
को समाप्त करेगे । प्रक्ष यहहै कि ईश्वरमे यदि रोष श्रौर तोषकी 
दृत्तिया विद्यमान हो श्रौर उनसे प्रेरित होकर वह श्रनुग्रह निग्रह्‌ करता 
हो-आशीवदि श्रौर श्रभिशाप देता हो, तवतो उसकी भवित करनेसे 
कुछ लाभ हौ सकता है । यदि उसमे वह वृत्तियां नही है, वह वीतराग 
है तो उसकी भविति निरथेक क्यो नही है ? 


वहत लोगो के चित्त मे यह्‌ प्रश्न उठता है किन्तु उसका मूल भवित 
विषयक शुद्ध ज्ञान का अभान है । भविति का मूल्य समप मे रै, ग्रहण 


६० | [ ग्रोकार: एक ्रनुचिम्तन 


प्रौर हृदय कौ उच्छुखल वासनाका पोषण भौहोजाय तो कौन 
एेसान करना चाहेगा ? 


परमात्मा कौ भक्ति का उदर्य कामक्रोध प्रादि दुर्वासिनाश्रो का 
उन्मूलन करके वीतरागभाव प्राप्त करना है, मगर दाम्पत्य भावसेकी 
जानेवाली भक्ति इसन उदुश्य को पणं नही कर सकती । यही नही, वह्‌ 
प्रकारान्तर से कामुकता की वृद्धि मे सहायता करती दै । 


भक्ति विषयक यहु कल्पनां साहिप्यिक रूप मे कितनी ही सात्विकं 
क्योनहो, व्यवहार मे सात्विक नही रह सकती 1 इतिहास साक्षी 
किवे सात्विक रहीभी नही) इस प्रकारक विक्त भक्ति ने 
सहस्त्रो जनों को ध्म-विरोधो बनाया है । 


जेन परम्परामे भी भक्तिमागं को समूचित स्थान उपलव्धहै ) 
श्रौर इस विषय पर प्रचुर साहित्यका निमि भीदहुश्रा है। मगर 
जैनधमं का मूल श्रौर मुख्य उदेश्य परिपूणं वीततरागभाव कौ प्रात्ति ई, 
प्रतएव उसके श्रनुरूप ही वहा भक्ति का विधान किया गयाहै। 
न्होने रागद्वेष, काम क्रोध, श्रादि समस्त श्रात्मिकं विकारो 
पर्‌ विजय प्रप्तिकरलीरहै, जो सर्वज्ञता श्रौर सर्वंदक्शितां प्राप्त करके 
प्रव्यावाध श्रनन्त सुल के भागो बन चके हैः एमे प्ररिहन्त भगवान्‌ के 
के प्रति, चतुविधि तीथं के नायक एवं भ्राचार का पालन करने-कराने 
वाले धर्माचार्यो के प्रति, वहुश्रूतो ्रागम के वि्िष्ट चक्ताश्रो कै प्रति 
श्रौर ती्थकरो द्वारा उपदिष्ट प्रवचन के प्रति विशुद्ध भावपरं श्रनुराग 
होना भक्ति रै ।| 
“विश्ुदध भावपूणं अनुराग" का तात्पयं यह है कि वीतराग भगवान्‌ 
के प्रति हदय मे ेसी गहरी, व्यापक एवं जाग्रत प्रीति उत्पन्न होना 


------- 
.--~ -~--~---------------- 


¡} ब्रहुदाचाय॑वहृभर्‌तेषु प्रवचनेषु वा भाव वियुद्धि युव्तोदनुरागो 
भवित्तः 1 सर्वार्थसिद्धि, ग्र. ६-२४, ततस्वाथमाप्य श्र, ६२३ 


६१ ] { ओंकार : एक श्रनुचिन्तन 


चाहिए कि वह्‌ अ्रनन्यनिष्ठा बन जाए-जगत्‌ के पदार्थो श्रौर सखो पर 
अनुराग न रह जाए । कहावत परसिद्ध है एक म्यान मे दौ तलवार 
नही रहं सकती । मानव का मन म्यानहै श्रौर उसमे प्रमात्मध्रीति 
जव प्रगाद् रूपमे जग्रेत होती हतो श्रन्य पदार्थोके अ्रनुराग को कोई 
श्रवकाश नही रदता । भक्त उस स्थिति मे श्रपने श्रापको भगवत्समपित 
गरनुभव करने लगता है श्रौर शनैः शनैः उसको श्रनुभूति तन्मयता का 
रूप धारण कर चेती है। उसमे भागवत्‌ गुण प्रकट होने लगते है श्रौर 
शन्त. भवतत ही भगवान्‌ वत्तं जात्ता है ) 


जैन परस्परा मे श्रनादिसिद्ध एक ईश्वर की सत्तास्वीकारनही की 
जाती । ईश्वरतत्वं पर एक व्यवित का शाश्वत एकाधिपल्य (पजा जणुर) 
नही है । प्रत्येक साधक श्रौपाधिक भावो से मुवि प्राप्त कर श्रौर शुद्ध 
ग्रामा स्वरूप को प्रकट करके ईश्वरत्वं की विभूति का अधिकार वन 
सक्ता है । अ्रतएव भक्ति का उद्देदय भ्रन्ततः स्वयं ईश्वर बनना है। 
ईश्वर कादास या सखा वन के रहने मे भक्तिकौ चरम कृताथंता नही 
है। इस प्रकार भवितत ईश्वरत्व प्राप्ति का साधन है, साध्य नही । भक्ति 
को साध्य श्रौर साधन उभय रूप मानना भ्रान्ति है । 


भवित के चिषय मे एक प्रश्न पर विचार करके हम इस प्रकरण 
को समा करेगे! प्रश् यहहैकि ईश्वरमे यदि रोष श्रौर तोपकी 
यृत्तिय। विद्यमान हो श्रौर उनसे प्रेरित होकर वह श्रनुग्रह निग्रह्‌ करता 
हो-्रारीर्वाद ्रौर श्रभिशाप देता हो, तव तो उसकी भविति करे से 
कुछ लाभ हो सकता है । यदि उसमे वह्‌ वृत्तियां नही है, वहु वीतसग 
है तो उसकी भवित निरथंक स्यो नही हँ? 


वहत लोगो के चित्त मे यह्‌ प्रश्न उठता है किन्तु उसका मूल भक्ति 
विषयक शुद्ध ज्ञान का अभाव ह) अवितिका मूल्य समपंरामे है, ग्रहण 


६२ | | भ्ोकार : एक भ्रनुचिन्तन 


मे नही । देहिक या पारलौकिक धुख साघन प्रात करने के उद्देश्य से 
को जाने वाली भक्ति वस्तुतः भव्ति ही नही है। भक्ति का उद्देश्य 
विषयतप्सा एवं कामना को नष्ट करके वीतरागता प्राप्त करना है, तकि 
कामनाभ्रो की पूति करना । जो लौकिक कामना कौ पृत्ति केलिए 
परमात्मा की भक्ति, स्तुति या प्रार्थना करता है, वहु कृषक से भी 
प्रधिक भाग्यहीन दै जो भूसे के उदूदेश्य से कृषि करता है । 


परमात्मा के गुणों मे श्रनन्य भ्रनुराग उत्पन्न होने पर विपय जनित 
सुख श्रौर सुख के साघनभ्रूत पदार्थो की निगुनता अरन्तःकरणा मे वद्धमूल 
हो जाती दहै। अनासक्ति की वृद्धि होतीदहै ्रौर पापाचार का परित्याग 
हो जातादह। एेसी भ्रवेस्था मे श्रपूवं समभाव जगरेत होतादै शरीर 
निराकलता के निरुपम भ्रानन्द कौ उपलन्धि होने लगती हँ । यह भानन्द 
इतना तीन्न श्रौर वास्तविक होता है कि विषयजन्य वैकारिके युस इसकी 
तुलना मे नगण्य होता है । शनैः शनैः भक्त घ्रात्मदुद्धि के महामागं पर 
मरग्रसर होता जाता है श्रौर परिपूणं श्रात्मानन्द का भाजन चनताहै। 
यही भवित का सवसे वडा श्रौर महामूत्य पुरस्कार है। इस प्रकार 
वीतराग देव हमे जो देते नही, उसे हम वीतराग कौ भविति करके 


स्वयं प्राप्त करलेते हि। 


एेहिक लाम की प्रापि के लिए परमात्मा मे सरागित्व फी कल्पना 
करना श्रनात्मज्ञता का परिचायक दै । पिद्धले समय कौ जन स्तुतियो 
या प्रार्थनाग्नो मे यद्वि रेहिक याचना की प्रवृत्ति कही-कही टदृ्टिमोचर 
होती दै तो उने पडौसियोका ही प्रमाव समभना चाहिए । 


भक्ति, स्तुति, स्तवन, प्राथेना, भजन श्रादि एक ही श्रभिप्राय ठैः 
सूचक है । उत्तराव्ययन सूत्रम चतुवि्तिस्तव-चीवीस तीर्यद्रो फी 
स्तुति का फल सम्यग्दर्शन की विदुद्धि बतलाया गया ह, इटलो या 


श्रोकारं : एक भ्ननुचिन्तन | [ ६३ 


परलोक सम्बन्धी वैभव नही 1 अत्तएव सच्चा मुमुक्षु पुरुष वीत्तरागता 
की प्र्निके लिए ही वीत्तराग की स्तुत्ति या भक्ति करता है। 
यही मक्ति का महान्‌ फलहै। लौकिक वभव उसके लिए महतत्वपुं 
नही होता, फिर भी श्ुभभावना-जनित पुण्यके परिपाक से वहु 
ग्रनायासदही प्राप्त हो जातादहै। 


ॐ चवीसत्त्यएरणं भते, जीवे कि जयद्‌ ? 
चउवीसत्थएणं दंसणविसोहि जणएयद्‌ । 
--उत्तऽ श्रध्ययन २६ 


[ १३] 


ॐ कां विराट रूप 

ॐ यह श्रक्षर हौ सन कृं है । जो कृ भी भरत है, 
वतमान है श्रौर भविष्यत्‌ है, सव उसी की व्यास्या है, इस कारणा सव 
श्रोकारहीदहै। इसके अ्रतिरिक्तं जो श्रन्य चरिकालातीत वस्तुहै, वहुभी 
प्रोकारदहीदहै 

उपनिषद्कार श्रोकार को ब्रह का वाचक शब्द स्वीकार करतेहै 
ग्रौर वाचक तथा वाच्य को एकान्त भ्रभेद मानकर उसे सर्वालमिक प्रति- 
पादित करते है । उनका कथन रै कि इस चराचर विश्व के त्रिक 
पदाथ श्रौर त्रिकालातीत जो तत्व है वहु सव प्रौमात्मकही ह} उनका 
यह्‌ प्रतिपादन श्रहतवाद की पृष्टभूमि पर श्रवलम्वित है। 

किन्तु किसीभी वस्तु के पारमार्थिक एवं परिपृणं स्वरूप को हुदयंपम 
केरे के लिए कोई भी टेकान्तिक दृिकोण पर्यात्ति नहीदै। जव तक 
विविध दष्टिकोणों से वस्तुस्वरूप का प्यलोचन न किया जा, सत्यकफी 
उपलन्धि नही होती । किसी भवनकाएक दिक्षा से लिया गया चित 
परिपुणं नही कहा जा सक्ता । उस चित्र मे भवन का प्रधिकांल भाग 
श्रहदय ही रहा । 

वस्तुस्वरूप पर तटस्थ भाव से विचार कियाजायतीषएक ही वन्तु 
मे श्रापातत्तः परस्पर विरोधी जपे प्रतीत होने वाते भ्रतेक स्वभावो कौ 


† श्नोमित्रेतदक्षरमिदं सर्वं तस्पोपादानं भूतं भवद्‌ मविग्पदिति 
स्वंगोडकार एव । यथान्थत्‌ त्रिकालातीतं तदप्योद.कार एव । ~ 
माण्डूक्योपनिपद 





९५ 
शकार : एक अनुचिन्तन | 


प्रतीति होती है। जगत्मे भी पदार्थ, ये एनः ए मै रप 
भिन्न भो नही श्रौरभ्रभिन्न मोनहीहै) भेद र नीति च १ 
६\ जल से तृषा दान्त टौ सकती ६, 9.0 ॥ 
भोजन का परिपाक होसक्ताहे, उल सेना । मनृष्य ५ ४ ॥ 
श्रादि मे चेत्तना की जो विदेपत्ा रृषटिगोचर रोती ९, धर यथ पद्रार्पा 
नही दै! इस प्रकार भौति-भोति से प्रतौत होने वासे ध य परपेोप्‌ 
करना एक प्रकार से अ्रपने श्रस्तित्व का ब्रपलाप करना “1 षिन प्म 
विभिन्नतामे भी क्ण कुदं सामेजस्य नटी ह? एवास्पत्ता नो £" 
कम से कम सत्तानामकघ्मतोरेसाहं ही, जिते नाधार 


विश्ववत्तीं समस्त पदार्थो मे रहौ हुई एकषूपता को यरलनां 
सक्ते है । 


0 | 


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१. {६ 


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[4 
1 [+ 
॥ 


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4 


तो अगन्न्‌ के समस्त पदार्थं भेदाभेदारमकः ह \ उनपत प्रन्रूपाप्न 
प्रयोजन के श्रनूसार कभीभेददटृष्टिफीतो कभी प्रभृटि कौ प्रधानता 
के श्रनुसार होता है । मण्टूक्योपनिपद्‌ मे जो कथन किया गया, यद 
प्रभेद की प्रधानतासेदी सद्धत होताहै। इस दृष्टि के श्रनुसार चराचर 
विद्व प्रोकारसूपही है) भ्रोकारब्रह्यहं श्रीर ब्रह्म सत्ताका वाचक 
है । श्रतः सत्तारूपसे जगत्‌ एक है । सत्तासे जो वितक्षण॒ दै, वट्‌ 
ग्रसत्‌ के प्रतिरिक्त क्या स्कताहै? 

मगर यहां ओकार के विराट्‌ स्पकी करपनाश्रन्य प्रकारसेकी 
गर्दै । चित्र देखनेसे भ्रतीत होगा कि उसके विभिन्न विभागो मे 
विविध भावात्मक द्रव्य-साव स्प श्रद्धोका संविधान भी एक नूतन 
कल्पना टार संजोया पया ह 1 

ग्रोकारके चित्ररमे तीनो सोकोकी स्थितिका स्वरूप प्रदत्त 
किया गया है 1 सर्त्रथम ऊंचाई पर ऊर्वंलोक मे देवपद श्रौर मोक्षपद 
की प्रा्िके साधन विभिन्न धर्मोके टृ्टिकोणो से वत्तलाए रणए है] 
देवलोको का भौ उल्लेख क्या गया है । मव्य भाग मे भारत कै प्रधान- 


६६ | [ प्रोकार : एक ग्रनुचिम्तन 


मन्त पं नैहर द्वारा विश्व-शांति के स्वप्न को साकार करने कै उदस्य 
से प्रचारित पंचशीलों को स्थान दिया गया है । ब्रघौभाग मे, ग्रधोलोक 
मे स्थित नरक भूमियोका श्रौर उनमे जाने के कारणो का उत्ते 
किया गया है। 

ॐ के विकसिते मागं मे श्र्थात्‌ परचादवरत्ती भागमे उननौ प्रदो 
को श्रद्धित किया गया है, जिनकौ विधिवतु साधना से मुक्ति प्रतत होती 
है। शीष॑स्त भिदां इस पद से यह भाव व्यक्त किया गया है । 

इस कत्पना का किचित्‌ विवरण रागे दिया जाएगा } 


ऊध्वं भाग 

ग्रोकार महामन्त्र के स्मरण का मुख्य लक्षय प्रात्म-शुद्धि प्रात करके 
सिद्धि प्राप्त करनाहै। क्तु ग्रोकारका स्मरणाग्रौरजपतवही दु 
होता ह जव श्रन्तःकरण पाप-वासनाग्रो से रहित हौ । पापमय वासनाभ्रो 
को, जिनका मूल श्रत्यन्त युहृढ भ्रौर गहरा है, उन्मूलन करना रहु्ी- 
सेल नही है पापाचर्णन करने का संकल्प करतेने परमभी प्रौर 
पापाचरण से निवृत्त हो जाने परमौ चुपुत्त रूपमे वासनां विद्यमान 
रह सकती है । उनके उन्मूलने के लिए पाप परित्यागे साथ-साध् 
शुभ रौर शुद्ध अ्रध्यवक्षायो मे रमणा करने कौ भ्रावश्यकता होती ६ । 
निरन्तर सतकं श्रीर सावधान रहना पड़ता है, चित्त की पूरी तरह 
चौकसी करनी पडती है । 

जिन पाप-व्यापायोस्े विरत हुए विनाग्रोकारका चिदृद्ध स्मरण 
चिन्तन श्रौर मनन सम्भवनदी है, उनमे पाचि प्रमुख ह--दह्सा, 
ग्रसव्य, श्रदत्तादान, श्रब्रह्म श्रीर परिग्रह) दन पाच व्यापारो से 
मलिनता उत्पन्न होती रै, रागश्रीर हष की परिणति प्रवत होती ६ 
श्रौर श्रात्मा श्रात्मरमणस्ते विमु होकर वहिमूख वननादु। दन 
पाणोंकात्यायकरनेसेही पच महाव्रतों कौ निष्पत्तिहोनी दै) पनि 
महाव्रतो का संतत विवरण इस प्रकार दैः- 


श्रोकार : एक अनुचिन्तन | [ ६७ 


अ्रहिसा महाव्रत 


प्रमादवन्ल होकर मन, वचन याकायसे किसो भी स्थुल, या सूक्ष्प 
प्रासी को दुःख ने पर्हुचाना, उसका वधन करना, दूसरोकेष्टारावधन 
करवाना श्रौर वध करनेवाले का प्रत्यक्ष श्रथवा परोक्षरूप से श्रनुमोदन 
न करना ग्राहिसा महात्रत ह 1% 

अरहिसा परम धर्मं है, इस विपय मे समस्त धर्मशास्त्र एकमत है 1 
जिन्टोने हिसापरक कर्मकाण्ड का विधान क्रियादि, वेभी हिसा को धमं 
कहने का साहस न कर सके । उन्होने इस हिसा को भ्रहिसा कहकर ही 
जनता के गले उतारने का प्रयत कियाद 1 इससे सहजही श्रहिसा 
के महत्त्व ्रौर प्रभाव का अनुमान लगाया जा सकता वास्तवे भे 
अरहसि के प्रति जनमानस मे सर्दव गहरी भ्रास्था रहीदहै, भ्राजमभी ह 
ग्रौर भविप्यतु मे भी रहेगी । ब्रहिसा स्वानुभवसिद्ध घमं है । योडा-सा 
कष्ट भी हमे पर्हैचि, यह्‌ वात हमे रुचिकर नहीदै तो दूसरोको किस 
प्रकार रुचिकर हौ सकती है ? जिस प्रकार हमे जीचित्त रहना प्रिय है, 
वध श्रत्रियदहै, उसी प्रकार श्न्य प्राणौभी जीवित रहना चाहतेहै 
श्रौर वध उन्हें प्रिय नही है) जो इस सोधी-सादी वात को समभे सकता 
है, वह्‌ ्रष्हुसा को भी समभ सक्ता है 1 

साधना के शत्र मे मवत्तोणं होने वले साधकके लिए ग्रहिसाधमं 
का प्राराधन करना सवंप्रथम प्रावदयक है! श्रह्सा की भावना जाग्रत, 
हुए विना साधना संभव नही है } साधना का श्रभिप्रायही श्रहिसादहै। 
यम, नियम, जप, तपं भ्रादि समस्त साधन प्रहिसाकौ श्राराघना कै 
लिये है । सत्य ्रादि व्रत ्राहिसाव्रत्तको ही शाखायेदहै) इसी कारण 
हिसाकारौ सत्य भी वस्तुतः भ्रसत्य कौ कोटि मे गिना गया दहै! 


% न यतप्रसादयोगेन जीवितव्यपरोपणम्‌ 1 
चसा स्थावराणाञ्च, तदहिसाव्रतं मत्तम्‌! --पोगशास्त्र, १-२० 
‡ वैदिकी हिसा हिसा म भवति । 





६८ ] [ ्रोकार : एक अनुचिन्तन 


हिसा का श्रथ वहत श्यापके है । जसे दूसरे प्राशियो को व्यया 
पहुचाना परहिसा है, उसी श्रन्तःकरण मे राग, देष, मद, मोह श्रादि 
विकारो का उत्पन्न होना स्व-साहै। दूसरे कोकष्ट देने का संकल्प 
या प्रयत्न होने पर पर-हिसा कदाचित्‌ हौयानभी हो, किन्तु स्वर्हिसा 
या श्रात्मवधत्तोहोही जातारहै। चित्त से उत्पन्न होने चाले प्रत्येक 
दुर्माव से श्रात्महिसा होती है, शयोक वह श्रात्मिके शान्ति का विघातक 
होता है। ग्रतएव श्रहिसा महात्रत का श्राराधक साधक श्रन्तःकरणमे 
उत्पन्न होने वाले दुभविौं का निरोध करके स्वहिसा श्रौर श्रन्य प्राणी 
को कष्टन पर्वा कर पर हसा से विरत होत्ता है। यही ्रहिसा-बरह्यकी 

सच्ची साधना) { 

सत्य महान्रत 

प्रिय, पथ्य ओर तथ्य व्चनकारही प्रयोग करना श्रीर श्ररात्य षय 
सर्वथा त्याग करना सत्य महाव्रत ह । 

सत्य महाव्रत के इस लक्षण मे तथ्य" के साय प्रयुक्त प्रिय श्रौर 
"पथ्यः विदोपणो पर विशेष खूप से व्यान देने की भ्रावद्यकता है। जो 
घचन तथ्य श्र्थात्‌ यर्थाथतोरह किन्तु ्रप्रिय टै, श्रवा श्रहितकर~ 
प्रनर्थकर है, वह्‌ सत्यमे परिगणित नही है । 

सव्य पहिसा का पोपकत्रतदै। श्रत्व जिस वाणीसे हिसाको 
पोपणा या प्रोत्साहन मिलता दै, जिससे दूसरे के नित्त को व्यथा प्टुचती 
है अधवा जिससे श्रपनी श्रात्मा मे मलीनता उत्पन्न ोतीदै, एेसी त्थ्य 
वासी भौ श्रमत्यहीहं। श्रतएव वास्तव मे सत्यवादी पृम्पवही टे जौ 
नथ्य के साथ हितकर श्रौर प्रियकर वननोकाही प्रयोग फरता ह) 





हिसा श्रूताना जगति विदितं ब्रह्य परमम्‌ । 
--श्राचायं समन्तभद्र 


॥। 


प्रकार : एक अनुचिन्तन | ६६ 


सत्य का सेवक ही भगवान्‌ का सेवक ठै, क्योकि स्त्य साक्षात्‌ 
भगवान्‌ का रूप है ।* चह क्रोध, लोभ, भय श्रौर उपहास से प्रेरित 
होकर भी कभी श्रसत्य का प्रयोग नही करता । सत्यवादी पुरुष 
पृथ्वी का श्राभूषण है मरौर उसकी चरणरज से पृथ्वी पावन बनती है। 


श्रस्तेयमटात्रत 


भ्रस्तेय का अथं है अ्रदत्तादान याचोरीका सर्वथा व्याग करना) 
साधक जन किसी भो सजीव या निर्जीव, श्रत्पमूल्य या महामूत्य, सूक्ष्म 
या स्थुल वस्तु को, मन वचने भ्रौर काय से, उसके स्वामी के हारा 
दिये बिना ग्रहण नही केरते 1 उनकी अ्रावदयकत।एं प्रत्यन्त स्वल्प होती 
है। वे उन प्रावदयकताभ्रो को इस विधि से पूणं करते है कि उन 
श्रदत्त को ग्रहण करने कौ अ्रावह्यकता ही नही पडती । जिस वस्तुका 
जो न्यायतः स्वामी है, उससे याचना करके ही वे श्रावदयक वस्तु को 
ग्रहृण करते है \ र 

म्रदत्तादाने एक भीषा पाप है, क्योकि उससे वस्तु के स्वामी 
को मामिकं प्राघात्त पहुंचता है । श्रतएव धार्मिक पुरुप किसी भी वस्तु 
को दिये विना ग्रहण न करे । किसोकी कोई वस्तु राह चलते गिर 
गई हो, कोई कही रखकर भूल गयादौ, गूमहो गई हो, ओरौर कितनी 
भी अ्रनिवायं प्रावर्यकता क्यो नम्रा पडीहो, तथापि उसे ग्रहण करना 
उचित्त नही है । 

इसं प्रकार त्रिकरण॒ त्रियोग से श्रदत्तादान कात्याग करना भ्रस्तेय 
महाव्रत है । 
ब्रह्मचये महाव्रत 

भारतवषं के सभी षि-मुनियो ने मुक्त कंठ से ब्रद्यवयं का महिमा- 


तं सच खु भगवं ।-प्रश्नव्याकरणसूत्र, सं, २1 


१ [ प्रकार : एक अनुचिन्तन 


गान करक श्रपनी वाणी को पावन किया है) तप सभी उत्तम ह, रिन्तु 
रह्मचरं सव तपो मेँ उत्तम दै ।# ब्रह्मचर्यं का पालन करे से शरीरय, 
मनोवले ओर ग्रात्मवल क वृद्धि होती है । ब्रह्यचारो के मूखमण्डल धर 
एके अनरुटी दिव्य आभा चमकती दहै! जो दुर्जय कामविकार को जीत 
लेता है, उसके लिए भ्रन्यान्य विकारो को जीत्तलेने मे कोई फथिनाईं 
नही होती । 
बरह्मचयं का श्रथं मधुन-निवृत्तितो है ही, किन्तु उत्तका व्यापक 
रथं है-समस्त इन्द्रियो का श्रौर मनका निग्रह्‌ करके ब्रह्म प्रथि भ्रात्मा 
मे रमण करना । 
ब्रह्मचयं महात्रत कौ सिदधिके लिए पूणंखूपसे काम भोगसे विरते 
होना श्रावदयक है श्रौर उसके लिए कतिपय नियमों का पालन करना 
प्मनिवायं है) वे नियम इस प्रकार दै 
१. ब्रह्मचारी पुरुप एेसे स्थान मे शयन या श्रवस्यानन करे जहांस््रीः 
नपुसक (हीजड़ा) या षडु 
२. सियो के सम्बन्ध में एसी चर्चावार््ता न करे जिसे कामवासना के 
जाग्रत होने कौ संभावना हो-विकार को प्रोत्साहन मिलता हो । 
३. सियो के साथ सम्पकं न रवं । 
८. रमरियों के मनोस्म श्रंगोपांगो का श्रवतौकने ने करें । सह्या 
दृष्टिपात हो जाय त्तो उसी प्रकार हटा वे जैसे सूर्यकी प्रोरमेदृटा 
ली जतीदहै। 
दीवार, यवनिका श्चादिकीश्रोटमे न्तियो फा कूजन, मागन, म्य 


ग्रादि सुनने का प्रयत्न न करे । जहा इ व्रद्मारका व्याघात ठ, 
व्हा न ख््रे 1 








=-= 


% तवेसु वा उत्तम वंभवेरं ।-रुवगडागूष 


ओंकार : एक अनुचिन्तन | [ ७१ 


६ पूवत कामक्रीडा का स्मरण न क्रिया जाय । 

७ जिह्वा-इन्द्रिय पर श्र॑कुश रवे । विकारवद्धक प्राहार-पान 
का सेवनन करे। 

८ श्रतिभोजन से वचे। 

& साज-षुद्धार न करे। 


बरह्माचयं की रक्षा के लिए पुरुषो को उल्लिखित्त वातो पर जसे 
ध्यान रखना ्रावर्यक है, उसी प्रकार ब्रह्मचारिणी महिला को भी। 
उसे पुरुषो के संसगं से उसी तरह वचना चाहिए जिस तरह पुरूष को 
स्त्री-संपकं से वचने का विघान किया गया है । 


उपयु क्त नियमो प्र दढ रहते हुए तीन करण श्रौर तीन योग से 
पुं बरह्मचयं का पालन करना ब्रह्मचयं महात्रत कहलाता है । 


श्रपरिग्रह महात्रत 


समस्त पदार्थो मे मूर्धा का श्रभाव होना भपरिग्रहु महात्रत ३ै। 
कोई पदाथ प्राप्त नही है, कितु तद्विषयक ्रासक्ति यदि श्रन्तःकरण मे 
हैतो वह भो परिग्रहम परिगरित है। श्रतः सच्चा प्रपरिग्रही वहीहै 
जो जगत्‌ के पदार्थो के साथ-साथ उनसे सम्बन्धित भ्रासवित के प्रवल- 
पाड से श्रपने को मूक्तं रखत्ता है 1 


समस्त दुःखो का मूल स्व्ौत कामना ह । भगवान्‌ महावीर ने 
सांसारिक दुःखो से दुटकार। पाने का एक प्रमोघ उपाय वतलाया है- 
कमे कमाही, 
कमियं खु दुक्खं । 
दरर्व० भ्र०र 


कामनाग्रो से ऊंचे उठ जाश्रो। फिर समभलो करिद्ृःख से 
उपर उठ गए । † 


७२ ] [ ओंकार : एक भनुचिन्तन 


जव तकं अन्तःकरण कामनासे कलुषितरै, दुःख से मुरिति पाना 
सम्भव नही है! कामना््रो की पुति मे सुख को गवेषणा करने वाते 
मूृग-मरीचिका ये शीतल जल की गवेषणा करते है । उनका नुव-प्राप्ि 
का स्वप्नं ्रनन्तकाल मे भी साकार होने वाला नही है, क्योकि कामना 
तो वह क्षितिज है । जिसका कही ्रोर-छोर नही है । एक कामना की 
पूति ही जरा सेकड़ो नूतन कामनाश्रों को जन्म देती है, वहाँ सुण कफो 
कल्पना ही कंसेकीजा स्कतीटहै? 


देवलोक 


पुवक्ति पाच महाव्रतो का मनसा वाचा कर्मणा आराधना करने 
वाले सभी साधक निर्वि नही प्राक्त कर पति । चिरपुरातन श्रीर्‌ 
समय समय पर होने वाले न्रुतन कर्म किसी किसी श्रात्मा मे पतनी गहरी 
जड़ जमये होते ह कि उनका उन्मूलन करने के लिये जन्म जन्मान्तर गें 
साधना केरनी पडती है, संस्कारो का संचय करना पडताटहै) इन 
चिरसाधना के श्रन्तराल मे एेसाभी समय श्राताटहै जव माध्रकको 
शुभ परिणतिजनित पुण्य के प्रभाव से ्रम्युदयकौ प्राति होती है प्रयात 
उसे दिग्य लोक (स्वर्ग) मे जन्म धारण करता है । दिव्य लोक स्क 
सांसारिक सुख का स्यल है, तथापि मृमृक्षु के लिये वह्‌ स्पृहणीय नी 
हेता, क्योकि मानवीय मुख के सदृश ही वह्‌ भी य्याथौ, परिपूग्णं एवं 
भ्रात्यन्तिक श्रातक प्रात करने मे वाधक है सच्ने मुमृक्षु के तिष्व 
मंजिल नही, मंजिल तक पहुचने फे लिए एक पडाव मात्र 


देवलोक मे सर्वोच्च स्यान पर पाँच श्रनूनम्‌ विमानद्ै, जिनके नाम 
चिजय वैजयन्त, जयन्त, श्रपराजित श्रीर्‌ सर्वा त्तिदद्े, इन विमानो 
मे जन्म तेने वाते एकनदो वार उन्म धारण करक ही निदि प्रान करर 
लते र 1 

उनप्ते नीये सवेयक विमान! पृच्याष्ति तोक के एोवारयानमे 


ग्रोकार : एक श्रनुचिन्तन | [ ७३ 


होने के कारण उन्हे "ग्र वेयकः संज्ञा प्रदान कौ गद है, इनकी संख्या 
नौ है। ॥ 

ग्रंवेयक विमानो के नीचे वारह देवलोक भ्रीर है जो सौधयं, एेवान 
रादि के नाम से विस्यत्तहै। 

देवलोको के विषय मे एकं वातत उल्लेखनीय है । वह यह्‌ कि नोचे 

वारह देवलोको तक मत्यंलोक के समान गास्य-शासकभाव दहै । वहां 

देवगण साधारण प्रजा कं समान है, इन्द्र राजाकरे स्थान पर । इन्दर 
के ्रधीन सेनायें हत्ती है, लोकपाल होता है । मनुष्यो कं समान देवो 
मे भी कभी कभ पारस्परिक संघषं हो जाता है। भ्रनूराग. विराग 
जैसी साधारण मनोदृत्तिर्या वहां भी श्रपना काम करती है । प्राघ्यात्मिक 
दृष्टि से स्वगं या देवलोक कोई स्पृहणोय वस्तु नही है। देवगण भ्रंशतः 
भी संयम श्रंगीकार नही केर सकते । ससिारिक मुख एवं विलास के 
मादक वातावरण मे उनकी ्राच्यात्मिक चेतना जागृत ही नही हो पाती । 

चारह्‌ देवलोको मे पांचा ब्रह्यदेवलोकं है । वहा नौ लौकान्तिक 
देव निवासकरतेदहै) ये देवपि कहलाते है श्रौर उनक्रा भवभ्रमण 
लगभग निकट होता है । 
बोद्ध पंचज्ञील 

हादस्च देवलोको के नीचे वौद्धमत-सम्मत पाच शीलो को स्यान 


दिया गया है । रील का श्रथ श्राचार एवं श्रनुशासन है । उनके नाम इस 
प्रकार है- 

१--्राहिसा 

२--भ्रस्तेय 

३--त्रह्मचयं 

४--सत्य 

१--मदयपान त्याग 





* पाणी न हन्तव्वो, श्रदिन्नं नादातव्वं, कमसु मुच्छा न चरित 
मुरा न भासित्तव्वा, मज्जं न पातच्वं। --वौद्धकालीन प्रस्त 


७४ ] [ ओंकारः एक गनुचिन्तन 


यह्‌ पचगोल जनो के महात्रतो जसेहीरै रीर उनको व्यास्यामे 
ही इनको व्याख्याश्ना जाती भ्रन्तर केबल पांचवें शील मे ई) 
महात्रतो मे पांचवां श्रपरिग्रह है जव किं जोलोँ मे मदपानं व्याग जन 
परम्परा के श्रनुस्तार मदत्याग महान्तो कौ पुर्व॑भूमिकामे ही कर्‌ द्विया 
जाता है। 
वेदिक पंचयम 

वैदिक संस्छृति ने भी जीवनोत्यान कौ मंगलमय प्रेरणां प्रदान फरने 
देतु पंच महाव्रत श्रौर पंवशील की भांति पंच यमो का उत्तेख रिग 
है। यमका श्र्थं संयम, सदाचारं श्रौरभ्रनुशासन है । वे पचयम दरस 
प्रकार ह-१. श्रहिसा २. सत्य ३. प्रस्तेय ४.ब्रह्मचयं ५. भ्रपरिग्रहु-्रकिसन 

पंच यमों को भी पंचनील की तरह हृदय स्थल पर श्रंकिते किमा 
गया है। 


मध्य साग 


लवं पद्‌ 

श्रोकार के मध्य भाग मे अर्यात्‌ पदचाढर्ती श्रंशमे जन-दर्यन सम्भत 
तव पदो की स्यापना की गई है । यह नव पदश्चद्रय ह, श्राराप्यरह 
नौर ॐ पद के ही विभिन्न ्रद्धरहै। इनको श्रदा-पराथना का भुम 
लक्ष्य मूक्तिप्रास्त करनादहीहे। श्रतएव ॐ कैः विनित भाग पर एन 
शरादषं तव पदो को स्थान दिया जाना उपषृक्त श्रौर गुक्तिगद्वप दीद । 
शप्रो के स्वच्चि भाग पर धमिद्धागां' पदकाश्रदुन निपा रयाद्‌ । 
वहु भोध्येयके प्रनुरूप श्रौर मिद्धं कीसर्योकरि््ना क अनृत ॥ | 
नस्तुतः चरम प्राव्यात्मिक सिद्धिहौी साधकके निष्‌ प्मन्मिन ॥॥ 9 
श्रौर वहं सिदिजो मदान्‌ प्राता प्रां फरयुतद, वे उन परम 
म्रासाव्यषहु। इमने "द पद्‌ की सिद्धा पदक साथ एकर पता भी 


च्वनित होती है। 1 


(र 


न रप्रह ‡ -योपमुत्र 
रह्मा - स्याप्तेयद्रह्मयर्यापरग्रदापमःः गम्‌ 


प्नोकार : एक ्रनुचिन्तन | [ ७४ 
उल्लिखित नव पदो क्रा सामान्य परिचय इस प्रकार रहैः- 


रसो दंसणस्स 

१ णमो दंसरस्सः--दशंन शव्द का प्रयोग अनेक अर्थोमे होता 
है, कितु यहा वह्‌ शद्धा! अर्थ में समना चाहिए । 

साघना चाहे लौकिक हौ या लोकोत्तर, सवत्र श्वद्दा की श्रनिवायं 
श्रावदयकता दहै । श्रद्धाके विना साधारण लौकिक कार्योमे भमी पूरी 
सफलता नही मिल पाती, तो श्राष्यात्मिक जगत्‌ के प्रम तत्तत की 
उपलन्वितोहौो ही कैसे सकती है ? एक वार महात्मा गधीने प्रहिसा 
को चर्च करते हुए कहा था--भं अ्रहिसा कौ शक्ति का प्रत्यक्ष श्रनूभव 
करना चाहता ह ! जसे हिरा का फल प्रत्यक्ष है-्रगुली परं द्रौ चलते 
ही भ्रंगूली कट जाती है, वैसा ही प्रत्यक्ष फल हिसा काभी दिखना 
चाहिए 1 मूभे इसमे श्रद्धा है, पर इसके लिए श्रहुट धयं चाहिए 1 घास 
के एकं तिनके एर जलविदु लेकर समुद्र खाली करे मे जितनी शद्धा 


चाहिए उससे भी हजार गुणी श्रधिक श्रद्धा म्रहिसा का साक्षाक्तार 
करने मे चाहिए 1 


गांधीजी ने ्रहिसाकी शक्तिकं साक्षात्कारके लिए जिस श्रचल 


एव च्रपार श्रद्धा वात कही है, वही प्रत्येक प्राध्यात्मिक गक्ति का 
साक्षत्कार करनेमेलग्र होती है । 


किसी भी विषय मे मनोयोगका समग्र रूप मे समर्पित हो जाना, 
दोलायमान प्रतीति का हट जाना श्रीर्‌ भ्रचल संकल्प को हृदता उत्पन्न 
हो जानाश्रद्ाहै। इस प्रकार कौ श्रद्धा न्तर मे जव प्रादुभाव दहो 
जातीरहै तो समना चाहिये कि साधकनेकमसे कम श्राधी मंजिल 
पारकरलीहै। श्रघरुरेमनसे किसी भी महान्‌ कायं कौ सिद्धि चही 
होती ! साधक एकदम श्रागे वदना चाहता है परन्तु उसकी मानसिक 





# गाधी-उज्ज्वल वार्ता पृ० ३ 


७६ | [ ्रोक्तार : एक प्रनु्चितन 


टर्वलता उसे चार कदम पीये घसीट ने जाती है । इसके विपरीत, जय 
किव्येय के प्रति सम्पण श्रद्धा हृदय मे जागृत होत है तो विना वियेष 
कठिनाई के साघक अ्रनायास् ही असर होता चला जाता) श्यो 
यच्छुदः स एव सः-शरद्धा मनुष्य को तद्रप वना देती ह| 

क्यार्जन धर्ममे श्रीर्‌ क्या ऽतर धर्मोमे, शद्धा कौ समान सण 
से महव किया गया है । सम्यक्‌ श्रद्धाके अ्भावमे गंभीर से भभीर्‌ 
नान मी सम्यग्ज्ञान नहीदहौ पाता। बह मिथ्याज्ञाने ही ग्हता ईै। 
सम्यग्नानि रौर मम्यक्‌ चारिव, सम्यकृश्रद्धाकते विना असंभव । 

सन्यगू दन मृक्ति-महल का प्रथम सोपान है। जिस प्रात्मा मे 
एक वार, भल्प कल के लिए भी, सम्यग्दर्शन उत्पन्न हो जाता है, उसका 
भवेश्रमण सीमित हो जाता है श्रौर उसे उस श्रवधि के पथ्चात्‌ नि्चप 
ही निर्वाण की प्रातिहयो जतीदहै) एसी से सम्यग्दर्णन के प्यपार प्रभाय 
श्रीर महत्वे की कल्पना कौ जा सत्ती ह) 

शआरध्यात्मिक साधनाके पथमे शद्रा ही साघक का सवे वा 
सम्बल दै। श्ासे उस साहूसश्रौर धैयं की प्रात्ति होती है यिय 
श्रसाध्य प्रतीत होने वाला कायं भी सुसाघ्य वन चतिद । श्रतएव जिस 
के श्रन्तः करणा में तस्व के प्रति हिमालय कँ समान श्रविच्रच धरदा रै, 
चह साधक भाग्यशाली है श्रौर उसका भाग्य ईर्प्याकरने योग्य है) 

जो लोग श्रद्धा की श्रवगराना करते, उमे जटता फा प्रन सान 
ह मौर तकंको ही तच्वनिणंय की एक माद्र ्रभ्रान्त कसौटी मममत 
ह, त्रे दयनीय ह । उन्होने गहरा मे उतरने फा प्रयाच्तही नदी किया 
ह । स्थूल जगत्‌ मे ग्रोगल जो रहस्यमय गूद्म किन्तु विराद्‌. तत्य रै, 
उसयी माकी श्द्ाके चिना फदापिदेसी नही जा क्ती) दमी द्धन 
नव पदोमे दर्छन को प्रथम स्थान देकर नमस्कार किया गया 1४ 





> चिसेप विवेचन देसे नेगफः एन शसाथना फा सादयार्म-मे सम्पा 


[न 


अय त च--ि 4 


ओकार : एक भरनुचिन्तन | [ <: 


रमो नारस्सः ` ति 

शमो नाणस्वः--हमारे गसोरम नैनाक्यजः ५ ध ् ४ 
कही श्रधिक महत्त्वपुरं स्थान परात्मा मे न्नान का £ । धिर शन य! 
मे चञान सर्वप्रधान शक्ति है । चत्कि यह फटना उपदन लगा ‰8': 
्आलाको "आत्मा हे) ज्ञानक कारणही प्रान्मोषठा जद पन प 
वैरिष्य्य है । नेत्रोके श्रभावमे मी मनृप्यकानोनेनृन मन्ता + 
नाक से सूघ सकता दै, जोभ से रसास्वादन प्रौर्‌ न्पर्तेनवियि भगः 
भूति कर सकतारै, विन्तु जानन होतरातोप्रालामेपृनो जद त 
ही सान्राज्य होता ग्रौर उसका पृथक ग्रस्तित्व न रोता 1 

प्रत्येक आरामा मे अ्जनन्त जानद्रक्ति म्वन्पतः वियमानि?॥ 2 
श्रौर काल सम्बन्धो उसकी कोई परिधि नीट! तीना कन पमः 
तीनो लोको को हस्तामलकवत्‌ जानना टस्वा न्यभाद 1 प्रिमु > 
मेघमाला से आवृत्त चन्द्रमा को नसगिक ज्योल्ता मन्द प्रर मन्धषेर 
दो जत्तीहै, उसी प्रकार कर्मोसे ग्रावरत्त प्रात्मारो शाम्‌ तनि; सध 
मन्द ग्रौर मन्दतरदो रही है। जं मेपपट्ल कै श्रपगमन रमेः पनुपत य 
चन्द्रमा का प्रकार वृद्धिगत होता जाता रहै, रसौ प्रक्ररे पानपो 
कर्मावरण क्षीणं होता जता है, व्योनत्यो श्रत्मिकेक्नानफी माना भौ 
वढतती जत्ती है । जैसे सम्पूरां मेष हट जाने पर्‌ चन्द्रमा प्रप न्याभा{िश 
स्पमे प्रकारितेहो उठता, उसी प्रकार म्राचग्णोफा र्णा स्यणा 
क्षय हो जने परम्रात्मा को मौलिक ज्ञानदात्ति परिपू स्प अ 
ग्राविभूत हो उस्तीरहै। 


भारतवेषं के कत्तिपय दाङनिको की मान्यता क भनुनार्‌ मुक्तं दधा 
मे ्रात्मा ज्ञानहीन हौ जत्ती दै, कितु वास्तवमे रेरा राना प्रमम्भेय 
है। ज्ञान रौर मात्मा का तादात्म्य सम्बन्ध है, स्ानकेनं रहने पर 
भ्रातमा के मस्तित्व की कल्पना हौ नही की जा सकती । मुक्तात्मा जय 
श भ्रौ 1 ९ प हो जाता तो उसका प्रधान 
ै न प भा निस्पाधिक प्नौर निविकार सूप मे जागृत 
त वकार्‌ स्प मे जापर 


७८ [ [ ओंकार : एक अनुचिन्तन 


साघधनाकेोत्र मे ज्ञान का महच्छपुणं स्थान है1 वहु साधन मे 
से साथसाध्यभी टै) सम्यक्‌ शद्रा होने पर ज्ञान मे सम्याच्य प्राता ष 
प्रौर प्नम्यग््ञानके प्रकाशमे की जाने वाली साधना ही फलवती हाती 
दै ।% इसी कारणा यहां जान को नमस्कार किया गया) 
रमो तवस्स 

३ मो तवस्स-तीसरा पद (तप है । तपश्चरण के विषयं भं 
श्रगणित्त भ्रान्तियां फली हृरद है । उन आ्रातियों की परम्परा नूतन नी, 
ग्रति पुरातन है! भगवान्‌ महावर के समयमेभी वहूत सौ श्रान्त्या 
थो । भगवान्‌ महावीर ने उनके निरसने के लिए प्रचण्ड पुरुषां फिया 
श्रीर साधकोको एक श्रभिनवे दृष्टि प्रदान की। भगवान्‌ के समय 
मे नाना विचियों का भ्रवलम्बन करने वाले तापस सम्प्रदाय वियमान 
ये। वे देहदमन फो ही तपस्या का स्वरूप समभे ये। पेचाग्नि तपना, 
कंटकशषय्या पर शयन करना, भ्राकण्ठ जलमग्न होकर शोत फो सहन 
करना श्रादि देहदमन रूपतपकं प्रकारथे। महावीरस्वामी ने द्र 
प्रकार की एकान्त वहिर्मुखी तपस्या की वालतप-घरजञानधूरं तपश्चरण 
कहु कर भत्संना कौ प्रौर वतलाया कि दसस प्रभ्युदय के प्रतिरिक्त 
निःश्वस्‌ नही प्राप्त किया जा सकता । 

भगवान्‌ महावीर ने तपश्चरण विपयकं प्रचलित टृटिकोण मे आमूल 
संशोधन किया । उसके जट कलेवरम प्रासो की प्रतिष्टा फा। उष 
व्यापकं स्वरूप प्रदाने किया । 

वास्तविक तप इच्छग्रो का निरोधकन्नादै) तप केदोस्णरै- 
याह्य जौरः ्रन्तरंग । श्रनयनं भादि का वाह्य तप ग्नौर स्वान्या 
व्यान, विनय, वैयाबरृव्य-सेवा, ब्रह्मच, व्याग ्ादिषा मेन्यररग तपम 
समावेश होता दै। 


[1 र 


% चवितनेप विवेचने साधना का रायमागः मे-नम्यम्डान एः 
परियीननाः देतें। 


ग्रोकार: एक अनुचिन्तन ] [ ७६ 


श्रात्मा को निरावरण एवं निविकार वनाने केलियेमूमुक्षु को दो 
प्रकार के उपायो का ग्रवलम्बन करना पड़ता है , प्रथम अ्रभिनव कर्मो 
क प्राख्चवण का निरोध श्रौर दूसरे पूवंसंचित कर्मो का प्रक्षय, इनमेसे 
भ्रभिनव कर्मखिव के निरोध के तो गृ्ि, समिति, दशविध धमं, अ्नुप्रकषा, परी 
पहु-जप, चारित्र श्रादि अनेक साधन है किन्तु पूर्वसंचित कर्मो के क्षय 
का श्रद्ितीय उपायतपश्चरणदहीदहै तपकी तीव्र भ्नग्नि मे कोटिर 
भवो मे संचित कर्मो को भस्म किया जा सकता है 1 इसके हारा श्रभि- 
नव कर्मो का निरोध भी होता है । यह्‌ श्रदमुत दोहरा सामथ्यं तप के 
सिवाय ग्न्य किसी साघनमे नही दहै। 

समीचीन श्रद्धा श्रौर ज्ञान की विद्यमानताम्रोमे ही तप सम्यक्‌ हो 
स्कताहै श्रौर तभी वहु. मुक्तिका निमित्त वनताहै। इसतथ्य को 
सूचित करने के लिए दन श्रौर स्नान के पद्रचात्‌ तपदचर्ण को स्थान 
दिया गया है। 
-मो चरित्तस्स 

४ एमो चरित्तस्सः-चारित्र की परिधि वहतत विस्तृत ३ । 
ग्रात्मशोधन के लक्ष्यसेजोभी शुभया शुद्ध प्रनुष्ठान किया जाता है, 


सव॒चारित्र के अ्रन्तगंत है । सिद्धान्त चक्रवर्ती श्राचायं नेमिचन्द्र ते 
चारित्र कौ व्यापक परिभाषा वतलाते हुए यही कहा है-- 


प्रसुहाग्रो चिखिवत्ती, सुह पवित्ती य जार चरित्त । 


श्रशुभ व्यापारो से सवथा निवृत्त होकर कुशल श्रनुष्ठान मे परायण 
होना चारित्र कहलाता है । 





# श्रास्त्रेव निरोधः संवरः। स गृति समिति धर्मानुरक्षापरीषहजय- 
चारित्रैः । तपसा निर्जरा च-तत्त्वाथंसूत्र, ९, १-३ 


{ भवकोडिसंचियं कम्मं तवसा चन्िजरिजद-उत्तराध्ययन सूत्र, ३०, ६ 


८० | [ ओंकार :'एक भनूतितन 


मगर यह परिभाषा पर्याप्त व्यापकदोने परमभो चार्मिक समम्र 
चित्र को उपस्थित नहो करती । यह्‌ व्याश्या मूर स्प से व्यावहागिि 
चारि परलाग्रु होती है। निदचय चारित्र को प्राति समस्त प्रतरृ्तिषो 
का परित्याग कर देने पर स्वल्परमणकोदतामेदहीरहोतीद। 


चास्मि के तिना मुक्ति-साधना कौ कल्पना तक नही की जा सकती) 
यही कार्णरैकि व्यौरेमे कही कमश्रौर कही भधिक भेददहोने पर 
भी जगत्‌ समस्त ध्म॑शस्तव्रौने चारित्र की महित्ताको एक स्वरसे 
स्वोकार कियाद! वास्तवमे दर्गनप्मीरस्ञान का सुफल नार्हो 
है। जव साधक हेय श्रीर उपादेय का विवेक प्रप्त करलेताटै तव हेय 
के उपादनि मे सहज ही उसकी प्रवृत्ति होती है ! जिस जाते फा प्रात 
कर लेने पर तदनुरूप प्रवृत्ति नहो, जो ज्ञान भ्राचारमे परिएतन दह, 
वह्‌ वास्तवमे त्नी नहीरहै। 

साधके गृहस्य भी होते ह श्रौर गृहव्यागी-~प्रनगार मी रहते द] 
स्पष्टहै कि दोनो की परिस्थितियां तनी विभिन्न कि उनका भिया- 
कलाप समान नही हो सक्ता । एसी कारणा चारित्र की दो श्रिया 
की गई ह-देश चारिय प्रर सकलचारित्र, जिन्हे मयः देशपिरती श्रीर्‌ 
सर्वविरति भी कहते ह 1 

सर्वविरति में पांच महाव्रत भ्रौर उनफे पौपक दूसरे भनेफःमिध 
भ्राचार सभ्मिसित है! महाव्रत का संधित परिचय हूते प्राचुकरादै | 
उन्हीका ध्रांदिक रूपमे भ्राचरण करना देरयिरति द) दैयविरति 
मे पांच पूर्वोक्त प्रहा शादि प्रगुव्रतो के प्रतिरिक्त नात दीतौ प्माभा 
समवेदं ह ) 

जनश्रत का वदत यडा मागश्रानार निम्पणुने रोका दै षरा 
विस्तार के सखाय यारीकसे बारीक वातो का निस्पण ए करणा 
कि गयां विस्तारय मे यहां उमा उन्तयप माति कियारा 


रहा है: 


्रोकार : एक श्रनुचिन्तन | ८ 


सम्यक चारि भीता कीभापामे कर्मयोग कटा जा मक्ता र। 
कर्मके लिये गीता कौ एक भ्रावद्यक णतं यह्‌ है कि # निष्काम टोना 
चाद्ये । जैन शास्र भी इस शतं का ग्रनेकान्त ष्ट से समयन करका 
है 1 वहा कहा गया है-.पेहिक लाम के उद्देश्ये प्राचार का अनुष्ठान 
नही करना चाहिये, पारलौकिक लाभ के उरटृष्यसे प्राचार ४ 
्नुष्ठान नही करना चादिए ) कोति वर्णं शव्द ग्रौर प्रसा के निमि 

प्राचार का श्रनुष्ठान नही करना चाहिये, कंवल विणुदर प्रारमदवा प्रात 
करने के उददेश्यसे ही भ्रावार का श्रनुप्ठान करना चाहिये भर 

कहा जा सक्ता हैँ कि यदि विशुद्ध श्रात्मददा फीप्राति के उदुरेदय 
से साघक श्राचारका अनुष्ठान करता तो उसमे निष्यमता कटां 
ग्डी ? किन्तु मता कौ निप्कर्मतो काश्रजिप्राय भी लौरक॑पणा सते ही 
समभना चाहिए । साघना कौ प्रायमिक्‌ श्रवस्या मे श्रातमदुदधि कौ पाचन 
श्रौर प्रेरक ग्रभिलाषा विदमान रहती ही टै। उसके प्रभाव मेषः 
साघनाक्षे्र मे भ्रवत्तीणं नही हौ सक्ता ! प्रावमिक श्रवस्या के पदात्‌ 
माघ्यमिक श्रवस्या मे भी वह्‌ श्रभिलापा वनी रहती है, परन्तु पटृते जसी 
व्यक्त रूप मे नही, भ्रव्यक्त स्विति मे रहती दै, साघक जव उच्च 
भूमिका पर चरण्‌ न्यास करता है श्रौर वीत्तरागता प्राप्त कर तेता है 
तमी पूरं निष्काम दशा प्राप्त होती है । दसीलिये कहा जाता ह कि 
क्ति प्रत्त वही करता है जिसमे मुक्ति को भी कामना नहा रह्‌ जातो पु 





% नो इदूलोगहुयाए ग्रायारमहिद्धिन्जा, 
नो परलोगहुयाएु ्रायारमहिद्धिला, 
नो किन्ति-वण्ण-सदढध-सिलोगदुयाये श्रायारमटुद्धिला, 
नेत्तत्य भ्रारहंतिहि देउ श्रायारमदिद्धि्ा । 


--दसवेयाक्लियमसुतं, ९, -४ 
{ यस्य मोक्षेऽप्यनाकाड क्षा स मोक्षमधिगच्छति । 


८२ | [ ओकार : एक सनुचिटन 


इस प्रकार भ्रात्मगोधक श्रनुप्ठान मे परवृत्ति करना श्नौर आत्मल्लस् 
म रमण करना चारितं नामक चोया पद दहै! 


भर रमो लोए सन्वसाहुणं मनुप्यलोक मे वियमान सरवे साभुपो 
को नमस्कार हो। जते मेतरस्ायक अ्रपने तक्ष्य मे एऊनिप्ठ टोकर, 
भ्राने वाले समस्त उपसर्ग को पूरणं दृटृता के साय सहन करता है, उसी 
प्रकार मुमुक्षु साधक शुद्ध श्रात्मोपलच्ि कै उद्दे्य से निरन्तर अग्रत 
भ्रप्रमत्त रह्‌ कर श्रौर जागतिक प्रपचौसे दूर रह कर साधना करता ३, 
वह्‌ साधु कहलाता ह । 


सावु पांच महात्रतों का पालक, पांचो इद्ियो का विजक्ता, प्रोष 
मान माया लोभ से निवृत्त, मन वचन काय, को पाप व्यापार सै निवृत्त 
करने वाला, समिति गुति का भ्राराधक, क्षमा मादव श्रार्जव सत्य शौन 
भ्राकिचन्य ब्रह्मचर्यं श्रादि का श्राराधक, संवेगवानू, समभाय के सीतत 
सरोवर मे धवगाह्न करने वाला, जगत्तु मे स्वित रहकर भो फमतपध- 
वत्‌ जगत्‌ से श्रलित्त, स्वाध्याय एवं ध्यानम निमग्न प्रौर वैसमग्यभाव 
की साक्षात्‌ प्रतिमा होती ह। 

साघु जीवन श्रंगीकार करने का प्रधानदेनुं श्रात्म क्यारा करना 
६, किन्तु भ्रात कल्या का प्रम च्राधार “सवं प्रूतारमश्रुतता' प्र्थान्‌ 
प्रारि माच्रकफो त्रात्मवत् सममनादटै। यह उदार भावना जिकर हरय 
मे मूत्तिमती हो उयटतौ है, वहौ सच्चे संयम फौ प्रारधना कर पाता । 
वह्‌ परक्ल्याण फो श्रारम कल्पाएा का श्रनिवायं प्रग मानतो ए श्रद्‌ 
जगत्‌ कै उद्रवारमे थ्माका उदार मानकर स्वपर म समानि भति 
धारण प्ररके प्रवृत्ति कयना है । प्रतएव उमा जीवन दून क विद 
भी महान्‌ वरदाः होता दै। 


~> 


ध 9 
¢ सायना का रायमामं मे “म्यत चारि: एकः परसिनिय रेणा द 


ग्रोकार `; एक ग्नुचिन्तत | [ ८ 


परक्ल्याण करने को वुद्धिसे क्रिया जाना वालो कर्त्तव्य श्रुकार 
उत्पन्न करता रै 1 उससे भ्रपने प्रति उच्वता रौर उपकरणौीय व्यवित्त 
के प्रति हीनता की भावना भी उत्पन्न हो सक्तौ है} किन्तु जो परोप- 
कार स्वोपकारवुद्धि से किया जाता है, उसे इस प्रकार को श्रवाछनीय 
वृत्तियो के पैदा होने का खतरा नही रहता । आत्म कल्याण के लिये 
परकत्यास करने वाला दुसरो पर एेहस्रान नदी लादत्ता, श्रंहकार से वच 
जाता है श्मौर्‌ प्रत्युपकार की श्रपेक्ान रखनके कारण, प्रत्युपकारन 
होने की स्यितिमें भी निराशा का श्रनुभेव नही करता! वहु निरीह 
भाव से सतत परोपकार मे सौन रहु सक्ता है । 


इस प्रकार लोक का भ्रसाघारण केल्या करता हुभ्रा भी साघक 
भ्रात्म-कल्याण करनेवाला ही कहुलाता है । लोकत कत्याण का यह्‌ 
उच्चतम ्रादलं है, ग्रनरुठो कला है 1 


कई लोग कहा करते है कि साधुत्व को श्वद्धीकार करना एक प्रकार 
` कौ पलायन वृत्ति है, अपने सामूहिक कर्तव्यो के परित्याग की स्वक्ृति 
है या अपने व्यक्तित्व की परिधि को ्रधिक से श्रधिकं सिकोड कर्‌ श्रपने 
तके ही सीमित करनलेना है) एेसा कह्ने वाले सज्जनो ने साधुता कौ 
महानू मर्यादा को सहूदयता के साथ समभने का कभी प्रयत्न ही नही 
कथाह सत्य इससे एकदम विपरीत है । साधुता पलायनवृक्ति नही, 
परात्मा के शादत शचरुग्नो पर्‌ प्रात्यन्तिकं विजय प्राप्ति का तुमुल संघषं है । 
न उसमे सामूहिक कर्तव्यो का संन्यास है, न व्यवितत्वर का सद्धोचीकरण 
है, वत्कि एक परिवार, समाज भ्रथवा रा त्क मर्यादित ्रहम्‌' या 
प्रातमोयत्ता को विद्वन्धापौ विराट्‌ स्वरूप प्रदान करना है । साधु किसी 
एक जाति, समाज या रष्रका नही होता, वह्‌ सवका वन जाता दै। 
सद्धोणं हदय के लाग ही ेा करतेहै कि जो सवका है वह्‌ 
किसी कानहीहै। 


जव एकं व्यक्ति साघु जीवन स्वोकार करतार तव वहू किसी 


८४ ] - [ कार : एकः श्रनुचिन्तन 


सत्कमं का परित्याग सही करता, वत्कि श्रपने जीवने फी रिता को 
पुत्ति करता है । त्रयात्‌ गृहस्यावन्या मे जिन सत्कमों फो कर नही पाना 
थाया करतादहृभ्राभी एकस्तीमासे श्रगे नही वह पाताघा, उनकी 
परिपूर्णता के लिए प्रयास करतादै। एसी स्वितिमे साघु जीवन पर 
किये जाने वाले श्राकषेपोके तिए कटी कोर त्रवकाश दौ नही दै) 

मानवजात्ति मेंजो प्रजम्तं रौर म्पृहुणौय वृत्तिर्या विद्यमान? 
उनका अ्रधिकाडया श्रय समय-ममय पर वुधा फो पावन कग्ने यि संत 
ज्नाकोहीरै। वही चिरकाल मे मानव-श्रात्मा कोदेवत्वकी मरिमा 
मे मंडिते करने कार्ययोग फरतेश्रारहैर्। अ्रतएवनवप्दोमे ऊन 
स्थान प्रदान किया गया दै। 


रणसो उवज्भायाणं 


रमो उवज्छायारसः--उपाव्याय धरयेष्टी फो नमस्कार हो। 
उपाध्याय चद मुनीन्द्र कहलाते है जिन्न गुरुके नरसा-गरणाम्‌ ण्ह फर 
श्रागमो का गम्भीर भ्रघ्ययन कियाद, जो गव्दायं म पार्त रोते, 
संघमें ग्रध्ययन-ग्रध्यापन का उत्तरद्ायित्य वटून फरतेदैश्रोर विया 
को परम्परा को चानू र्गते । उपात्याय परमेष्टी ग्यारट्णं श्रु 
यरास्यरो श्रनौर चौदह पूरवंगतत श्रत के घात्ताहोते षर अरत जिस कात 
मे जितना श्रतत भाग उपतन्यटो उसके स्तग्परतीं यत्ता सतै ¢ । 


~ ~~~ ~~~ ~~ 
+~ 


 श्राचार, मूधरृत्श्राि द्रद्धपास्य कलानि रं) 


¶ दृटिवाद नामक चान्त्वंश्रद्र र पालि निका नेमे एकः विभात 
पूर्वगत धमन दै। उमे ब्योदरञ्पय विमागद नोद्य मम 


भ प्रिद 8। 


ओकार : एक अनुचिन्तन | [ ८५ 


उपाध्याय भी सामान्यतः साधुरही होते दै, तथापि उनका पृथक्‌ 
निदे करने का कारण उनके उत्तरदायित्व एवं कर्ठव्य की विगिष्टता 
है । पूर्वकाल मे श्रत लिपिवद्ध नही क्रिया गयाथा॥ श्रूति परम्परा 
सेही वह चलताथा। गुरु श्रपने शिप्यको प्नौर पिप्य श्रपने शिष्य 
छो मौखिक सूपसे ही अ्रागम पढ़ता था । इख प्रकार भ्रागम 
प्रविचि प्रवाह को प्रचलित रखना कोई साधारण काये नही 
था। इसी उटद्य से साधुसंघ मे उपाध्याय पद कौ पृथक्‌ व्यवस्था कौ 
गई थी! शास्त्र जव लिपिवद्धरहोने लगे तव भी उपाध्यायपद का 
वैरिष्ट्य ब्रक्षुण्ण रहा ¦ श्राघुनिक काल मे यदपि धास् मुद्रित श्रौर 
अनूदित होने लगे है तथापि उनके विशेषज्ञ के रूपमे उपाध्यायो कौ 
उपयोगिता फम नही है । 
शास्त्र मे उपाष्याय के पच्चीसर गुणो का उल्लेख मिलता है । उसे 
हादश श्रद्धो का वेत्ता, चरण-करण निष्णात, श्राठ प्रकारसे प्रभावना 
करके धर्म-शासन की महिमा बृद्धि केसतेवाला प्रौर मन, वचन एवं काय 
के अप्रशस्त व्यापारो का निग्राहुक हौना चाहिए । 
* इस प्रकार परमागम एवं तत्त्व विद्या को रिक्षा देने कालि, न्नानकी 


चिरागत ज्योति को जाज्वल्यमान रखते वाले उपाध्याय परमेष्ठ को 
यहां छठा स्थान दिया गया है । 


रमो श्रायरिधाणं 


र 
रमो श्रायरियारं श्राचार्यो को नमस्कार हो । 
श्रमणसंघ मे श्राचार्य का वही स्थान हैजो सेना मे सेनापति का 
होता है । वह संघ के नेता होते है । ज्ञान, दशन, चारित्र, तप श्रौर 
वीर्याचार नामक पाच श्राचारो का वे स्वयं पालन करत श्रौर दूसरोसे 
पालन करवाते है । 


साधु श्रौर्‌ उपाघ्यायके योग्य पूवोक्त गुणतो श्राचायं मे होतेदी 


[ 
# 


# 


| [ ग्रोकार: एकं यनुनिन्ननं 


टै, उनके ्रतिरिक्त भौ घनेक वियेपतर्ये होती है 1 श्राचायं फो प्रा 
सम्पदायें श्रौर छत्तीस गुरा प्रसिद्र ह । श्राठ मम्पदा्ये टन भाति ४।* 

१. प्राचार सम्पदा-~महात्रत, समिति, गुप्ति, स्य प्रानारमे नगम 
होना, पांच ्राचारोंफाटृडृता ऊ नाय पानन करना, कठिन ये फषठिने 
प्रसंगो में भी उक्कृषट च्राचार्‌ सेन डिगना ध्रादि। 

२. ध्यत सम्पदा-ग्रपने तमय मे उपलव्य ममस्त श्रत वा परितं 
होना, स्वनमय के नाय परसमयमे भी पारंगत होना, धरणे युगे २ 
विद्वानों मे मूर्वन्य होना, उत्सर्गे मार्गे का परिकपुट विपरिक होना श्राि। 

३, दारीर्‌ सम्पदा-प्रभाव्ालो एवं तेजस्वी परर फा धारे 
होना, प्रंघत्व वधिरत्व श्रादि चरुटियोकान होना) 

४, वचन सेम्पदा-वाणी मे माधुयं हो, हितकारिता र, जिभे भूम 
कर प्रतिपक्षो भी प्रभावित्त, चकित नीर प्रानन्वित ्टी्। मुम 
वचन निकलें जैसे चन्द्रमा से प्रमृत करता दो । याणी सार्पक, परिमित 
श्रौर प्रिय दहो) 

५. याचना सम्पदा-यान्तरो कै पठन-पाठन कै विपयम श्रमाघार्गा 
कौणल दोना, दिष्य को प्राच्ता प्रौर योग्यत्ताफो समनः कर सदनुस्प 
ही उसे नामृतं फा पान कसना । 

६. मति सम्पदा-घातर दिया दर्णक हेति द । उनमे प्रत्यक सिश्नायु 
या प्रतिवादी के प्रत्येक प्रदनफा सीधा उत्तर सह निता रता। 
उ्तेषाने के लिष्‌बुद्धि-परिमा चाहिये । दमी पिधिष्टप्रतिमाद्री मदि 
सम्पदा द । श्राचोयं मे असाधारण वृद्धिमव चादि) 

७. प्रयोम मम्पदा-पिजिमीयः मे श्राप ्ानमिन याध ए यपं 


ने 9 {ट ६ ध 9, त 1 
फो घान्त करदेन दी विति क्षम्ला प्रपोमे सम्पदा ^) 


4 ९ 


+~ ^~ -~+~ 





° दधाथ ततम्नर्व, दता, प म्पानाद्व < दव्य 


श्रोकार : एक अ्रनुचिन्तन | { ८७ 


८, संग्रह सम्पदा-- पहले कहा जा उका टै कि श्राचायं संघ के 
नायक रेते ह ! नायक्त यास्क होता है श्नौर दारक के नति उन धर 
सम्पूणं संव के योग-छोम का उत्तरदायित्व रहता ह। । संघे मूनियोको 
कोई श्रतावश्यक एवं अनुचित कष्ट न हो भ्रौ उनको सेयमाराघनामे 
विघ्न उद्र न हो, रेसी दूरदष्ता प्राचायंमे होनी चाहिष्‌ 1 मभूत 
एवे वैराग्यवान्‌ निप्यो का सग्रह करना, उनके लिए प्राचदयक उपकरग 
की व्यवस्था करना, समुचित मृख-सृविधा उत्पप्त कर्‌ देना नंग्रह- 
सम्पदा मे परिगणित है। 

कोको इन श्राठ सम्प्रदाग्नो के चार-चार भेद कनके श्रौर्‌ उनम 
चार प्रकारके विनयो की गणाना करके ३६ गुणो की पुत्ति करते 1 
किरी के पत्त से १२ तप, १० यत्तिचमे, ५ भचार, ३ गति ग्रौर्‌ ६ 
भ्रावदयक मिलकर ३६ गुण होते ई! कही-कही इन गुणो मे ४ महाचतों 
५ श्राचारो, ५ समित्तियो, ३ गु्तियो, ५ इन्द्रियो के दमन, £ ब्रह्मचर्यं 
गुक्तियो तथा ४ कषायो के परित्याग को गणना की मई द । फटी जाति- 
सम्प्नता भादि गुण इनमे परिगरित किए गए) 

गुणो के नामनिर्देश मे शाच्दिक श्रन्तर होने पर भी कौर वास्तविकं 
भ्रन्तर नदी है । पूर्वोक्त गुणो का स्वरूप इतना विस्तृत द कि उनमे 
एक दूसरे का श्रनायास ही समावेश किया जा सक्ता ह 1 

तात्पयं यह्‌ दै कि संघ के नेदा आचाय का वाद्य भ्रौर श्रान्तरिक 
व्यक्तित्व प्रमावजाली होना चाहिए 1 उनको प्रत्येक क्निया श्राद्ं हौ, 
उका ज्ञाने भण्डार श्रक्षय दहो, प्रतिमा अ्रनुपम हो, मघ का उत्कर्षं 

हृत ग्रशो मे ्राचायं कौ सूकचूभः पर निर्भर रहता है । 


नमो श्ररिहुतणं 


रमो श्ररिहताणं-भ्रप्टिन्त भगवान्‌ को नमस्कार हो 1 
श्रचिदन्त का सीधा-सादा अथं है-ञनुग्रो का हनन करने वाला। 


व [ ओक्रार : एक पनृभिन्दमं 


किन्तु श्रव्यात्म यास््रमें शरदि" काब्रयं भित है। वहा निनी ऽ, 
समूह्‌ या राट्‌ श्रादिको श्रि नही माना जाता! ग्रन्यार्मयैसा बहति 
से किसी तथ्य पर विचार नही करते । उनकी दृष्टि अन्तर्म 
ततटस्पथिनो होती है । उनका लषय अ्रमोध होत्रा) 

वास्तवमे शत्रु वहीहजो श्रातमिकं हित का विधात फर्तारै, 
जिसकं कारणं ब्रात्मा श्रपने सचिदानन्दमय स्वस्पस्ते व्यत हो रहार 
जिसे ्रात्मा को उसके अ्रनन्त-प्रसीम नखगिक वैभव से वनित फर 
रक्खादटै। इस ह्प्टिकोणसमे विचार करने पर श्रात्मा कै भराय ददं 
कमं प्रवाह ही उसका भ्रस्ली शत्रु है) स्वभावसे प्रात्मा सर्व॑या निपि- 
कार, निष्कलंक, चिन्मय, श्रानन्दमय, परमज्योतिम्वस्ण तथा पनन्य 
वीयंमय है । किन्तु कर्मावर्णो ने उसके इस स्वस्य को श्रता एर 
दिधादहै। महापुरूपो कं महामागं का ग्रव्रलम्वन करये उन धारणो 
को क्षीण एवं विनष्ट करने कायो पुरवार्थकिया जति द, बहौ मानाः 
साधनाकास्मरण्यो-ज्यो डवाउ्टता यातारै, प्राचरयासितिति ताते जति 
ह श्रौर उसी भ्रनुपात्तमे श्रात्माफा सहज दुद रवस्प प्रफार्यित शो यागा 

जन वास्मोमे श्रात्माके विकारा द्रम को श्रत टयग्राही, एम 
एवं त्फ॑संगत सागोपाग वरन उपतन्ध हता द । 

प्राता के ज्ञान, ददन, नुग श्रौर्‌ वीयं गुणो कल व्रिघान कन्न सासि 
कर्म समूत नष्ट टो जति है, तव श्राह्मा तागीरग्य श्दन्यामे ल निमनधा 
रातत करक सर्वनाता, सर्तर्मी, परणं कीतियग धौर प्रनस्त सिमप 


प्र ^ [8 
सवन्प्रः 4411 प्रद्धि ट | 1 १ । ४4६ ग ग्ग 
# 
॥ 


धरमाल्मा वमे शतादै |ॐ जं 
परमात्मा भ्प्रदिरन्तः करन्नै है गयि रवि क्य यिद्ध भ 
नही प्रानो मिव व्किल्टिनग दा उक्ति द । 

यटी श्ररिटृदा परमा्मा मकि के मामं ती प्न्य नव > । द 


न 


| 


श श्रान्त 


से ्र्ानायृतत उनन्‌ फे यीवोका दानमे (मिति दयो प्रान्‌ त 


„ 
श्रपुवदे हुम्‌ श्रारस्वषट। 


व 


किकी 
(, 
८ 


ओंक्षार : एक अरनुचिन्तन | 


एसोसिद्धाणं 

समो सिद्धाणंः--निद् भगवन्तो को तमन्परार्‌ {1 ॥ 

साधना का चरम लक्ष्य सिदध पदको प्रामि त ५ ८.6 
ने षर माघ्यास्मिक विकास परसरं टो जनाद 1 नमन्त दरीपापिवः 
मावो को निवृत्ति हो जनि से चापमा का चु महुते न्यमप 
प्रकड हो जातादै। 

ध्ररिहन्त वस्या मे घाति वमो के धयो दानमे श्रनम्त शाना 
गुण प्रकट हौ जति ह, फिरभो भगोपय्रारी, चार धपानि कर्मं पिष 
रहते ई, जिनमे श्रायु कमं मो सम्मिसितं £1 घ्यामु फम्‌ प्रो नमानि द्रप 
सन्निकट होती है तो ब्रिटन्त भगवान्‌ उच्चषठोटि के ध्यान पम प्रपन्नं 
करके बोघ्रही शेपक्मोकोक्षीरकरदेतेरे प्रौर विदेद्‌ दया प्रात 
करके सिद्धत्व प्राप्त फर तेते ६ । 

मृक्तं दद्याम सूक्ष्म वा ्यूल कोई परर नही रह्‌ उता, प्रतप्य 
ग्रात्मा का श्रगुर लचुत्व गुण व्यक्तहौ जतताटहै1 -उनकफा ऊप्नेममनं 
स्वभाव भी,जोकर्मोके श्राचस्णोते वितो र्या, प्रघ मे 
भ्राजाता है) अ्रत्तएव मुक्त होते ही श्रात्मा ऊर्वगति कर्ये सोक फे 
ऊर्घ्वं माग तक, एके ही समय मे, जा पर्चा दै 1 

जैसे जल मतस्य को, श्रौर लोह कौ पातत रेलगाटी फी रति मे सहाप 
होता है, उसी प्रकार धर्मास्तिकाय नामक एक श्रमूरत द्रव्य जीव रौर 
पुद्गल को गति मे सहायक होता दै! जरह तक धर्मास्तिकाय विद्यमान 
है, वहा तक का भ्राकाड-माग लोकाकाद कहलाता ह । उसके श्रागे का 
भका ्रयोकाकाश के नाम से प्रसिद्ध है] ऊर्वगामी सिद्धात्मा, जद 
तके धर्मास्तिकाय का सदूमाव है, वरावर गति करता है । धर्मास्तिकाय 
कौ श्रविद्यमानता में उसकी सत्ति प्रतिहत हो जाती है ।*६ 


91 





# श्रलोए्‌ पडहया सिद्धा, लोसरगे य॒ पद दुय 1 
इट्‌ वोदि चर्ताणं, तत्थ गंतूण सिज्छद ॥ श्रीपपात्तिक सूत्र 


०५, 
६० 1 [ श्राकार * एम प 10 न प॑ 


सिद्धिपदके व्रिपयमे क्डागणद्र किव पद्‌ धित प्राप्‌ गर 
प्रकार के उपत्रवासे रदित, ग्रचन, श्रन्य-यमन्न व्याननिमेये 
मनन्त, अदय, प्रच्यावाध श्रीर्‌ पूनरागमनते ग्हितद्ै। मिदर भगवन 
सदाकाल के लिए इस प्रकार कै परमोत्तम पदको प्रात्र करसन 


द ०५ 


सिद्ध भगवान्‌ मे निम्नाकिति जाठ प्रधान गुण हप ६- 

१---प्रनन्त सान 

२--ग्रनन्त द्णंन 

३-अन्यायाघता 

४--ग्रगुरुलनु्व 

भ -- प्रमूर्द्ि 

६--श्रनन्त वीर्यं 

७ --ग्रक्षय स्थित्ति 

८--श्रनन्त चारप 

सिदडधकास्वर्प वरतुतः शुद्ध ग्रात्मा का स्वम्प। उ दषग्ष 
का वर्शन करम मे व्य, चिन्तन करमेमे मसि, प्रीर्‌ विन्प रनम 
त्य सम्थंनटी है वड ज्ञानी भी उम यननिवंननीप, श्रि 
श्रीर्‌ श्रतक्यं स्वर को कटने मे श्रमना श्रसामर्ध्यं पोधिन वरे मेषी 
पना गौरव मानते ६ 1 


भारतीय संस्छति मे : भुक्ति 
प्रत्येक प्रात्मवादी भाग्तिकः दर्म पे मेमं 


(न+ $ कन {~ "रकन ११ न 24 11 
उपस्थित स्ह) वट यदिद प्रानिर श्रम कते चलम परिम 
ष्य ५ ॥ 

# 

| 


[4 प्रग >+ श्रुः # 1 प्म म स्य य टु ७ 
स्याह? जनम मर्गा विषय यदम पमा गन्ना प्यर्‌ श्नर्ः 


६ : 


प 
दयत चम मृ न्ये द आ्न्पि। 


तिद 91 > ~~ 
= मव्वेमसा निवनि, तक्यम्‌ विनः, 
--श्ानानम 7 र श्र, ५2, ९, 


८ है 
मरकार : एक प्रनुचिन्तन | ६ 


[न क 3 र ८ ४ 

क्तत से लेकर अनन्त काच तंक एधग-उ्धर्‌ भद्रा हा सः भन । 
1 ७, ॐ, 
५4 4 भनक ४. +> ® ~+ ४ 
(~ ॐ? सभी दात्तनिके सम्म-पन्ण्यय 4.4 ४4 - 

ग धा ? सभी दाततानकेः सम्म ध 
निसं का विधान हैं 


शरर दुःख भ्राता कास्वल्पनरीटतात्यापुन क 


1 


= सद्गने प्राग्‌ भिद चमप, + 
सकतीरैकिग्रासाकोष्नदु.यने टना {६९ & 

या मूट्ता यदि श्रात्मा कौ पाश्रत नरवन नरो ^ पः 1 रई 
का स्वक्प है तो वरह प्रः चेतना, निमि प्रदाने 1 २ 
का प्रभिन्न स्वस्पहै त) वह्‌ धुः चेतना, 1> 


से, कभो उसे नसीव होती ६? 


स्वर से स्वीकार करते ६ फिबलात्माकौ एन प्रन्निमि निप, 
मुक्ति, मोक्ष या निर्वाण फलते है । मृक्तरमे पर्‌ पनरष 
भ्रमराके दु-खवेद्टकारादाजताटै। चन्तं युगः 
किम स्थितिमे रहता रौर वट्‌ दधा ताथतिरै परवद मष, ६४ 
विषय मे विभिन्न दर्णनघा्री एकमत नही है । 


वौदढधदनन श्रात्मा की स्वतन्र सत्ता ये न्वीवर न; 
चाकि की भाति पृनर्जन्म, यन्य श्रौर मोक्ष फा निधं २९) 


८१ रेयु + 
उसकी मान्यता के श्रनुसार विद्व के श्रन्यान्य पयायो फो मेहन वितत पभय 


भी स्वमावत्तः विनादायील है, उनका प्रवाट~नन्तान निरन्यः नात म्ण्ा 
है । पूरववत्ती चित्तक्षण से उत्तरवर्ता चित्तप्षण फो उत्पत्ति लनो र्ध) 
है। मरणकाल मे जो चरमसमयवर्ती वित्तक्षमा दत्ता ४ 
जन्म के प्रम चित्तक्षण॒ उत्पद्च होता ई श्नौर दम प्रनार जनम-वन्मान्वर 
की धारा प्रवाहित होती रहती । रस घाराफाजन्तश्रा जाना धर्पान्‌ 
चित्तसन्तति का निरोघ हो जाना ही मृक्तिरै। 


योड से विचारसे ही यह्‌ तथ्य सामने श्रा जाता ६ कि वीदढसम्मत 
इस गृक्तिमे खोना हौ खोना है, पाना कुद नही है। श्रपने धापको 
भ्रनन्त दृन्य मे विलीन कर देना है 1 यह्‌ किसी को स्पृहणीय प्रतीत्त नही 
हो सकता 1 वास्तव ये एेसी मुक्ति लाभ कानही,घटेकाटी सौदा है। 


¢ ०. ष (५ 
९१ ॥ [ श्र्र्‌ः एड शर 
४ 
~ 9 [न {= द नम्य न्घ क ८ „~ ८ 
च्दक प्रम्पसयकंः मुप्लकं सम्वन्धमे एकमत रलो मरक. 


4 
[न [व्‌ ५ 


देन > प्रगोता क्णादकौी मृक्तिकास्वस्पभी नृन्धुदैनातै ^] स 
ग्रान श्रानन्दहोदेते गरणडहजो भ्रात्माषो जट पायो से पयः कर 
ह) यही त्रात्माका श्रनाघार्ण मौर सवोत्तिम वभेद । दियत दभ्र 
निहो मया, नृट गया तौ समभना चादधिये निः चात्मामा यनेन ६ 
गया । उकं पान अपना कृष्टी रेप नही न्ह 1 पिर जलय 
ग्रात्मा मँ वदिष्य नही र्हजता। क्िन्तुक्खाद एेनीरी मृति द 
प्रतिपादने कन्तेष्धै। वरे मक्तिमे श्राप्माकाप्ननिन्रयसो स्वीकार एर 
मगर जान श्रौर श्रारन्दे मे उसका सर्वथा वंचित रौ जाना माने 
उनके कथनानुसार मवत दामे "युद प्रात्मा गहु जला टै ओर लद 
काश्रर्थंहू वृद्धि मुख भ्रादि समस्त वियिष्ट गुणो षा प्रभाय सानी। 


निस ज्ानमे विन्नमया पिप्रयास या ्रपृग्पता है, पट श्ौवादिक्‌ >॥ 
जो श्रानन्द रद्धियी के माध्यम सै श्रनुभूतिम प्राता प्रीर्‌ दम सारं 
जो पराचधित्त है, वर श्रात्मा का स्य्मावं मरौ 2} निसवग्या प्रौरे 
निरापघिके यवस्यामे टन विनायो का श्रन्तरो जानातोम्नामापिष, 
किन्तु युद संवित्‌ श्ररप्रान्मानन्दकफाजी श्न मानना तो प्रत्रा 
सेग्रात्माकारही विनाद्य मानना । एसे मूनिति काश्रनर प्रापाम 
पापागानंद फे महद उदु दना नेना। 


कतिपय दिकः वि म्तात्मा द मनने ता गम्या को सण 


नी क्रते । उरषफा नप च्छ; ह 
01 क & चः 


ड >~, 9; = 2) 
र उनम भी मम्यय पष्प मन्‌ = | दन्दर्ात्ति 


(1 


4 


प्रौग प्रसीन पटा, देन्य दूरयर 
न 


क कनक ४) क ^ ग ४ 
स्मा श्रादि एन्ियमानर गष ट 


ओकार : एक अनुनिन्तन | 


दु कः कक (त भैक कक ५251 कन + ४ = ॥ * 
ह श व 1 ५ | | ॥ | 4 ~ [त | द 
॥ > 4 ॐ भे 
प्रकार विकि स्ना? समममनय द) द 
नित्व श्रौर्‌ श्रपौर्मेय माना स । £ ३ | 
प्रसत प्रन का नम्दग्ध दनद मै 


् ३ २१५ भि 2 “^ [1 2] ६ 
~ पामा ग श्ल, १, [ त 
इस विषय को मोमांना 2 १. 1 


१ 


च 7 । ह) १ ‰ ~ ड, ~ ५ भ्‌ 
विषयमे हौ विचार फमना ई पौर दृण्यय +! 


प्य १५७ 4 १ >^ ~+ ~ 3 
मेक्यास्ितिहानोरै? प्रमेये 


् 1) 1 ४ 
४८ क ७ = 14 ५०१ 2 १ 
[3 ५ श्र (+ ५४ € म | 
सर्वता २१६ 1 
वर्नतां कं पलत श्र श्राह 


१ - [ = क ~ ० ~न. । 9 । 
भी प्रधिक चिन्तनं किप गम 1 (जर ५} ~ 


[ 


सवंरम्मत निरय प्र नही पय स्मे 1 


चै 


१ 
लन यमे एकतवं, यो नमम मेद ०, ६ 


+ 


3 ( 4 9 
म द्दूूत होता है। घ्राता न्वभायमः; {भ अ 


५ ड ५ र 
६ क त 
=, 1 ~ ५ श ध 
वि्चानधन श्रौर चिदानन्मये न्दतः क ^ न ज 
1 नु (` ६ {< 2 ॐ 
भन शौर मिष्वात्द है, वट पोप र, ५1५५ ई { 


मुक्तं श्रवस्या मे यदि धमन्त प्रोप{न ० + ४ 


नौ । त. 
१६१५५ = 11 ८ ‰» + र 0 
५, न, ¢ ० = न [व ह ठ 
जाती ] है ता भ्रात य क शृ ॥ नद न्प टर ॥1 1 {1 4. ी +» हं 1 &,* £ 1; > : 


भर सतय हो जाने पर पुरां ्ानमयर म्प्र व 
देसाक्नहोजो वियु टै प्रात्‌ लिनः मय श्र ह + 
पकता करदलात्ता ६ ! कृकनदया मे यतत्र अम 


प्रकार श्रनिवायं जो जाता दै 1 


गृक्तदना समन्ते प्रावरणा दा परव्यनिष ष्य मेप क त 
होतो है, प्रतएव वह्‌ गाश्वत ही होन च्ट्पि 1 हकार द्यत 


१९५ 


ज १८ 


॥ 


२4 ४ 
१२१९ ++ + व 


1 


भनक है शरोर जव पूगां निषिकार स्थि 


॥1 


रत्नि पिमः पार दद्र {१ ५११ 4 ॐ 
तो विकार का अ्रहेतुके उद्भवे भंभय नही टै एम प्ररि ४९१८ द, 
पर्याय या पागवजोकन के 


नमान मूर्तपयायभौ जन्पपमनोनपन नौ ६.१ 
गहत नही रह्‌ जाता निस 


नाय । श्रतएव ्रवततारवाद षो 


मुत्ति का कोई म तिय मापनाय | दर 
भरायोजन क्रिया 


। प्रस्वरपना न एना 


^ 


स [ ओ्रोऊार्‌ : क प्रमृनिननं 


॥ 
्रवतरित दाकर जन्म जरा-मरगाकी पीदठाकी परिधि मेन ग्रानावरत ) 
ग्रीपपातिक नूवमे मुक्तात्माप्नो का वरन गव्य नुन्धग्यः ४ 
साध किया गयाटै। उसका सार यहां प्रद्धत्त कर देना सवय 
ही दोसा । 
भवसे मक्त होते समय~चरम शरोरका परित्याग कमते म्य 
दरीरकीजो त्राति हीत है, मुक्तामा उनी आकतिमे मदा मवत 
रहते ६1 अन्तर केवलव्तनाही पड़ताह कि मुक्तन ष 
श्रवगाहना का तीसरा भागक्मटहो जाता 1१ 


[| 
छ 
~ 
(न 
शिः 
र 
= 
ए 


सपना मी 


सिद्ध जीवोंको पृयकप्रथक स्यान कयै श्राग्दयदना नरह 
्तहोनेके कारण जर्हएफघिद्ररह वहा नन सिद रटतैरै।२ 
सिद्ध जीव श्रगरीर होते द, श्रतएव सशरीर प्रयस्धामे शमर 


कारण श्रात्म-प्रदणोमे गो पोदठापन रहना, पट्‌ उर श्रयन्यामे मषी 


५ 4 ् (7 = न 17 - ॥ १ >> [६ 
नहता 1 चे केवल जान-दर्शनमे सदा उषगु्छस्टनेदे) मं पदक 
वर्ती भावो कोकैयल अनस जानने द ग्रीर पेयलेदयन रै दगने 1 


पूर्णा ल्पने प्रव्यावाप्च को प्रात मुक्त्या मो ठा श्नु 


परान्मानन्द प्रात्र रहता ठे, वदनन मनुष्यो कोपाद न गनो 





१ दीवा र्मया विममे हस्त ग्र 


ग निपतोमासा भश्पियि। 


तत्ता दिनागोणं, 


२ ऊन्यव मो निटोनत्य श्रस्पनामेवररयदिनुषत 1 
सष्ोपमनवयादा, पटा मन्ये वि नाना । 
३ द्रमनोगा मीयदमा वगन्वदृग्ेयं गणेय । 
सामग्मन्दादाम मदण्गपमं दु द्ददः ॥ 


ग्रोकार : एक ्रनुचिन्तन | [ ६५ 


वासी देवोको ही । ।सद्धिसुख को तुलना मे स्वगं का सुख किसी भिनती 
मे तहीहै। देवो को जितना सुखद उसे यदि भ्रुत भविष्यत्‌ श्रौर 
वर्तमान काल के समयो से गुणित कर दिया जाय श्रौर उसके शअरनन्त 
वगं किए जाएंतो भी वह्‌ मृक्तिसूख की समानता नही कर सकता ।४ 


भाषाविपयक कौराल से श्रद्ूता कोई म्लेच्छ मनुष्य किसी भ्रत्यन्त 
सुन्दर नगर के अद्भूत सौन्दयं का श्रनुभव करके भी उसका यथा तथ्य 
वणन नही कर सकता, उसी प्रकार मुक्तिसुख का वंन शब्दो द्वारा 
नही किया जा सकत।। उसके वणन के लिए कोई सत्‌ उपमा नही है। 
हा, भ्रसत्‌ उपमा का श्राश्रय लेकर कहा जा सकता है-जैसे कोई 
वहत दिनो का भूखा-प्यासा “सवं कामगरितः आ्रआाहार करके भरख-प्यास 
से छुटकारा पाकर भ्रमृत से तृप्त हृ्रा सा श्रनुभव करता है, उसी प्रकार 
प्रतुल भ्रव्यावाध श्रौर॒लाङ्वतु सुखमय अवस्था मे मुक्तात्मा विराजमानं 
रहते है 1५ 

मुक्तात्मा समस्त दु.खोसेपारहो चुके है, जन्मजरा मरण श्रौर 
वन्धन से विमुक्त ह तथा शाश्वत सुख क! ्रनुभव करते है ।६ 


४ णवि अत्थि माणुसाणं, तं सोक्खं एवि य ॒सव्वदेवाण । 
जं सिद्धाणं सोक्खं, भ्रव्वावाहुं उवगयाणं । 
जं देवां सोक्ं, सन्वद्धापिडियं ्रणंतगुणं । 
णय पावई मु त्तसुहं, णंताहि वग्ग बग्ग । 

५ जइ णाम कोई भिच्छो नगरगुरणे बहुविहे वियाणतो । 
न चएइ परिक डं, उवसाएं तहि श्रसंतीए } 
जह सव्वकामगशियं, पुरिसो मोत्त.ण भायरं कोड । 
तण्हा च्ृहाविमुक्को, भ्रच्छैज्ज जहा श्रमियत्तित्तो 

६ तित्थिण्ण सन्वदुक्खा, जादइजरामरण वन्धणाविमूक्का । 
भ्रव्वावाहूं सुक्खं, अ्रणुहोति सासय सिद्धा 1 

--ग्रौपपातिक सूत्र, सिद्धप्रकरण। 


६९ | [ भ्रोकार : एक अनुयिन्नन 

मुक्तिक स्वरस्पमे जित प्रकार्‌ मतविभिन्रठा देलौ जक्ष 2, -दनो 
प्रकार उकं कारणाकेसंवंपमे मी) उसका त्तेन यान्या 
जाचकाह। हम वन्लाश्रयेहैकि मुक्ति उमे परम प्रर उमम श्येय 
कौप्रात्नि स्म्यक्‌ शवद्धान, सम्यक्‌ जान, श्नौर्‌ चम्यर्‌ चारिपि दे न 
संभेव नही है) 

जो सोग श्रक्रसे ज्ञान से मुक्त कौ कल्पना करते ह. सन्ये उधर 
देते हुए ग्रौर चारित्र का महत्व प्रदनितत करते हए महान्‌ श्राना्यं भी 
वाहन कटा दै--समप्रभ्र्‌तज्ञानका पत चारिहु श्रौर चारिक 
फते निर्वाण है } 

नर्यामक (मललाह) कितना ही कुल व्योनरो, रनु पयनरे 

विना वशिन्‌ को उसके श्रमोष्ट लदय परनही प्टुचा साता---परारफष 
के किनारेनदहीलेजा सक्ता, इसी प्रकार कोरा जान, चास्मिग्प 
प्रनुदूल पवन के अभाव के प्रात्म-पोत को संमस्सिगर मे पार्‌ की 
उतार सकता 1 जानगविप्ठ यह्‌ सोचतेदहैकिटम ्ानरेदटी मद्रे पार्‌ 
लम जार्येगे, वे भ्रमर रौर नारे कै निकट पहन कर मात्रे 
श्रभाव मे पूनः मुसार-सागरमे ~व जति 

जिसने अगस्त्य कौ माति श्रतन्वारिधि का पान कर दिया, प्रमण्ड 
ाण्ठित्य प्राति कर्‌ नियादटै, किन्नु उत प्रानरसानत नेरी पिपा, उनके 
ल्य वह श्रगाव आनभी उमी प्रान चिरत है यय ऋ के श्रपि दण 
गवे लासो करोड दीप ॥१ 


०७० नमन 
ॐ सामाटयमायं मृयनागं याय विद्मा 
तस्यति साग नरा, मारो नरगएम्म िल्पोग 


(प 23" 


१।१६२८६।। 
जट दमसरनिखापग्रो<वि यानिसयदरि य भूमिं । 
दाठ्मा निरणा पाप्नानं नद मदपय नरि ११६५ 


। भिव ज 
तट्‌ नागायटनि्ामङ्नो दवि नि्दिविम दने पाम 


निरणालवि नोवषोप्रो, एवमयम-प्राग्य्यी (११२६४ 


५ 


; ई; ५३) ~ जु भक {ॐ 44 
॥ 1 भम ४; प रि रर 1 १ 
र न 
कन्म यः दमिता दीपनयमयम्मङदा दि ११११५४० श्रय, पि 1४ 


प्रोकार : एकं अनुचिन्तन |] | ६७ 


इस प्रकार पर्वे हुए साधक ज्ञान ओर क्रिया से समुचित समन्वय 
प्रभार देते! उनका कथन है किज्ञान हीन द्विया जे निरथंक है, 
क्रियाहीन ज्ञान भी उसो प्रकार व्यर्यंहै। इस भाद को व्यत्त करमेके 
लिये जैनागमो मे एक वडा युन्दर स्पक प्राया रै । 

एक विशाल वन मे दावानल सुलग उठा । दुर्भाग्य से दो व्यक्ति 
एक भ्रंधा श्रौर एक पंगु उमे फेस गये। श्रंघा मनुष्य दावानल की 
चपेटमेश्राने से वचने के लिये भागा। किन्तु उसे ज्ञात नही था कि 
क्रिस श्रोर भागने से प्राणरस्ना होगौ ? विनाजाने ही वह माग खड़ा 
हेमा । परिणाम यह हरा कि उसको दौड दावानल की श्रोरदही हुई मौर 
वहु उसमे भस्म हो गया। 

यही दशया ज्ञानहीन क्रियावान्‌ की श्रौर क्रियाहीन ज्ञानवान्‌ की 
होती है । 

एक्‌ दूसरे अंधे श्रौर पंगु के समक्ष भी यही परिस्थिति उत्पन्न हुई । 
उन्होने परस्पर समश्ौता किया! दोनो मे समन्वय स्थापित हृप्रा। 
भ्रषेने पगु को श्रपने कंधे पर विढलाया । पंगु पथ प्रदक्घि्त करने लमा 
श्नौर श्रघा चलने लगा ! पारस्परिकं सहयोग से दोनो की त्रुटि कौ पूत्ति 
हो गई श्रौर वे सकुदाल नगर मे जा पटु 1 

इसी प्रकार समन्वित ज्ञान प्रौर क्रियासे सिद्धि प्रसि कीज 
सकती है ।% 
राजनेतिक पंचक्ील 

प्राजके युग में श्रसाधारण श्रौर श्भरूतपुवं वैज्नानिक क्रान्ति हुई श्रौर 


# संजोगसिद्धी य फलं चर्यति, न ह एगचक्केण रहौ पयाइ । 
श्र॑षोयपंगरूय वरौ समेच्वा, ते संपरत्ता नर्द पचि 
--श्राच० निर्युक्ति, ११६५. 


६८ | [ मोका : एक्‌ परनुकिन्धन 


हो र्हीहै) व्जिान-तत्ताजोने यो न्वेष दिषु ₹, उनके एकदम 
म्रमिनवं समस्याट्‌ मान्वजातिके समक्षत्रा उपस्थि ट ४ मर 


के एते विकराल सावन निभित ५ क भूमंरत पै ् 
के मे विकराल नावन निमिते ९ ङि (प्दत्‌ क सवना 


के विनस स्वरगुजनेलनेदहै) रैक पारर्पर्कि नीगो्ित प्न्य 
समामे होए) ठेसेयुगमे प्रावण्वकदै कि विभिन्न दष्टो रै 
नायको का हाद ग्रन्तरभी ममाप्तहु जायओरौर एक गट हषर रिरे 
साय वन्धु-मावना, नहानृररूति एवं मंप्रीकास्यवदार कफर! द्र प्रकार 
के मुर सम्बन्याके विना विद्वकामासन्ही द 

स्स दृष्टिकोण सतप्रेरित होकर भारतके मरामन्य प्रवानिमी 
श्री जवाहरलाल नेहरू ने राजनीतिक "पैनयील कौ मोना प्रन्तुत्त मी 
श्रीर विष्व कै त्राण एवं कल्या के तिर व्रूतन मामं प्ररसित मिधादै 

इन पंचयील शिद्रान्तोकोञ्छके मत्य नागमे स्न प्रदान पिमा 
गया) प्रव्न क्यिजारकनादै वि श्रः्यात्म सावना मेके मे 
राजनीति घुनेनेकौ क्या प्रावद्वत्तलाथी ? मगर मूत महौ पाना 
चाहिये कि सौयन एक श्रनण्ट तस्यै जिमि समाज, पम, सर्य, सजनी 
श्रादिके विभिन्न द्टात्रो मे चिभक्त नरी ङिदा जा रकता । टम समी 
नीजाका व॑यक्तिकः श्रौर मामायिक जयन यम्‌ प्रभात पलना श्रनि 
वायं है। टतिदान टस तथ्य का मादौ 21 प्रलीन भी 
दान्ति श्रौर त्यस्य के ति गायन गान्ति श्रन्‌ सरणा 
श्रनियायं है 

श्री नेहूर दगया प्रतिमाद्ति पंचतोनये हुः 

१, मावभीमिक्मा का नमाम 
२. प्रनाश्मणर 
२. भरटन्स्षेप 


3 ~ 


८ पारस्मप्रि ट शर सपन 


ओकार : एक भ्ननुचिन्तनं ] [ € 


प्रथम शील सावंभोमिकता का समादर' का श्रयं है--प्रव्येक देश 
अपनी भरूमि रौर सावंभौमिकताके सराय दूसरो कीध्रूमि पर साव- 
मौमिकता क! उचित्त सम्मान करे। इससे आपसी विद्टष प्रौर कलह 
का निवारण होगा ्रौर मानवता शांति लाम करेगी । 


दूसरे शील "पारस्परीक अ्रनाक्रमण' कौ भावनासे श्रोतप्रोत होकर 
जव कोई देश दूसरे देश पर श्राक्रमण नही करेगा, प्रस्तुत समता, 
शाति ओरर वार््लापके द्वारा ही विवादो को सुलभाने का प्रयत्न 
करेगा तो किसी भी प्रकार की ब्रशाति की पिर उठनेका भ्रवसरहीं 
सही मिलेमा । 

"परहुस्तक्षेप' का श्रभिप्राय ह-एक दूसरे देश के आ्रान्तरिके मामलो 
मेर्टागनश्रडाए । सव को श्रपनी श्रपनी शासनपदढति श्रौर निर्धारित 
नीति मे किसी दूसरे दे की भ्रोर से वाघा न डाली जाय । 


चौथा शील (पारस्परिक सहयोग श्रौर समानता अत्यन्त मह्वपुणं 
है । उसमे मानवता की सेवा श्रौर मानव शाति को भावना तरगित 
होरहीषह। इस शीलमे यह बात निहित हैकि प्रत्येक देश, दरे देश 
की श्रपने ही समान सममे, उसके प्रति श्रात्मीयता कौ भावना से वत्तवि 
करे, श्रौर जो देश जिस क्षेत्र मे पिच्डाहुभ्ना हो, उसके उस क्षेमे 
विकाज करने मे सहयोग दिया जाय ! इस शील का प्रामाणिकता के 
साथ पालन किया जायतो देह कौ उन्नति के शिखर पर श्रार्ढ्‌ हो 
सकता है । इससे मानवता को एक नया जीवन मिलेगा भ्रौरं प्रत्येक 
देडा का निवासी श्ननुभव कर सकेगा किं मानव जाति एक ग्रौर भ्रखंड 
है, चाहे वह एलियामे हो, प्रुरोपमे हो याश्रमरीकामेहो। सवका 
भाग्य एक ही सूत्रमे वंधादहे) 

“जन्ति सहु-ग्रस्तित्व' पाचवा शील ह । इसका संक्षित ग्थं है- 
जीन्नो ओर जीने दो। सभी देशोका श्रपना श्रपना भ्रस्तित्व है श्नौर 
रदेगा 1 यदि हम समले कि प्रत्येक रष करो रहने का श्रधिकार ह 


[ऋ 


॥ इ) 


लि स्र क {83 + प्र 
१९ ०| प १९९ * ५. [4 ५" ६१ ग्र 


श्रीर्‌ य दर क 41 राष्ट । 
र एक रष दूररे का विगेमो नदी व्मुराष्टृषह, सो गदं शौ विमो. 


पका तया विष्वं कौ बाली घटाश्नोका दीघर ही अन्त श्रा सध 
रीर श्री छः द्य) स्वगं १1 १ 1 
र टरा मानव रोक मते तस्वगं सोय ग्रनेते दिल्तम््रम गः 1 श्रः 


= 
[व 


वपं विना के साधनो पर्‌ व्यय टोने वाला चरयो-सन्यो पौ शिव 
धनरादि विकास के सावनो मं प्रयुक्त ने सगेगी । 

पत प्रकार चिश्वषांति के निए पणीत फा सिद्रान्तं श्रम्येप 21 
वरटी है] 


श्रघोलोक 

सातनरको कास्पान प्रपोसोरमेटीट, श्रय प्र्माष््नपस्णं 
श्रो पदके श्रघोभागमे नरकभय फा उत्ते प्रागमिक मदी 

जो भद्र प्रसौ ॐ एत महामन्यरफी ध्राराण्रना कन्ताषटै, उमे 
सरक फीदान्णा याननाएेनही भोमनो पनी, प्रत्युत गदाम निप 
नारकीय यातनाग्रो मे मुक्तिभिन जत्रीह)। 

सन शास्मोमे नरक श्रृमियां सात मानी ग, निरे नमि प 
ठ" फे निचे भाव मे उत्ते पिया गवाद 

स्फपापीजीयाकेपावपते गोगनेगे ह, सो पोर पकारे 

अति-भानति पोरापोसे युक्त शरीर श्रतीय भगयुर > | एम श्याय मे 
यद्वने षाय उपाय ६--पचपरमष्यय म गृमन्यितु ग्व पतत्र म प्याणा्ना 
घ श्रोनान् मौ श्रागयम कृपं शपते प्रन्तरान्म ष दिति नैर गोदम्‌ 


फी सानविक चनात्‌ ट, उन्द सर्क फो दयि मतो जनन्य परता, 


गम प्रिपनीन यो मरु सिच्याय, शवर प्रमाद, वैप्रद आर 


शमम ॥ # ि 
= ~ "ड ग्म धत १४३ न 2, ॐ 2 स्‌]  ; ५ श-+, 
योम वै नमीनन हाप प्न्य के सपनम सर्द दानय वरव, 
ध ॥ 

~ र < र < ९५* #॥1 [क } 
उन सरक मे मपे कात्‌ तव विदि कग्मा दन्‌ 1 यला भल 

^ क ॥ कष 

= ध ् प 
दोरिति पजने सनित ात रररमा क मत मिष्या प्रद 

र र {~ नक 
रुम्‌ (न्या मपा | रमक सवद क्व म्‌ तका 


भोकार : एकं अनुचिन्तन ] [ १०१ 


भिथ्यात्व 

भ्रयया्यं रुचि, ध्द्धा या प्रतीति ही वास्तवमे मिथ्यात्वे या 
मिच्या दृष्टि है । मिथ्यात्वमरस्त जीव मनुप्यहो तो भी वहु विवेकहीन 
होने के कार्ण पु फे स्मान माना गया है 1 मिथ्यादृष्टि जीव तत्त्व 
भरतत्तवे फा भेद नही कर सकता 1 उसकी श्र्न्तरष्टि जागृत नही होती, 
अरतएव वह्‌ तरह-तरह की श्रान्तियो से चिरा रहता दै । वह्‌ श्रदेव को 
देव, कुगुरु को सुगुरु भ्रौर श्रधमं को घमं मानकर श्रा्मा के अकल्याण 
मे प्रवृत्त रहता है । उसकी आत्मा श्रत्वन्त कलुपित ग्रीर मलिन होती 
है। वह भ्रपने दृष्टि विपर्यास के कारणा ्रहित को दित प्रर हित को 
अहिते समभता है । जसे कटुक तवे के सम्पकं से मघुर दुग्ध भौ कटुक 
सपमे परिरित्त हो जाता है, उसो प्रकार मिथ्यात्व के योग से भिय्या- 
द््टिमेनौ मी ज्ञानमात्रा होती है, वह सव मिध्यज्ञन ही बन जाती है। 

मिच्यात्वी प्राणौ प्रथम तो श्रात्मतत्व, पुनर्जन्म, पुण्य-पाप भ्रीर 
वन्ध प्रौर मोक्ष को स्वीकार ही करता, कदाचित्‌ स्वीकार करलेतो 
प्रामकल्यास कं लिए प्रवृति नही करता । कोई-कोई एसे भी होते है 
नो घ्रपनो भ्रात धारणा के अनुसार त्यागमय जीवन पथ पर चलते 
मधर उनका श्राचार मिथ्यात्व के विपदे दरुषित होने के कारण मिथ्या 
चारही होता है! उसका फल भवभ्रमण के प्रतिरिक्त भ्रन्य कुमी 
नेही होत्ता । 

मिथ्यादृष्टि प्राणी के लिये बह कड़ी वेडी दै जो उसे ्राध्यात्मिक 
विकास की प्रथम भूमिका पर भी श्रारूट्‌ नही होने देती । भ्रात्मलोधन 
के समीचीन मागं का ही पता नही होता 1 भ्रतएव मुमुक्षु जोव का सवरथम 
मिथ्यात्व से पिण्ड दुटना नितान्त ब्रावद्यक है । अव तक मिथ्यात्वं नही 
जाता, कोई भी क्रिया श्रात्मस्परशी श्रौर आत्मलक्षो नही हौ सकती । 
मिथ्यात्व के नष्ट होने हौ ष्टि शुद्ध होती है, लक्ष्य स्थिर होता दै 


ग्रौर योर प्रदृत्ति आत्महितकारिणी वन सक्ती दै। __------- सकती है 1 
म न सतस 1 कः आभर; 


# नरत्वेऽपि पद्युयन्ते, मिथ्यात्वग्रस्तचेतसः । 


= 
8 


भ 


1 


सा [९ 9 भ । ९ 
टसा, भू, नोनी, श्न्रहचयं गौरं पन््रह्‌, र्ट पाय पूताभिः द 


< ४५ 
है। उनक्रापूांरूपसेयाप्रागिकन्पमेभी त्यागने होना ग 
ह्‌ पनम्‌ सक न्पम भाव्यागिनचे हना श { 
है। मिव्यष्प्टिजोवमेत्तो हेनी जगृति यामपि हौी नरी सव + 


वहु टन पापोफात्याग कर सके, श्ररेकमं यन्टा्टि भी टन पनमा 
नदीं कर परते । वे र्हिसादि मते को उपदे एवं पापोप्रतःनि म 
हेय समभे हुए मी तदनृगुल प्रवृत्ति कले मे ग्रशमर्तयेः 
जीवन मे श्रनेक वार यह्‌ घटितटोतादेगा यानाद ति ममुलश्षा 
विवेक जागृत होता है, उसफी क्तस्य ब्रधिभी मोर मही लेकर, दिग 
मी ग्रन्नरतर की दूर्वलता उमचिनेनप्रौरनृदधिषलो स्म यनी दनी 
श्रौर मनुष्येन काम करर्यद्नादु निट यर स्वयं कर्मा पर्मर २ 
कर्ता) याद्‌ मे उम दद्य मे पान्य्ाप की श्म प्रत्पतित हौ; 
प्रौर वह्‌ श्रषने प्रापको पित्कासयाद्‌। स्नु प्रवेगः भ्राम पर ¢ 
उरी दुर्वसना कासिकारद्र जाना) द्म प्रहर प्रस्यम्‌ मी सदुग्ययय 
्मयनादी वनी न्हतीरहै, पह स्िमामे परिगणन मस टो पाते । स 


दुर्वेनता दो श्रविरति फटूनाती 1 


भ्रमाद्‌ 


पयत फोर प्ररि श्रनाटुग नद्ध फ उपदश्य धम्यद्‌ 4 । क 


मो शस्व" देः बरनि मतन सारग्क गना पला न एता का, ब 
क [१ 1 { [नन 5 ¢ ध, [१ ण 

सोवनमापन ने तिद यो भी द्विया सन्कार, वत दिव्या सम्भ 

^ ‰~~~ ८ $+ 4 ल ४ 

मरी प्यम्नहोग्छ्णा > 1# मष विसदुरनि गदा कदम 


वि = - {54 ॐ ५ ५ 
न्न्यी । य शपते साध्य काय मरम (ष्य म िन्पव्य तता स 
५ श 3 इ~ ‰ ~ 52117 ~ 
देक! यद मनन (ष हो पदफात तै | यर विनत, विमद्य 
0 ७ = र +. 01101 
(वि 4. 
ध य ध 


भोकार : एक अनुचिन्तन | [ १०३ 


भ्रादि किसी कारण से उसकी दृष्टि जव बहिर्मुख बनती श्रौर लक्ष्य श्रोभलं 
हो जात्ता है, तव प्रसादको स्थितिदहै। मगवान्‌ महावीर से श्रे 
ज्येष्ठ भ्रन्तेवासी इन्द्रभूति सौतम को पुनः पूनः सतकं करते हुए कहा है- 
“गौतम ! एक समय मी प्रमादने कर! 

पनिहारी श्रपनी सखियौ-सहेलियो से वाते करती चलती है, हसती 
है, वोलती है, तथापि उसका श्रन्तस्‌ मस्तक पर स्थित घटमे दही 
प्रटका रहता है, इसो प्रकार संयमनिष्ठ साधक का मन प्रत्येक क्रिया 
के समय श्रपते स्व" के साथ ही समन्वित रहना चाहिये । यह्‌ स्थिति 
तमी उत्पन्न हो सकती है जव श्रप्र मत्तभाव विकसित हो जाता है। 

प्रमाद एक प्रकार को व्यभिचार दृत्ति है, सुषुति है, पतन दहै। वह्‌ 
साधक को पथ भ्रष्टकरदेता है, भुलवेमे डाल देता है। प्रमादके 
कारण पापङृत्यो मे प्रवृत्ति होती है । श्रश्रसत्त प्रवस्थामे की गई क्रिया 
जो पापजनक नही होती, वही क्रिया जव प्रमत्त दशामे कीजातीहै 
तो पापजनक हो जाती दहै) एसी से कल्पना की जा सकती है कि प्रमाद 
कितना भयंकर है । 


कषाय 

श्रात्मा का प्रबल से प्रवल प्रत्यनीक कषायं ही रहै । कषायसे वढ- 
केर श्रात्मिक शक्तियो का विघात करने वाला श्रन्य कई भी 
चिकार नही है, 

कषाय शाब्द कष-[-श्रायः के योगसे निष्पन्न हृभ्राहै) "कषः 
के प्रथं है-- कमं भ्रथवा भव । जिनसे कमेकीश्नौर भवपरम्परा कौ 
भर्यात्‌ जन्म-मरण की भ्राय' ब्र्थात्‌ प्रात्नि होती है, उसे कपाय कते 





† स्मयं गोयम ? मा पमायए 
--उत्तराध्ययन, भ्र. १ 


१ [ भ्रौकार्‌ एत प्रनुतिनपन 


है| तत्वं यह कि जिम विकारे कारा अमा माद ४ 
म्रवद्ध दोनो रै आर जिन वदौतक्त भत-प्रमएा ससा 
विकार कपायदहै। 

ग्रात्माके उत्यान ग्रौरपतनकाजो दीर्यकरातोनं नारमत श्रा 
दै1 उत्का नूत्ररर क्पायभावटै) ज्यौ-ज्यो क्वाय सदाम 
वृद्धि हती है, परात्मा मलीन होता जता, स्परभापमे पिम टोषर 
विभाव परिणति में प्रस्त होता जाता) धीर प्रान्यािमकि पमे 
श्रोर्‌ श्नग्रसर होता जाता६। खे विपरीते सँे-जते पपाते भ क्षपा 
उपलम होता, अस्मा कौ स्व-स्वमपयमे 8 हाती सानी 
उसके संप्रतेप का भरन्त अति जता, प्रनिर्कवनीय शानि फा उद 
होतादै प्रौर श्राच्मा धपनै उःवान कै उच्च-उस्मतर्‌ शोधनो परग 
भ्रारोहुण करता चता जाता ह 

शास्य मे चौदह गूएस्यानो का विदद चर्गन पिपा र्य | मृग 
सथान प्रानिमिकः पिकरास फो भूमिक) अगर तिकि मसर रयं 
गुस्मानो कै स्वन्प पर सिनार्‌ किया जयगो रण प्रणीत हेमा त्रि 
उन गूमिकस्नोका प्रवात ्रापार्‌ कयायद्‌ ) सिदर्‌ श्त 
तीव्र-नौव्रफर्‌ उदरोकमे प्राल्मा अमपतन मयरः गप (81 
है प्रौर किय प्रकार पयायो वर विगयद्रात्नकरने काया सार शले 
स्य्रल्ण फो प्रवद्‌ करना द्रभ्रा व्मििपकर दर्प ने भु हा 


4 ८ 


कृ 
य 


0 र (६ द्ध ग्र्पण + म ‰, ४ > 
याता इम यीद्रकी मलो पन्प्ना पुरन्दरा कै श्रष्दुदतु त यै 
प्रततग् म कदनम्‌ ॐ सारस्य 


ती भुखस्याना भन द्वप्ययन्‌ पक प्र 
पाय विलय चा दषम प्रामन्दुदि कवा श्य के 
सम्भव न्ट 1 | 
पाते कवय. (माय की नदान ना दमा मदा, 
मन्द्रा, सन्वमता ददिवे भा प 


भ 


॥ 1 { परो दर्‌ एद नशन 


= तात य॑ ॐ & र ५६ न कारमं ५ 

ह) तातपयं यूहे कि जिन विकारङे कार्म प्रा द्गदं म 
श्ररष्त = >} ब # [५ १, 

द्ध ट्त ६ प्र्‌ निन्य वरदाने भेव-ध्रमया करद > 


विकारे कपायद। 


श्रां ॐ, [ ङः का स नन्‌ म ~) 1 
पामां कै उत्थान प्रर पतन काज दलसदयप सातः धनै न्द 
भ ॥ च [१ 


दै। उरा नूतगर फषायभावद्ै) उवो-ज्यो फुवापकौ नोत; 
बृद्धि होती है, श्रादमा मलीन होता जाताद्ै, ज्नभायमे पिपृतं सेर 
विभव परिणतिमे मस्नहोत्ता उतार । प्रौर श्राम्‌ पनिश्ध 
ग्नोर प्रमसर होता जाता ह। पसे विषरीत उनमतत पापपो का प्रन 
उपलम होता है, ्रालसा कौ स्वनस्मावमे स्यिरताटोयौ याती >, 
उनके संप्रतेपका भरन्त प्राता जता, श्रनिर्वचनीय पान्ति का (दप 
होता श्रौर श्रात्मा श्रपने उत्थान कै दय्य-उतस्यतरे यृ्वानो चः 
श्रारोटएा करता चला जाता ट । 

शास्ममे चौदह गुरस्यानों का विदद वर्ग तिमा ममार 
स्यान ग्रातिमिके विकादको मूर्मिकयेंदट) धगर ननिफ मुरः 
गएस्यानो के स्वर्प पर्‌ विनार क्रियायायतो स्ष्टप्नीति दा # 


1 
मे सा 


उन भूमिकाग्नो फा प्रवान प्राघार्स्यायद। नि प्रकार प्यानं न 
तीव्र-तीव्रकर्‌ उद्रक मे प्रात्मा प्रनत्प्तन कै गरः गरसमे ष्या तात 


है श्रौर छिस प्रर कपायो पर्‌ वितयप्रान करने वाला मादक अतत 
दुद स्वरपरोप्रल्ट करता द्रुमा पारमातिमिकं ददययंमे मू स 
जाताह्ु, एस चोज कौ सदी कल्पना गृस्यानो पैः प्रम्पयन्‌ + ५ 
प्रती द) गुखस्यानो वा धव्ययन एकप्रकार मे कयाय दै शम 


मय हो प्रभ्यपनदै। 
> = र +"; + क + श्रम्द ५ & 1 {* 
फपाय विजयं फरो द्टोदधकर्‌ प्रामन्युद्धि फा चन्या व शः 


सम्भय सटा टै। 


वि र ॥ ४ ५ 11 ५. 
यःत पयाय-पन्यपमादय का सीदद, सव्रता, सद्म 
यथपि मेद द) श्र 


मन्दद्य्णा, मर्ध्ममया प्रद फ आधान वेर्‌ कथ 


म्रोकारं : एक भ्ननुचिन्तन | | १०५ 


हो जाते है कि उनकी गणना नही हो सकती, तथापि उसके पार्थंक्य 
का आभास देने की दृष्टि से चार स्थूल विभाग क्यिगएहै, जो 
इस प्रकार हैः-- 

१. अनन्तानुवन्घो 

२. श्रप्रत्याख्यानावरण 

३. प्रत्याख्यानावरण 

४. संज्वलन 


यह्‌ चारौ कषाय क्रोध, मान, मायाश्रौर लोभके भेद से चार-चार 
प्रकार के है। चाह श्रनन्तानु वन्धी मादि के क्रोधादि चार भेद किए 
जाएं, चाहे क्रोधादि के अनन्तानुबन्धौ श्रादि के चार-चार भेद कर 
लिए जाए, श्रभिप्रायमे कोर श्रन्तर नही पड़ता। ये सव भिलकर 
सोलह प्रकार के कषाय है । 


पूर्वोक्त चारो कषायो मे श्रनन्तानुवंधी कपाय सवसे तीव्र है । इस 
कषाय को विद्यमानता मे सम्यण्द्ंन की प्राप्ति नही कौ जा सकती । 
इसके वशीभूत होकर मरने वाले प्राणि को नरक गति का श्रत्तिथि वनना 
पडता है। यह्‌ कषाय संस्कार के रूपमे प्रायः यावज्जीवन बना 
रहता है । 

भरप्रत्याख्यानावरण कषाय जव तक वना रहता है, तव तक देड- 
विरति उत्पच्च नही होती 1 इसकं उदयमे देहोत्सगं करने वाले को 
तिर्यचगति मे-पञ्ु-पक्षौ न्नादि कौ योनि मे, जन्म लेना पड़ता है । इसका 
संस्कार चार मास तक वना रहता) 

प्रत्याख्यानावरणए कषाय सम्यक्त्व ओौर देशधिरतिमेतो रुकावट 
नही डालता, मगर सवंविरति-सम्पणं संयम का वाधक है । इसका 
संस्कार एकं पखवाड़ तक रहता है । । 

चारो में सवसे टल्का कषाय संज्वलन है । यह चरित्र मे रुकावट 
तौ नही डालता, मगर उसमे पूणं निर्मलता नही श्राने देता । स्वात्म- 


५ रु न) ४ | (रन्‌ # ५१११ 
१०९ | [ गरातार्‌ प्र प्त 


न 


( 
(3 स कष्ठ कक ~ 


स्प 1811411 चि न्प्र (स ५ ० च # ¬ 
भ्मग्यंत्प यद्ररताल चन्र, यो न्नम्‌ मान ममर, य्य 
के उदवादम्या म चह उ † पना) 


विन्तुट्रल्काना प्रतीत दमे यालायद्‌ ऋयायं भौ धा पो 


है1 आध्यात्मिक विवास कौ ग्पारहयो मिका परसह्य याप पमु 
इये पूगोतन्ह्‌ उणयान्तंकरदेतेषर । उपयान्त फर धमना प्र फन 
कि उसका ममूनसयनदी करते वरन्‌ व्यापने द दम ममक 


महामुनि कपायोदय न्ने रथया मुक्त वोतराम ठै जाना दर पौर यल 
स्यात चारसििको प्रास्त कर्येताद) ममर यादीटीदम्कै आ ल 
यान्त दिया हूना कयाय पुनः उभर पादा दर प्रर पमे मन्वा 
पतनोन्मुम यना देतादै।# वद्‌ शीघ्रनसम्तममानो उमे निम्न 
निम्न मूमिका पर प्राकर दीतनर्‌ कात्‌ पणन भवनम वर्णा चच 
ह। उसी कारणा मरामनीधी प्राया सोम्या हो सना चष 
त्रद्ण, व्र, अग्निरा प्रौग फपाययो धो समृ वर {स्मि 
चरन नामि! इनकी भटयना देव र्‌ सिदिनिना नतत द्या अ 
चाहिय । प्रस्यन्पसाप्ामेयेषण्डेवार्‌ गीयट्‌ पाम 


यम =^ 


जतिटै व उनका समुन विना करत तदम 


गे 2: 34 ५ 9, 7 
समपरेधटो सामा] दात प्तैर मान प्रपात शेत श स प 
{++ ~ > ~ ल = + र ¢ # ^ र. 
सम्मिनिन द] व्मपरमयके प्रमि म मदि ष्म कव लान 
न्य [] > ई „> ¢ 
च ससा उसकी मृगमन्दा ग्द नदा गम द्रि 
पयिथार्यति समाया रि पु के गद) 
नशर क, ५३९ 
॥ 
तु समाना श्यत अगाद कनदपर 
वि कि ( ज म #व 
मटर मे दीर्मास्पिस्ं याद तं स त 


म्रोकार : एक अनुचिन्तन | [ १०७ 


है । ऋजुसूत्रनय कौ दृष्टि मे क्रोध दी द्रेषसूप है तथा शेष तीन कभी 
राग श्नौर कभीद्ेषरूप होते है । शब्दनय का अभिप्राय इसीसे मिलता 
जुलता है ।‰ 

प्राशय यह कि अत्मा की मलीनता का प्रधान कारण 
कषायया राग-दढोेष है । अ्रतएव समग्र साधना का प्रत्यक्ष या परोक्ष उद्‌ द्य 
कषाय से मृक्ति प्राप्त करना) कषाय से मुक्त होना ही वास्तवमे 
सर्वोक्छष्ट सिद्धि है । 
योग 

ध्योग' शव्द ्रनेक अर्थो मे प्रचलित दै! योगक्षास् के अनुसार 
चित्त की वृ्तिमात्र का या अप्रशस्त वर्ति का निरोधयोग कहलाता है, किन्तु 
यहाँ यह श्रथं श्रभिप्रेत नही है । घमंगास्त्र मे मन, वचन श्रौर काय के 
व्यापार को या इनके व्यापार से आत्म-प्रदेशो मे होने वाले परिस्पन्द 
को योग" कहा गया है ।# 

मन मनोवगंणा के पुद्गलो से वनता है । वचन भाषा से निमित 
होता है ग्रौर काय ग्रौदारिक श्रादि वगंणा के पुद्गलो से जनित है । 

जव श्रात्मा मे वीर्यान्तराय कमं का क्षयोपरम या क्षय होता है तव 
उक्त पुद्गलो के श्रालम्बन से भ्रात्मा के प्रदेशोमे एक विशेष प्रकार का 
कम्पन-हलन-चलन होता है जव मनोवगंणा के पुद्गलो के श्रालम्बन से 
होता है तच वह्‌ मनोयोग कटलाता है, भाषाजनीय पुद्गलो के भ्राधार 
से होताहै तो वचन योग कहा जाताहैप्रौर शरीरके सहारे होताहै 
तो उसे काययोगकी संज्ञादी जाती है । इसप्रकार भ्रात्मप्रदेशपरिस्प- 
म्दन रूप योग मूलतः एक होते हुए भो प्रालम्बनो की भिन्ना के कारण 
तीन प्रकारकामानागयादहै 


& विशेषावस्यकभाष्य, उच्चराधं । 
# कायवाद्‌मनःकमं योग. । - तर्वाथं सूत्र, ६-१ 
{ देखिये विजेषावदयक भाष्य श्नौर टीका. गाथा ३५५६४ 


। भ ॥ 
# 
जयं श्रात्मप्रेणो मे परिन्पन्वम लना त्म 
न्व ्रात्मद्जद्ट) पसिन्पन्न त 1 
¢ र 
वगा > म प श्रात्मामै न्य >) 
गा टता श्रौर्‌ किर्यःः कर्मं श्रात्मा प न्य, दुम > 
एक्मेक ~~ = म. नननेप = रि 
फमक हा जाते टं । यालमाने मान विननेपमो ण त्रनल प्रौ ड ~रम 


मे क्ति प्रकार मैः स्वभाव धा निर्माण है, य" देने ५ 
८ भृ > ~~ वेष ता परं भवस १ 4 ¢ ५ ध 
योग' कौ विररेयता पर ग्रवसम्दित्त रै) प्रणवं नार प्रधा म सष 


दो--स्थिति यन्य प्रर गसयन्य--पंपाय पै पिमिन प पे 

दो-~ प्रहतिवन्यं तथा प्रदैयवरंव--योम बे नमिन मे मे 
प 5 ते वर्म मे ~ २ 

गए हार त्रयात्‌ वेवने घाते क्ममे चित्ति प्रहार ए म्मा यु निप 


हो प्रौरवे कितनीत्यादादमे टा, यदस वहि सोगदे श्रयप्र पर 


नियमित रहती ६1 
योगदोप्रकार्‌ कव टै--प्रयुभ श्रौरधुम । टियाप्रारि 
कद्शः, भकः 


॥ 1 


| 
श ११. 
॥ |, 4५१ ५} 


1 


या मिय्यायाप्ण करना प्रयुभे मनोयोगः} दम्यः वि्रद प्रपि 


होना घुम योगं 
फपाय की वियमाननार्मे मौगश्रतस्य दोतारै प्रि पोपप ह 


पर्‌ कपायटोदादटै श्रीर्‌ नदी मीदोता। वृद्धाय द दुष 
1 (क मै, चछ ` ति 

तक रहता है जवकि योग दैर्दूरय गुखरमानि कक} श्रयः गेपः 
14 क्क ४ # 4 183. १ श) 


सयोग होति ह, पिन्यु सप उनकी प्रायुष्य प्न्पल्द पव 
गयम थोग ददुगणन्ण गै 


ननि नि ट ध 
श्राघपसमे हनवाला क्ापिक व्यापार श्रदम दामियाोपः 
५५ | 


पे परमोत्तम पम्यष्यान वामक ममानिषे 


निरोध फर + ः 


प प्रयस्य प्रादु पण्य क प्प [प 
{ ‰ ‡ 


भनेर उन विभ्य स्तो समद्र । 


४ 


श्मः म (4 १, = "८ 
# ना पयदु-तपमा, टिदि-द्रममः पष्यद्व 
225१५ क्य 


५ ४ 


रि 
लि 


५ 


५५० 


प्रस्तुत ग्रन्धमे प्रयुक्त ग्रन्थोंके नाम 


यौज कोद 
भगवद्‌ गीता 
माण्टूकोपनिषद्‌ 


पयुद 
छान्दोग्योपनिषद्‌ 
फेटोपनिपद्‌ 
मव्युपनिपद्‌ 


तत्तिरीय उपनिपद्‌ 
दत्याण का साधना प्रद 
त्रिपच््टि दालाका पुय 
भोम प्रयन्धे 

पञ्वस्तुकः 

पानागाव 

उस्राघ्ययन 


दानितीथ 


{ वृद द्रव्य संग्रह दीक 


रन्वाद्र 
(ग | (न्न्‌ श 
{म~ नृन्‌ सम 
श्रानाग्धद 
1, ॐ 
गसग मव मादयन्प्य 
(मिय दभ 
प द्र 


॥ 
11.21 


प्रतिष्ठा कत्प पद्धति 
यङञस्तिलक चम्पू द्विभाग 
भागवत 
दशर्वकालिक 

हारीत संहिता 
तत्तवाथं सूत्र 

योग सूत्र 

स्वधिं सिद्धि 

तत्त्वाथं भाष्य 

परश्च व्याकरण 

सूत्र कृताद्ध 

वृहद्‌ स्व्य॑भर स्तोत्र 
वौदढकालीन प्रस्तर लेख 
ग्रौपपातिक 

स्थानाद्ध 

दला्र्‌ ते स्कघ 
ग्रावरेयके निर्युक्ति 
गाधो उज्ज्वल वार्ता 
साधना का राजमागं 
विक्ञेपावर्यक भाष्य 
गोम्मट सार